AI से नौकरी जाएगी? Anthropic और OpenAI की रिपोर्ट से जानें काम की दुनिया में क्या बदल रहा है

CHAKRESH | May 11, 2026, 15:08 IST
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Anthropic
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इस समय AI को हाई स्किल और नौकरियों पर खतरे के रूप में देखा जा रहा है। Anthropic और OpenAI की रिपोर्ट साफ करती है कि AI किस तरह के जॉब पर कैसे असर करेगा… thesootr prime की इस खबर में देखिए भारत पर क्या असर पड़ेगा…

समझें क्या है पूरा मामला

  • AI कई कामों को खुद कर सकता है, पर पूरी नौकरियां खत्म नहीं हो रही हैं।
  • Anthropic और OpenAI की रिपोर्ट में अभी तक बड़े पैमाने पर बेरोजगारी नहीं दिखी।
  • छोटे कारोबार AI अपनाने में पीछे हैं, बड़ी कंपनियां ज्यादा आगे हैं।
  • 22 से 25 साल के युवाओं में AI-प्रभावित नौकरियों में नई भर्ती धीमी हुई है।
  • जो काम नए तरीके से ढाल सकते हैं, वे AI के दौर में टिके रह सकते हैं।

टाइपिस्ट और बैंक टेलर की कहानी

1970 के दशक में सरकारी दफ्तरों में एक बड़ा बदलाव आया। सेक्रेटरी का टाइपिंग का काम अलग कर दिया गया और खास टाइपिस्टों को रखा गया। ये लोग दिनभर एक जगह बैठकर सिर्फ टाइप करते थे।

लेकिन 1980 के दशक में पर्सनल कंप्यूटर आया और हर डेस्क पर टाइपिंग होने लगी। टाइपिस्ट की नौकरी खत्म हो गई। उसी दौर में ATM (Automated Teller Machine) भी आया।

1995 से 2010 के बीच अमेरिका में ATM की संख्या एक लाख से बढ़कर चार लाख हो गई। हर ब्रांच में टेलर की जरूरत कम लगी। लेकिन हुआ उल्टा।

सस्ती शाखाएं खुलीं, तो शाखाएं ज्यादा खुलीं और बैंक टेलर की कुल नौकरियां बढ़ गईं। उनका काम बदला जरूर, वे कैश से हटकर ग्राहकों को सलाह देने लगे।

यही दो रास्ते तकनीक हमेशा से दिखाती आई है। एक, पूरी नौकरी खत्म हो जाए, जैसे टाइपिस्ट की। दूसरा, नौकरी का रूप बदल जाए और वह बढ़ जाए, जैसे बैंक टेलर की।

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AI काम करती है, पूरी नौकरी नहीं

आज AI (Artificial Intelligence) कई कामों में माहिर हो चुकी है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि नौकरियां बड़े पैमाने पर जा रही हैं। शोधकर्ता किसी नौकरी को छोटे-छोटे कामों में तोड़ते हैं और देखते हैं कि AI उनमें से कितने काम कर सकती है।

इसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक्सपोजर (AI Exposure) कहते हैं। जैसे डेटा एंट्री क्लर्क की नौकरी में AI का एक्सपोजर बहुत ज्यादा है। वहीं वाहन सफाई करने वाले की नौकरी में यह बहुत कम है।

Anthropic और OpenAI की ताजा रिपोर्टें कहती हैं कि ज्यादा AI एक्सपोजर वाली नौकरियों में अभी तक बेरोजगारी नहीं बढ़ी है। एक्सपोजर का मतलब तुरंत छंटनी नहीं है। ज्यादातर ऐसी नौकरियों का रूप बदल रहा है, वे खत्म नहीं हो रहीं।

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सब कंपनियां AI नहीं अपना रहीं

हर वह काम जो AI कर सकती है, वह अभी से ऑटोमेट नहीं हो रहा। एक शोध पत्र में दवाइयों की रिफिल अनुमति देने और फार्मेसी को दवा की जानकारी भेजने के काम को पूरी तरह एक्सपोज्ड बताया गया। यानी AI यह काम कर सकती है, लेकिन व्यवहार में अभी यह हो नहीं रहा।

दूसरी ओर एक शिक्षक की बात करें तो ये पढ़ाई का कंटेंट तैयार करने में AI काम आ सकती है। फिर भी क्लास में जाना और बच्चों को पढ़ाना अभी भी जरूरी है। यह एक रिश्ते और संस्थागत जरूरत की बात है।

MIT Sloan के एक शोध पत्र में measurability gap यानी मापने की खाई का जिक्र है। इसका अर्थ है कि AI जो काम करती है, उसकी सही जांच कर पाना हर जगह मुश्किल है। जैसे इलाज, इंजीनियरिंग या अदालती फैसले जैसे क्षेत्रों में AI को जल्दी नहीं अपनाया जा सकता।

भारतीय मार्केट और युवाओं पर असर

  • भारत में युवा आबादी ज्यादा होने से AI का खतरा बड़ा है। IMF रिपोर्ट के अनुसार 26% जॉब्स प्रभावित हो सकती हैं। खासतौर पर नए ग्रेजुएट्स पर। IT सेक्टर में 20 लाख जॉब्स रिस्क में हैं।
  • जूनियर कोडर्स सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। क्योंकि AI बेसिक टास्क्स ले रहा है। 50% मिलेनियल्स को AI से जॉब लॉस का डर है, लेकिन स्किल शिफ्ट से नए अवसर (जैसे AI मैनेजमेंट) बन सकते हैं।
  • इस मामले में राहत की बात ये है कि भारतीय AI की मदद से छोटे- मोटे उपयोग तो कर रहे हैं, मगर गंभीर होकर कोई भी मॉडल बाजार में खड़ा नहीं हो सका है। इसी के साथ भारत का फुटकर मार्केट काफी मददगार साबित हो सकता है।

जितनी बड़ी कंपनी, उतना ज्यादा AI यूज

OECD (Organisation for Economic Cooperation and Development) के एक अध्ययन में पाया गया कि बड़ी कंपनियों में 40% AI का इस्तेमाल करती हैं, जबकि छोटे कारोबारों में सिर्फ 12%।

छोटे कारोबारों के पास कंप्यूट (compute) यानी AI चलाने के लिए जरूरी संसाधन और पैसा दोनों कम हैं। Anthropic की 2025 की लेबर मार्केट रिपोर्ट बताती है कि बड़ी कंपनियां भी खर्च से परेशान हैं।

Uber की CTO (Chief Technology Officer) ने कहा कि इस साल कंपनी का AI बजट पहले ही खत्म हो गया। Nvidia के एप्लाइड डीप लर्निंग के वाइस प्रेसिडेंट ने बताया कि उनकी टीम के लिए AI चलाने का खर्च कर्मचारियों के वेतन से कहीं ज्यादा पड़ रहा है।

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AI से काम सस्ता हो, तो मांग बढ़ेगी

AI का इस्तेमाल करने वाली अमेरिकी कंपनियों में से केवल 5% ने बताया कि कर्मचारियों की संख्या पर असर पड़ा है। यह असर नौकरी बढ़ने और घटने दोनों में लगभग बराबर था।

OpenAI की रिपोर्ट इसे demand elasticity यानी मांग लचक से समझाती है। अगर AI किसी सेवा को सस्ता कर दे तो उसकी मांग बढ़ जाती है। और मांग बढ़ने से कंपनियों को उतने ही या ज्यादा कर्मचारी चाहिए होते हैं।

अमेरिकी ब्यूरो ऑफ लेबर ने 2015 में अनुमान लगाया था कि तकनीक के चलते information sector में नौकरियां कम होंगी। लेकिन अगले एक दशक में उस क्षेत्र में 8% की बढ़ोतरी हुई। क्लाउड कंप्यूटिंग, साइबर सुरक्षा, सॉफ्टवेयर और डिजिटल सेवाओं में नई नौकरियां बन गईं।

इसी तरह फॉरेंसिक साइंस (forensic science) तकनीशियनों के बारे में लग सकता है कि AI उनकी जगह ले लेगी। लेकिन बेहतर तकनीक से ज्यादा सबूत मिलेंगे और ऐसे तकनीशियनों की मांग बढ़ेगी। सांख्यिकीविद् यानी statistician की मांग भी इसीलिए बढ़ेगी, क्योंकि कंपनियां उनसे बिजनेस प्रोसेस सुधारने और नए उत्पाद बनाने का काम लेंगी।

हालांकि OpenAI की रिपोर्ट यह भी मानती है कि एक समय ऐसा आ सकता है जब AI के कारण कामों की लागत बहुत कम हो जाए और उत्पादन बहुत ज्यादा। उस वक्त यह मांग लचक काम नहीं करेगी और नौकरियां घट सकती हैं। लेकिन अभी वह दौर नहीं आया।

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युवा और कम अनुभवी ज्यादा खतरे में

अप्रैल 2025 में यूरोप के 35 देशों में हुए एक अध्ययन में पाया गया कि AI वहां ज्यादा तेजी से आती है, जहां कर्मचारी पढ़े-लिखे हों, रचनात्मक काम करते हों और अपने काम के तरीके खुद तय कर सकते हों।

यानी जो लोग अपनी नौकरी को खुद ढाल सकते हैं, वे AI को एक औजार बनाकर काम करते हैं। और जो बदलाव के बाद तैयार नौकरी में जाते हैं उनके लिए हालात मुश्किल होते हैं।

Anthropic की 2025 की लेबर मार्केट रिपोर्ट में यह भी चेतावनी है कि 22 से 25 साल के युवाओं में AI-प्रभावित नौकरियों में नई भर्ती 6% से 16% तक धीमी हुई है। यह सीधे नौकरी जाने से नहीं, बल्कि नई नौकरी न मिलने से हो रहा है।

1980 से 2015 के बीच अमेरिका में आधी से ज्यादा नई नौकरियां उन पेशों में बनीं जहां काम के तरीके या पद के नाम बदल गए। यानी जो बदलाव के साथ चल सके, वे टिके। जो नहीं चल सके, वे पीछे रह गए। सवाल यह है कि आप टाइपिस्ट बनेंगे या बैंक टेलर?

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यह खबर क्यों जरूरी है?

AI और रोजगार का सवाल भारत के लिए भी उतना ही अहम है जितना अमेरिका के लिए। भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में से एक है। हर साल लाखों युवा नौकरी बाजार में आते हैं।

अगर AI के कारण एंट्री-लेवल (entry-level) यानी शुरुआती स्तर की नौकरियों में भर्ती धीमी होती है, तो इसका सीधा असर इन युवाओं पर पड़ेगा। Anthropic और OpenAI जैसी बड़ी AI कंपनियों के आंकड़े बताते हैं कि अभी बड़ी तबाही नहीं आई है।

लेकिन खतरा है। यह खबर लोगों को सही तथ्यों के आधार पर तैयारी करने में मदद करती है। यह डर से नहीं, समझ से निर्णय लेने की प्रेरणा देती है। यह जरूरी है कि नागरिक AI से जुड़े बदलावों को समझें और खुद को तैयार करें।

सोर्स: यह रिपोर्ट Anthropic, OpenAI, OECD और अमेरिकी BLS जैसे स्रोतों पर आधारित है।

FAQ

  1. क्या AI से नौकरियां सच में खत्म हो रही हैं?
    Anthropic और OpenAI की रिपोर्टें कहती हैं कि AI ज्यादा एक्सपोजर वाली नौकरियों में बेरोजगारी नहीं बढ़ी है। लेकिन 22 से 25 साल के युवाओं में नई भर्ती 6 से 16 प्रतिशत धीमी हुई है।
  2. कौन सी नौकरियां AI से सबसे ज्यादा खतरे में हैं?
    डेटा एंट्री, कंप्यूटर और गणित से जुड़े काम, व्यापार और वित्त, कानून और प्रशासनिक सहयोग वाली नौकरियों में AI का सैद्धांतिक कवरेज 80 से 94 प्रतिशत तक है। वहीं कृषि, परिवहन, निर्माण और व्यक्तिगत देखभाल जैसे शारीरिक काम AI से कम प्रभावित हैं।
  3. AI के दौर में नौकरी कैसे बचाएं?
    शोध बताते हैं कि जो लोग अपनी नौकरी को खुद ढाल सकते हैं वे बेहतर स्थिति में रहते हैं। जिन पेशों में रचनात्मकता, इंसानी समझ और रिश्तों की जरूरत है, वे ज्यादा टिकाऊ हैं। AI को एक औजार की तरह इस्तेमाल करना सीखना सबसे जरूरी कदम है। बदलाव के दौरान अपनी नौकरी खुद आकार देने वाले लोग उन लोगों से बेहतर हैं जो बनी-बनाई नई नौकरी का इंतजार करते हैं।
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