पुलिस के 70% जवान बोले, बिना डर के पुलिस बल प्रयोग करने दो, क्या कहते हैं NCRB आंकड़े
CHAKRESH | Jul 29, 2026, 14:31 IST
police force immunity survey spir
पुलिसिंग रिपोर्ट में बड़ा खुलासा हुआ है। 70% से ज्यादा पुलिसकर्मी बिना सजा के डर के बल प्रयोग चाहते हैं। 69% बिना कोर्ट की इजाजत के गिरफ्तारी के अधिकार के पक्ष में हैं।
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क्या हुआ और क्यों
लगभग 55% पुलिसकर्मियों ने माना कि जनता में डर बिठाने के लिए सख्त तरीके अपनाना जरूरी या कुछ हद तक जरूरी है। करीब दो तिहाई ने यह भी स्वीकार किया कि जनता का दबाव उन्हें संदिग्ध अपराधियों से सख्ती से पेश आने पर मजबूर करता है। लगभग आधे पुलिसकर्मी "असामाजिक तत्वों" की ज्यादा गिरफ्तारी को अपराध घटाने का कारगर तरीका मानते हैं।
Status of Policing in India Report 2025
यहीं से मामला पलटता है। गिरफ्तारी के बाद के नियमों पर भी भरोसा कमजोर मिला। सिर्फ 41% पुलिसकर्मियों ने कहा कि गिरफ्तारी के तय कानूनी नियम हमेशा पूरे होते हैं। इनमें गिरफ्तारी का कारण बताना, मेडिकल जांच कराना, परिवार को सूचना देना और वकील से मिलने का हक देना शामिल है। हर पांचवां पुलिसकर्मी तो यह भी मानता है कि गिरफ्तार व्यक्ति को वकील से अकेले मिलने ही नहीं देना चाहिए।
इसे एक आसान उदाहरण से समझिए। मान लीजिए किसी सोसाइटी का सुरक्षा गार्ड खुद तय करने लगे कि किसे अंदर आने देना है और किसे बाहर रोकना है, बिना सोसाइटी के नियम देखे। पुलिस का यह रवैया कुछ वैसा ही असर डालता है, बस स्तर बहुत बड़ा है।
रिपोर्ट में एक और चौंकाने वाली बात सामने आई है। हिरासत में यातना और मौत के आंकड़े देश के बाकी अपराध आंकड़ों जितने भरोसेमंद नहीं मिलते। NCRB के मुताबिक 2020 में पूरे देश में पुलिस कार्रवाई के दौरान सिर्फ 76 नागरिक घायल हुए, जबकि उसी साल नागरिकता संशोधन कानून को लेकर बड़े प्रदर्शन हुए थे। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक अकेले दिल्ली में 200 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। 2024 में तो NCRB के आंकड़ों में सिर्फ दो नागरिकों के घायल होने का जिक्र है, जबकि उसी साल किसानों के "दिल्ली चलो" आंदोलन में पुलिस बल प्रयोग की कई घटनाएं दर्ज हुईं।
और अगर आंकड़े ही भरोसेमंद न हों, तो जवाबदेही तय कैसे होगी?
कौन-कौन शामिल है
दोनों सइड्स की बात
Status of Policing in India Report 2025
वहीं मानवाधिकार संगठनों और सर्वे बनाने वालों का कहना है कि तय संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा उपायों को नजरअंदाज करना खतरनाक मिसाल कायम करता है। उनका तर्क है कि जब खुद पुलिसकर्मी नियमों से हटकर काम करने को सही मानने लगें, तो आम नागरिक की सुरक्षा कमजोर पड़ जाती है।
मध्य प्रदेश , राजस्थान , छत्तीसगढ़ कनेक्शन
राज्य में पुलिस बल प्रयोग की घटनाएं भी कम नहीं रहीं। मार्च 2026 में खंडवा में एक सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर भड़की भीड़ पर पुलिस ने लाठी चार्ज किया था। इससे पहले हरदा में करणी सेना के प्रदर्शन पर और खरगोन में 2022 के सांप्रदायिक तनाव के दौरान भी पुलिस बल प्रयोग को लेकर सवाल उठे थे। सतना जिले में एक व्यक्ति की हिरासत में मौत के बाद भड़के प्रदर्शन में भी पुलिस को लाठी चार्ज और आंसू गैस का सहारा लेना पड़ा था। यह पैटर्न बताता है कि सर्वे के नतीजे सिर्फ कागजी आंकड़े नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत के करीब हैं।
आगे क्या होगा
एक बात जो आप नहीं जानते थे
अब आप क्या करें
क्यों अभी: NEET आंदोलन के बाद पुलिस जवाबदेही पर राष्ट्रीय बहस तेज है, आवाज उठाने का सही समय है।
आगे देखें: संसद के अगले सत्र में गृह मंत्रालय से इस मुद्दे पर जवाब की मांग हो सकती है।
यह खबर क्यों जरूरी है
FAQ
- SPIR 2025 सर्वे किसने किया और कितने पुलिसकर्मियों से बात हुई?
यह सर्वे कॉमन कॉज और लोकनीति सीएसडीएस ने मिलकर किया। इसमें 17 राज्यों के 8,276 पुलिसकर्मी शामिल हुए। - पुलिस को बिना कोर्ट अनुमति गिरफ्तारी का अधिकार कानूनन है क्या?
नहीं, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत गिरफ्तारी के लिए तय प्रक्रिया और सुरक्षा उपाय जरूरी हैं। सर्वे में सिर्फ पुलिसकर्मियों की राय दर्ज हुई है, यह कानून नहीं है। - NCRB के घायल नागरिकों के आंकड़े कम क्यों दिखते हैं?
रिपोर्ट के मुताबिक हिरासत में यातना और पुलिस कार्रवाई से जुड़े आंकड़े अक्सर कम दर्ज होते हैं। यह अंडररिपोर्टिंग की समस्या मानी जाती है।
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