क्या केरल की तरह मप्र के कॉलेजों में मुफ्त शिक्षा नहीं दी जा सकती?

CHAKRESH | Feb 18, 2026, 10:31 IST
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मध्यप्रदेश सरकार के पास अवसर है शिक्षा परिसरों से सामाजिक न्याय की शुरुआत करने का। प्रदेश के सभी छात्र- छात्राओं के लिए पूरी तरह निशुल्क पढ़ाई, कॉपी-किताब, स्टेशनरी और अन्य संसाधन उपलब्ध करवाकर बड़ी शुरुआत की जा सकती है।

खंडवा के एक कॉलेज की छात्राओं ने मंत्री विजय शाह को एक और मुश्किल में डाल दिया। मौका तो था कॉलेज के छात्रोत्सव का, जहां मंत्रीजी ने अनुसूचित जाति और जनजाति की छात्राओं के हित में कई घोषणाएं कर दीं। यहीं पर अनारक्षित वर्ग की छात्राओं ने मंत्रीजी को घेर लिया और सवालों की बौछार कर दी। उन्होंने मंत्री से पूछा कि क्या कॉलेज की योजनाएं सिर्फ एससी और एसटी छात्रों के लिए ही हैं?

क्या पढ़ाई के लिए सामग्री केवल उन्हीं छात्रों को मिलती है? बाकी के लिए कोई योजना नहीं है? सीधे तौर उनकी मांग थी कि जिस तरह एससी- एसटी छात्रों को स्कॉलर, हॉस्टल, किराया भत्ता और पढ़ाई के लिए स्टेशनरी मिलती है, वैसे ही ओबीसी और जनरल वर्ग के छात्रों को भी ये सुविधाएं मिलनी चाहिए।

निशुल्क शिक्षा की सुविधा

शासन- प्रशासन के किसी भी नुमाइंदे के लिए यह विकट स्थिति हो सकती है। इसलिए विजय शाह भी परेशान हुए और आश्वासन देकर बात संभाली- “सभी वर्गों के छात्रों की भलाई के लिए योजनाओं पर विचार किया जाएगा। इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री से चर्चा करेंगे।” खैर! घटना सिर्फ संदर्भ के लिए थी।

बड़ा सवाल ये है कि क्या यह सही वक्त नहीं है, जब प्रदेश के कैंपस हर तरह की असमानता से मुक्त कर दिए जाएं? वैसे केरल ये काम कर चुका है। इस छोटे से राज्य में पहले से ही कक्षा 12 (प्लस टू) तक निशुल्क शिक्षा उपलब्ध है। 2026 के बजट में केरल ने निशुल्क शिक्षा की सुविधा को स्नातक स्तर तक बढ़ा दिया है।

सही मायनों में केरल सरकार ने 2026-27 बजट में कला और विज्ञान कॉलेजों में स्नातक स्तर तक निशुल्क शिक्षा की ऐतिहासिक घोषणा की है। अब यह भारत का पहला राज्य है, जहां सरकारी और सहायता प्राप्त कॉलेजों में डिग्री कोर्स (जैसे BA, BSc, BCom) ट्यूशन फीस मुक्त हो गए हैं।

इस योजना से केरल के 3.5 लाख से अधिक छात्र लाभान्वित होंगे। इतना ही नहीं, BPL परिवारों के लिए इस राज्य में अतिरिक्त स्कॉलरशिप भी शुरू की गई है।

क्या यह काम मध्यप्रदेश में नहीं किया जा सकता?

कक्षा एक से लेकर कॉलेज तक की शिक्षा को पूरी तरह निशुल्क नहीं किया जा सकता?

बिल्कुल किया जा सकता है, अगर सरकार चाहे तो…
बिल्कुल किया जा सकता है, अगर सरकार मन बना ले तो…

इस क्रांतिकारी शुरुआत से मध्यप्रदेश में शिक्षा के कैंपस भेदभाव रहित हो सकते हैं। अवसर की समानता की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। सूने पड़े सरकारी स्कूलों और सरकारी कॉलेजों की रौनक लौटाई जा सकती है। बस! नीयत चाहिए।

यह सच है कि सामाजिक न्याय को लेकर सरकारी स्तर पर की जा रही कोशिशें उलझी हुई सी नजर आती हैं। अक्सर ऊपर से एक सी आर्थिक स्थिति दिखाई देने के बावजूद दो अलग- अलग सामाजिक वर्गों के मिलने वाली सरकारी मदद बहुत अलग- अलग हो सकती है। मसलन वही मुद्दे जो खंडवा की छात्राओं ने मंत्री विजय शाह के सामने उठाए। यह सच है कि असमानताओं को दूर करने के लिए सरकारें (शिक्षा नीति) निरंतर काम करती रही हैं। कभी तेज, कभी धीमी गति से।

बिना भेदभाव के मिलनी चाहिए सुविधाएं

हालांकि सरकारों की कोशिशें कभी पर्याप्त साबित नहीं हुईं। कारण, योजनाएं बनाने और उनको धरातल पर लाने के बीच की खाइयां, जो कभी कम बजट के रूप में सामने आती हैं तो कभी योजनाओं के गलत तरीके से क्रियान्वयन या फिर कमीशनखोरी के भ्रष्टाचार के रूप में भी। दूसरी ओर यह भी सच है कि सामाजिक न्याय और अवसरों से वंचित समुदायों को लगातार सुविधाएं और मौके उपलब्ध करवाकर ही ठोस परिणामों की उम्मीद की जा सकती है।

ईंट-भट्टों पर काम करने वाले बच्चों तक स्कूल को ले जाना या फिर दूरस्थ आदिवासी अंचलों के बच्चों को उनकी बोली के साथ शिक्षा की शुरुआत करना… बावजूद इसके, न्यूनतम बेसिक स्तर पर सभी को बिना भेदभाव के सुविधाएं मिलनी चाहिए। केरल इसका बेहतरीन उदाहरण है।

मुझे अच्छे से याद है कि उमा भारती ने अपने कार्यकाल (मध्यप्रदेश शिक्षा बजट) में एससी- एसटी की बच्चियों के लिए निशुल्क साइकल योजना शुरू की थी। इरादा था कि इस तबके की बच्चियां बिना किसी बाधा के स्कूल तक पहुंच सकें। योजना शुरू होने के करीब एक महीने बाद ही मप्र के एक पत्रकार की चिट्ठी से हर वर्ग और तबके की छात्रा को इस योजना में शामिल कर लिया गया था।

फिर इतना भी दूर क्यों जाएं। मध्यप्रदेश के सरकारी स्कूलों में कक्षा 1 से 12वीं तक के सभी छात्रों को जाति, आय या गरीबी रेखा के बंधन के बिना मुफ्त किताबें (Textbooks) दी जाती हैं। यह निःशुल्क पाठ्यपुस्तक वितरण योजना के तहत शिक्षा के अधिकार (RTE) के अनुसार, राज्य शिक्षा केंद्र द्वारा सीधे स्कूलों में पाठ्यपुस्तक निगम के माध्यम से वितरित की जाती हैं।

तो समरसता की दिशा (शिक्षा का अधिकार) में बात करने वाली सरकार के पास मौका है कैंपसों से इसकी शुरुआत करने का। ऐसे समय में जब कॉलेज कैंपस वर्ग और जातीय विद्वेष के अड्डे बनकर उभर रहे हैं, मप्र पूरे देश को दिशा दिखा सकता है। विचार मंथन जा ति वाद

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