बरखा सुब्बा और परवीन शेख को मिला ग्रीन ऑस्कर 2026, एक तो चंबल नदी पर काम कर रहीं
CHAKRESH | May 17, 2026, 15:27 IST
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भारत की दो महिला पर्यावरणविद बरखा सुब्बा और परवीन शेख को 2026 का व्हिटली पुरस्कार यानी ग्रीन ऑस्कर मिला है। सुब्बा हिमालयी सैलामैंडर और शेख भारतीय स्किमर पक्षी के संरक्षण के लिए काम कर रही हैं।
समझें क्या है पूरा मामला...
- बरखा सुब्बा और परवीन शेख को 2026 का व्हिटली पुरस्कार मिला है।
- व्हिटली पुरस्कार को दुनियाभर में ग्रीन ऑस्कर कहा जाता है।
- सुब्बा दार्जिलिंग के हिमालयी सैलामैंडर के संरक्षण में जुटी हैं।
- शेख चंबल नदी के किनारे भारतीय स्किमर पक्षी बचा रही हैं।
- दोनों महिलाएं स्थानीय समुदायों को संरक्षण से जोड़कर काम करती हैं।
ग्रीन ऑस्कर क्या है?
इस साल भारत से दो महिला पर्यावरणविदों को यह सम्मान मिला है। ये दार्जिलिंग की संरक्षण वैज्ञानिक बरखा सुब्बा और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी की वैज्ञानिक परवीन शेख हैं।
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बरखा सुब्बा की कहानी
एक जीव ने उन्हें सबसे ज्यादा खींचा। वह था हिमालयी सैलामैंडर जिसका वैज्ञानिक नाम टायलोटोट्रिटन हिमालयनस है।
यह एक छोटा, ड्रैगन जैसा दिखने वाला उभयचर जीव है। यह दार्जिलिंग और पूर्वी नेपाल की पहाड़ियों में पाया जाता है। इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कमजोर यानी वल्नरेबल प्रजाति के रूप में दर्ज किया गया है।
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हिमालयी सैलामैंडर खतरे में क्यों?
बारिश का पैटर्न भी बदल गया है। कई प्रजनन स्थल पहले ही सूख जाते हैं। सैलामैंडर एक खास वजह से और कमजोर हो जाता है। यह हर बार अंडे देने के लिए अपने जन्मस्थान पर लौटता है।
इस प्रक्रिया को फिलोपैट्री कहते हैं। इसका मतलब है कि जब एक वेटलैंड नष्ट होती है तो पूरी एक पीढ़ी खत्म हो सकती है।
सुब्बा फेडरेशन ऑफ सोसाइटीज फॉर एनवायरनमेंटल प्रोटेक्शन में वैज्ञानिक सलाहकार के रूप में काम करती हैं। वे वेटलैंड्स को बहाल करने, आक्रामक प्रजातियों को हटाने और चिट्रिड कवकजैसे खतरों की निगरानी करने में जुटी हैं। यह कवक दुनियाभर में उभयचर जीवों के लिए घातक साबित हो रहा है।
सुब्बा कहती हैं कि जब हम किसी संकेतक प्रजाति की रक्षा करते हैं, तो हम जंगलों, आर्द्रभूमि, नदियों और मिट्टी के स्वास्थ्य की भी रक्षा करते हैं। इन पर इंसान भी निर्भर है।
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परवीन शेख का काम
स्किमर मुख्यतः मार्च से जून के बीच चंबल नदी के रेतीले किनारों पर घोंसला बनाता है। चंबल नदी मध्य प्रदेश से निकलती है और राजस्थान व उत्तर प्रदेश से होते हुए यमुना में मिलती है। यह पक्षी कुत्तों और जंगली जानवरों के हमलों के प्रति बेहद संवेदनशील होता है।
शेख ने गार्जियंस ऑफ द स्किमर नाम की एक पहल शुरू की है। इसके तहत स्थानीय नदी तटीय समुदायों को पक्षी के घोंसलों की निगरानी और सुरक्षा में शामिल किया जाता है।
इससे स्थानीय लोगों को मौसमी रोजगार भी मिलता है। साथ ही वे सभी देशी जलीय जीवों की परवाह करने लगते हैं।शेख कहती हैं संरक्षण उतना ही मानवीय समुदायों के लिए है जितना कि वन्यजीवों के लिए।
पिछले एक दशक में इस पहल के नतीजे बेहद उत्साहजनक रहे हैं। चंबल नदी के किनारे स्किमर की संख्या 400 से बढ़कर एक हजार से ऊपर हो गई है। घोंसलों के जीवित रहने की दर भी दोगुनी हो गई है।
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पुरस्कार से क्या मिलेगा?
शेख इस राशि से अपनी पहल को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज तक बढ़ाना चाहती हैं, जहां गंगा और यमुना का संगम होता है। हालांकि यहां तीर्थयात्रियों की भीड़, नौका यातायात, मछली पकड़ने की गतिविधियां और प्रदूषण जैसी चुनौतियां भी हैं।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
फिर भी इन्हें नीतिगत या वित्तीय सहायता में वह जगह नहीं मिली जो मिलनी चाहिए। नेहा यह भी कहती हैं कि इन दोनों महिलाओं का काम संरक्षित क्षेत्रों से बाहर की जगहों की तरफ ध्यान खींचता है। साथ ही जल विज्ञान यानी हाइड्रोलॉजी (Hydrology) के संरक्षण में महत्व को भी रेखांकित करता है।
महिलाओं के लिए प्रेरणा
यह खबर क्यों जरूरी है?
हिमालयी सैलामैंडर और भारतीय स्किमर जैसी प्रजातियां उन पारिस्थितिक तंत्रों का हिस्सा हैं जिन पर करोड़ों भारतीयों की आजीविका टिकी है। जब वेटलैंड नष्ट होते हैं, तो नदियां कमजोर पड़ती हैं, खेती प्रभावित होती है और पीने का पानी खतरे में पड़ता है।
यह खबर यह भी बताती है कि जमीनी स्तर पर महिलाओं के नेतृत्व में हो रहा संरक्षण कार्य वैश्विक स्तर पर मान्यता पा रहा है। डिजिटल युग में ऐसी खबरें जागरूकता फैलाने का काम करती हैं और समाज को जिम्मेदार नागरिक बनने की दिशा में प्रेरित करती हैं।
FAQ
- व्हिटली पुरस्कार यानी ग्रीन ऑस्कर क्या होता है और यह किसे दिया जाता है?
व्हिटली पुरस्कार को दुनियाभर में ग्रीन ऑस्कर कहा जाता है। यह ब्रिटेन की संस्था व्हिटली फंड फॉर नेचर की ओर से दिया जाता है। यह पुरस्कार उन लोगों को मिलता है जो विकासशील देशों में जमीनी स्तर पर जीव-जंतुओं और पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के लिए काम करते हैं। इसके साथ 50,000 पाउंड यानी करीब 64.75 लाख रुपए की राशि भी दी जाती है। - हिमालयी सैलामैंडर क्यों खतरे में है और इसे बचाने के लिए क्या किया जा रहा है?
हिमालयी सैलामैंडर दार्जिलिंग और पूर्वी नेपाल की पहाड़ियों में पाया जाने वाला एक छोटा उभयचर जीव है। वेटलैंड्स के खत्म होने, बारिश के बदलते पैटर्न और चिट्रिड कवक जैसे खतरों के कारण यह अब 50 हेक्टेयर से भी कम इलाके में बचा है। बरखा सुब्बा वेटलैंड्स को बहाल करने, आक्रामक प्रजातियों को हटाने और स्थानीय समुदायों को जागरूक करने का काम कर रही हैं। - परवीन शेख की 'गार्जियंस ऑफ द स्किमर' पहल क्या है और इसके क्या नतीजे रहे?
'गार्जियंस ऑफ द स्किमर' परवीन शेख की एक पहल है जिसमें चंबल नदी के किनारे रहने वाले स्थानीय समुदायों को भारतीय स्किमर पक्षी के घोंसलों की निगरानी और सुरक्षा में शामिल किया जाता है। इससे उन्हें मौसमी रोजगार भी मिलता है। पिछले करीब एक दशक में इस पहल के जरिए चंबल में स्किमर की संख्या 400 से बढ़कर 1,000 से ऊपर पहुंच गई है और घोंसलों के जीवित रहने की दर दोगुनी हो गई है।
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