मोमोज लवर्स को नहीं पता होगा ये सच, कैसे और क्यों बनी थी उनकी फेवरेट डिश
Anjali Dwivedi | Apr 11, 2026, 17:41 IST
history of momos
क्या आप जानते हैं मोमोज का आविष्कार 600 साल पहले तिब्बत में केवल जिंदा रहने की मजबूरी में हुआ था? बर्फीली वादियों से निकलकर यह डिश कैसे भारत की पसंद बन गई, जानिए इसका पूरा सफर।
शाम ढलते ही गली-नुक्कड़ पर मोमोज की स्टॉल के पास उमड़ने वाली भीड़ आज एक आम नजारा है। देश का कोई भी कोना, तीखी लाल चटनी और मेयोनीज के साथ परोसे जाने वाले मोमोज की दीवानगी हर उम्र के लोगों के सिर चढ़कर बोलती है।
अक्सर लोग इसे एक आधुनिक फास्ट फूड समझते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिसे आप आज स्वाद के लिए खाते हैं, उसका जन्म असल में 600 साल पहले पेट भरने की मजबूरी के चलते हुआ था?
मोमो का इतिहास सदियों पुराना है और इसका सीधा संबंध तिब्बत की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों (Geographical Conditions) से है। ऐसा बताया जाता है 14वीं-15वीं सदी के आसपास तिब्बत के बेहद ठंडे इलाकों में खेती-बाड़ी करना लगभग नामुमकिन था। खाने-पीने के संसाधन बेहद सीमित थे।
ऐसे में वहां के लोगों ने सर्वाइव करने के लिए एक तकनीक खोजी। उन्होंने मैदे की एक पतली परत के अंदर मांस भरकर उसे भाप में पकाना शुरू किया। इसे तिब्बती भाषा में मोग-मोग कहा जाता था। कम संसाधनों में ज्यादा लोगों का पेट भरने और शरीर को गर्मी देने का यह सबसे आसान तरीका था।
मोमो को तिब्बत की सीमाओं से बाहर ले जाने का श्रेय नेवारी व्यापारियों को जाता है। साल 1960 के आसपास, काठमांडू के ये व्यापारी व्यापार के सिलसिले में ल्हासा (तिब्बत) जाया करते थे।
वहां उन्हें यह डिश इतनी पसंद आई कि वे इसकी रेसिपी अपने साथ नेपाल ले आए। नेपाल में इसे ममो (Mamo) कहा जाने लगा और वहां के स्थानीय मसालों ने इसके स्वाद को एक नई पहचान दी। यहीं से मोमोज का सफर दक्षिण एशिया की ओर शुरू हुआ।
भारत में मोमोज की एंट्री साल 1959 के बाद हुई। जब बड़ी संख्या में तिब्बती शरणार्थी दलाई लामा के साथ भारत आए, तो वे अपनी संस्कृति के साथ अपना खान-पान भी लाए।
धर्मशाला, दार्जिलिंग, सिक्किम और दिल्ली के मजनू का टीला जैसे इलाकों में बसे इन लोगों ने मोमोज की विरासत को जिंदा रखा। 90 के दशक के अंत तक आते-आते इसने दिल्ली की गलियों में अपनी पैठ बना ली और आज यह भारतीय स्ट्रीट फूड का राजा बन चुका है।
मजबूरी से मॉडर्न
जो डिश कभी अनाज की कमी के कारण मजबूरी में खाई जाती थी, वह आज युवाओं का कंफर्ट फूड बन चुकी है। भारतीय स्वाद के अनुसार इसमें कई बदलाव किए गए।
आज बाजार में स्टीम्ड के अलावा तंदूरी, फ्राइड, कुरकुरे, पनीर और सोया मोमोज जैसी अनगिनत वैरायटी मौजूद हैं। 600 साल पहले जिंदा रहने के लिए शुरू हुआ यह सफर आज हर भारतीय की जुबान पर स्वाद बनकर चढ़ गया है।
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अक्सर लोग इसे एक आधुनिक फास्ट फूड समझते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिसे आप आज स्वाद के लिए खाते हैं, उसका जन्म असल में 600 साल पहले पेट भरने की मजबूरी के चलते हुआ था?
कहां हुआ था मोमो का जन्म
ऐसे में वहां के लोगों ने सर्वाइव करने के लिए एक तकनीक खोजी। उन्होंने मैदे की एक पतली परत के अंदर मांस भरकर उसे भाप में पकाना शुरू किया। इसे तिब्बती भाषा में मोग-मोग कहा जाता था। कम संसाधनों में ज्यादा लोगों का पेट भरने और शरीर को गर्मी देने का यह सबसे आसान तरीका था।
तिब्बत से बाहर कैसे निकला यह जायका
वहां उन्हें यह डिश इतनी पसंद आई कि वे इसकी रेसिपी अपने साथ नेपाल ले आए। नेपाल में इसे ममो (Mamo) कहा जाने लगा और वहां के स्थानीय मसालों ने इसके स्वाद को एक नई पहचान दी। यहीं से मोमोज का सफर दक्षिण एशिया की ओर शुरू हुआ।
भारत में शरणार्थियों के साथ हुई एंट्री
धर्मशाला, दार्जिलिंग, सिक्किम और दिल्ली के मजनू का टीला जैसे इलाकों में बसे इन लोगों ने मोमोज की विरासत को जिंदा रखा। 90 के दशक के अंत तक आते-आते इसने दिल्ली की गलियों में अपनी पैठ बना ली और आज यह भारतीय स्ट्रीट फूड का राजा बन चुका है।
मजबूरी से मॉडर्न स्नैक तक का शानदार सफर
आज बाजार में स्टीम्ड के अलावा तंदूरी, फ्राइड, कुरकुरे, पनीर और सोया मोमोज जैसी अनगिनत वैरायटी मौजूद हैं। 600 साल पहले जिंदा रहने के लिए शुरू हुआ यह सफर आज हर भारतीय की जुबान पर स्वाद बनकर चढ़ गया है।
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