इंदौर की 78 साल की दादी को मिला गोल्ड मेडल, थम गईं सबकी निगाहें, पढ़ें इनकी इंस्पिरेशनल जर्नी
Kaushiki | Feb 18, 2026, 11:16 IST
INDORE GOLDEN DADI
इंदौर की 78 वर्षीय सुषमा मोघे ने DAVV में MA मराठी में गोल्ड मेडल जीता। रिटायरमेंट के बाद पढ़ाई शुरू कर उन्होंने पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल पेश की है।
Inspirational Story:कहते हैं कि अगर मन में कुछ कर गुजरने की चाहत हो, तो उम्र की सीमा कभी मायने नहीं रखती। मध्यप्रदेश के इंदौर की 78 साल सुषमा प्रदीप मोघे ने इसी जज्बे के साथ एक नया इतिहास रच दिया है। उन्होंने अपनी उम्र को मात देते हुए देवी अहिल्या विश्वविद्यालय (DAVV) के दीक्षांत समारोह में MA मराठी में गोल्ड मेडल हासिल किया है।
40 साल तक शिक्षिका रहने के बाद रिटायरमेंट के इस स्टेज पर उनकी ये सफलता हर किसी को जोश से भर देने वाली है। जब वे मंच पर अपना गोल्ड मेडल लेने पहुंचीं, तो राज्यपाल सहित पूरा हॉल उनके सम्मान में तालियों से गूंज उठा। उनकी ये कहानी साबित करती है कि सीखने की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती है।
इंदौर देवी अहिल्या विश्वविद्यालय (DAVV) का दीक्षांत समारोह(DAVV दीक्षांत समारोह) बहुत ही खास रहा। इस समारोह में सुषमा मोघे ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा। उन्हें MA मराठी में हाईएस्ट स्कोर लाने पर गोल्ड मेडल मिला।
जैसे ही सुषमा मोघे का नाम पुकारा गया, पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा। चीफ गेस्ट और राज्यपाल मंगुभाई पटेल भी उन्हें देखकर हैरान रह गए। राज्यपाल ने खुद आगे बढ़कर उनका अभिवादन किया और उन्हें सम्मानित किया।
ऑडियंस में बैठे उनके बेटे गौरव, बहू पूजा और पोते रेयांश की खुशी का ठिकाना नहीं था। उनके परिवार ने खड़े होकर तालियां बजाईं। पोते रेयांश ने अपनी दादी की इस अचीवमेंट पर गर्व महसूस किया।
सुषमा मोघे का रिश्ता किताबों से बहुत पुराना और गहरा है। उन्होंने छत्तीसगढ़ के चिरमिरी में 40 साल तक पढ़ाया है। वे केंद्रीय विद्यालय में एक समर्पित और होनहार शिक्षिका रही हैं। उनके पास पहले से ही जीवाजी यूनिवर्सिटी से एमएससी केमिस्ट्री की डिग्री है।
साल 2000 में वे रिटायर होकर इंदौर में बस गईं। रिटायरमेंट के बाद भी उन्होंने पढ़ना कभी नहीं छोड़ा। वे इंदौर में कई लाइब्रेरी और रीडिंग ग्रुप से जुड़ी रहीं। ज्ञान के प्रति उनकी भूख ने उन्हें फिर कॉलेज पहुंचाया।
करीब तीन साल पहले सुषमा मोघे ने एक ऑनलाइन लिटरेचर ग्रुप पर मैसेज देखा। वो मैसेज अटल बिहारी वाजपेयी आर्ट्स एंड कॉमर्स कॉलेज में MA मराठी के एडमिशन के बारे में था।
सबसे पहले उन्होंने अपनी 44 साल की बेटी नंदिनी को एडमिशन के लिए प्रेरित किया। लेकिन जब नंदिनी ने मना कर दिया, तो सुषमा मोघे ने खुद पढ़ने का फैसला किया।
सुषमा मोघे ने सोचा कि वे अपनी इच्छा अब खुद पूरी करेंगी। उन्होंने कॉलेज में दाखिला लिया और खूब मेहनत की। आज उनकी मेहनत सबके सामने सोने की तरह चमक रही है।
सुषमा मोघे की कहानी हर छात्र के लिए एक सबक है। उनकी ये कहानी हमें सिखाती है कि जिज्ञासा कभी खत्म नहीं होनी चाहिए। वे हमें सिखाती हैं कि मुश्किलों से घबराना नहीं चाहिए। पढ़ाई के लिए बस लगन और अनुशासन की जरूरत होती है। उन्होंने अपनी उम्र को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया।
आज के युवा उनसे मेहनत करने का तरीका सीख सकते हैं। उन्होंने समाज को शिक्षा के प्रति एक नया नजरिया दिया। उनकी सफलता ये बताती है कि कोशिश कभी बेकार नहीं होती। इंदौर अपनी इस गोल्डन दादी पर गर्व कर रहा है। रोचक किस्से
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40 साल तक शिक्षिका रहने के बाद रिटायरमेंट के इस स्टेज पर उनकी ये सफलता हर किसी को जोश से भर देने वाली है। जब वे मंच पर अपना गोल्ड मेडल लेने पहुंचीं, तो राज्यपाल सहित पूरा हॉल उनके सम्मान में तालियों से गूंज उठा। उनकी ये कहानी साबित करती है कि सीखने की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती है।
समारोह में जब थम गईं सबकी निगाहें
जैसे ही सुषमा मोघे का नाम पुकारा गया, पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा। चीफ गेस्ट और राज्यपाल मंगुभाई पटेल भी उन्हें देखकर हैरान रह गए। राज्यपाल ने खुद आगे बढ़कर उनका अभिवादन किया और उन्हें सम्मानित किया।
ऑडियंस में बैठे उनके बेटे गौरव, बहू पूजा और पोते रेयांश की खुशी का ठिकाना नहीं था। उनके परिवार ने खड़े होकर तालियां बजाईं। पोते रेयांश ने अपनी दादी की इस अचीवमेंट पर गर्व महसूस किया।
शिक्षण से लेकर छात्र बनने तक का सफर
साल 2000 में वे रिटायर होकर इंदौर में बस गईं। रिटायरमेंट के बाद भी उन्होंने पढ़ना कभी नहीं छोड़ा। वे इंदौर में कई लाइब्रेरी और रीडिंग ग्रुप से जुड़ी रहीं। ज्ञान के प्रति उनकी भूख ने उन्हें फिर कॉलेज पहुंचाया।
जब बेटी ने किया मना, तो खुद संभाली कमान
सबसे पहले उन्होंने अपनी 44 साल की बेटी नंदिनी को एडमिशन के लिए प्रेरित किया। लेकिन जब नंदिनी ने मना कर दिया, तो सुषमा मोघे ने खुद पढ़ने का फैसला किया।
सुषमा मोघे ने सोचा कि वे अपनी इच्छा अब खुद पूरी करेंगी। उन्होंने कॉलेज में दाखिला लिया और खूब मेहनत की। आज उनकी मेहनत सबके सामने सोने की तरह चमक रही है।
युवाओं के लिए प्रेरणा
आज के युवा उनसे मेहनत करने का तरीका सीख सकते हैं। उन्होंने समाज को शिक्षा के प्रति एक नया नजरिया दिया। उनकी सफलता ये बताती है कि कोशिश कभी बेकार नहीं होती। इंदौर अपनी इस गोल्डन दादी पर गर्व कर रहा है। रोचक किस्से
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