News Strike : अगले चुनाव तक रिटायर हो जाएगी बीजेपी नेताओं की पूरी खेप; मप्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के ये नेता होंगे रिटायर?
Harish Divekar | Dec 26, 2025, 07:00 IST
Photograph: (thesootr)
बीजेपी नेताओं की बढ़ती रिटायरमेंट की संभावना पर चर्चा हो रही है। खासकर मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में। कई वरिष्ठ नेता जैसे गोपाल भार्गव, वसुंधरा राजे, रमन सिंह सहित कई अन्य को आगामी चुनावों में साइडलाइन किया जा सकता है।
News Strike (न्यूज स्ट्राइक) : राजनीति के धुरंधर अगले विधानसभा या लोकसभा चुनाव से पहले रिटायर होंगे या साइडलाइन कर दिए जाएंगे। बीजेपी अब तक जिस पैटर्न पर अपने पुराने नेताओं को हाशिए पर भेजती आई है और नई लीडरशिप को फ्रंट पर आ रही है। उसे देखते हुए लगता है कि कुछ ही सालों के भीतर नेताओं की लंबी चौड़ी जमात किनारे पर नजर आएगी। मैं ये बात खासतौर से मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के संदर्भों में कर रहा हूं।
आपको मध्यप्रदेश के नेता गोपाल भार्गव का नाम याद ही होगा। गोपाल भार्गव का नहीं तो अनूप मिश्रा, जयभान सिंह पवैया जैसे कई नाम याद ही होंगे। राजस्थान के हैं तो वसुंधरा राजे सिंधिया का नाम आपके लिए नया नहीं होगा और छत्तीसगढ़ के हैं तो रमन सिंह और उनके दौर के कई दिग्गजों का नाम जरूर जानते होंगे।
अब एक बार अपनी सियासी मेमौरी को जरा रीफ्रेश करिए और फिर उस दौर के बीजेपी नेताओं के एक-एक नाम को याद कीजिए। उसके बाद मौजूदा राजनीतिक सीनेरियो पर नजर डालिए और बताइए कि उसमें से कितने नेता अब एक्टिव नजर आते हैं। या एक्टिव होना चाहते हों, लेकिन बीजेपी ने न तो संगठन में जिम्मेदारी दी है न सत्ता में कोई जगह दी है।
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मध्यप्रदेश के हवाले से आपको समझाता हूं। मध्यप्रदेश में जब तक शिवराज सिंह चौहान की सरकार रही। तब तक गोपाल भार्गव, भूपेंद्र सिंह जैसे कई नेताओं को सत्ता में जगह मिलती रही। उन्होंने दमदार मंत्रालय भी संभाले और क्षेत्र में भी उनका बोल बाला रहा, लेकिन साल 2023 के बाद प्रदेश की पूरी सियासी तस्वीर ही बदल गई। सीएम पद पर नया चेहरा चमका तो कई वरिष्ठ विधायकों की सियासत बेनूर हो गई।
बीजेपी अगर इसी पैटर्न पर आगे भी काम करती है तो तीनों ही प्रदेश में ऐसे बहुत से नेता हैं जिनकी राजनीति का ये आखिरी पड़ाव हो सकता है। आने वाले विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी बहुत से विधायकों और सांसदों को सक्रिय राजनीति से बाहर कर सकती है और नई लीडरशिप को आगे ला सकती है।
आपको याद दिला दें कि मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान तीनों ही राज्यों में एक साथ विधानसभा चुनाव होते आए हैं और उसके चंद महीनों बाद ही लोकसभा चुनाव होते हैं। इस बार विधानसभा चुनाव 2023 में हुए। इस लिहाज से अगले विधानसभा चुनाव 2028 में होंगे और लोकसभा चुनाव 2029 में होंगे। उस समय तक बीजेपी के कौन-कौन से धुरंधर सियासी हाशिए के उस पार होते हैं वही समझने की कोशिश करेंगे।
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शुरुआत करते हैं मध्यप्रदेश से ही। मध्यप्रदेश में सीएम मोहन यादव की कैबिनेट में ही चार सबसे वरिष्ठ मंत्री ऐसे हैं जिनकी उम्र साठ पार हो चुकी है। इसमें डिप्टी सीएम जगदीश देवड़ा और राजेंद्र शुक्ल का नाम शामिल हैं। जगदीश देवड़ा तो करीब 68 साल के हो चुके हैं। इन दोनों के अलावा प्रहलाद पटेल और कैलाश विजयवर्गीय की भी उम्र भी कम नहीं है। कैलाश विजयवर्गीय 69 साल के हो चुके हैं।
अब तक सत्तर साल का एज क्राइटेरिया ही बीजेपी में फॉलो होता रहा है। उस लिहाज से भी देवड़ा और विजयवर्गीय शायद सक्रिय राजनीति में न रह सकें, लेकिन ताजा पेटर्न को भी समझें तो इन चार नेताओं के टिकट पर या सियासी भविष्य पर अगले चुनाव तक तलवार लटक सकती है। अगर ये राजनीति में टिके रहे तो ये तय मान कर चलिएगा कि उनके क्षेत्र या समाज में बीजेपी उनके कद का सीनियर नेता नहीं ढूंढ सकी है। इसलिए उनकी राजनीतिक चाल पहले की ही स्पीड से चल रही है।
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महाकौशल के बड़े चेहरे राकेश सिंह भी 63 साल के हो चुके हैं। सिंधिया समर्थकों में तुलसी राम सिलावट साठ साल की उम्र के आसपास के हैं। इनके राजनीतिक भविष्य पर भी कभी भी कॉमा या फुल स्टॉप लगाने की तैयारी हो सकती है।
रीति पाठक भी ऐसा नाम हैं जो सांसद का पद छोड़कर विधायक बनीं, लेकिन इस जीत के एवेज में उन्हें प्रदेश की सत्ता में कोई पद नहीं मिल सका है। हालांकि, ये उम्मीद की जा सकती है कि बड़ा पद मिले या न मिले अगले चुनाव में उन्हें टिकट मिल जाएगा।
मध्यप्रदेश की ही तर्ज पर बीजेपी ने राजस्थान और छत्तीसगढ़ की सरकार में बड़े बदलाव किए हैं। दोनों ही प्रदेशों में सीएम पद के चेहरे बदल दिए गए। राजस्थान के सीएम भजन लाल शर्मा भी ऐसे चेहरे हैं जिनके इस पद पर नजर आने की संभावना ना के बराबर ही थी। भजन लाल सीएम बने तो उसके बाद पुराने दिग्गजों के दिन भी लद गए। खासतौर से वसुंधरा राजे के बहुत से समर्थक सरकार में जगह मिलने के ही इंतजार में बैठे हुए हैं।
वैसे राजस्थान की भजनलाल कैबिनेट में सबसे उम्र दराज मंत्री की उम्र करीब 72 साल हैं। ये मंत्री हैं करोड़ी लाल मीणा। मीणा के अलावा प्रदेश के चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर 68 साल के हैं और स्कूल शिक्षा मंत्री मदन दिलावर भी 66 साल के हैं। साठ पार के मंत्रियों में जोगाराम पटेल, सुरेंद्र पाल सिंह, कन्हैया लाल चौधरी का नाम शामिल है।
कालीचरण सराफ, श्रीचंद कृपलानी, अनिता भदेल, प्रताप सिंह सिंघवी, अजय सिंह किलक, जोगेश्वर गर्ग और पुष्पेंद्र सिंह जैसे कई नाम हैं जो इस बार मंत्री पद के इंतजार में ही बैठे हुए हैं। इसमें कुछ ऐसे नाम भी शामिल हैं जो कभी वसुंधरा राजे के करीबी थे या समर्थक थे इसलिए उन्हें चुपचाप बिठा दिया गया है।
अब बात करते हैं छत्तीसगढ़ की। पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी की वापसी तो हुई, लेकिन रमन सिंह को सीएम बनने का मौकी नहीं मिला। उनकी जगह बीजेपी ने CM विष्णु देव साय को ये जिम्मेदारी सौंपी। जो खुद 60 साल के आसपास हैं। उनके एक उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा की उम्र भी साठ बरस के करीब हो चुकी है।
बात करें कैबिनेट के दूसरे सदस्यों की तो बृजमोहन अग्रवाल करीब 66 साल के हैं। राम विचार नेताम 63 साल के हैं। दोनों ही छत्तीसगढ़ की राजनीति के पुराने नाम भी हैं। दयालदास बघेल का नाम भी इसी पंक्ति में आता है जो पैंसठ के करीब पहुंच चुके हैं या जल्द पहुंचने वाले हैं। इसके अलावा भी अधिकांश मंत्रियों की उम्र पचास पार है।
बहुत से नेता तो ऐसे हैं जो सत्ता या संगठन में किसी जिम्मेदारी मिलने के इंतजार में है। इसमें कुछ प्रमुख नाम हैं पूर्व पंचायत मंत्री अजय चंद्राकर, वरिष्ठ विधायक शिवरतन शर्मा, पूर्व पीडब्ल्यूडी मंत्री राजेश मूणत, पूर्व गृह मंत्री नंकीराम कंवर और सांसद गुहाराम अजगल्ले।
इनमें पूर्व केंद्रीय मंत्री रेणुका सिंह का नाम भी शामिल है। विधानसभा चुनाव जीतने के बाद उन्होंने सांसद पद से इस्तीफा दे दिया था। दिलचस्प बात ये रही कि मुख्यमंत्री पद के लिए उनके नाम की भी सबसे ज्यादा चर्चा थी। इसके अलावा सांसद पद से इस्तीफा दे चुकीं गोमती साय, पूर्व नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक भी नई भूमिका की उम्मीद में हैं।
ये सभी वो नाम हैं, जिन्हें इस बार बीजेपी ने चुनाव का टिकट दिया जरूर, लेकिन कोई पद नहीं दिया. इसे देखकर लगता है कि अब से लेकर चुनाव तक अगर कोई और चेहरा इनकी सीट, इनके क्षेत्र या समाज में इनकी जगह लेने के लिए मुफीद लगा तो बीजेपी उसे आगे बढ़ा कर इन नेताओं को सक्रिय राजनीति से छुट्टी दे सकती है. हो सकता है कि अगले चुनाव में तीनों ही राज्यों में ऐसे बहुत सारे चेहरे चुनावी मैदान में नजर ही न आएं.
बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं का वर्तमान में प्रभाव
अब एक बार अपनी सियासी मेमौरी को जरा रीफ्रेश करिए और फिर उस दौर के बीजेपी नेताओं के एक-एक नाम को याद कीजिए। उसके बाद मौजूदा राजनीतिक सीनेरियो पर नजर डालिए और बताइए कि उसमें से कितने नेता अब एक्टिव नजर आते हैं। या एक्टिव होना चाहते हों, लेकिन बीजेपी ने न तो संगठन में जिम्मेदारी दी है न सत्ता में कोई जगह दी है।
ये खबर भी पढ़ें...
News Strike: धर्म परिवर्तन पर बवाल, डेथ पेनल्टी की पैरवी के बाद भी सजा देने में पिछड़ा
बीजेपी नई लीडरशिप को ला सकती है आगे
बीजेपी अगर इसी पैटर्न पर आगे भी काम करती है तो तीनों ही प्रदेश में ऐसे बहुत से नेता हैं जिनकी राजनीति का ये आखिरी पड़ाव हो सकता है। आने वाले विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी बहुत से विधायकों और सांसदों को सक्रिय राजनीति से बाहर कर सकती है और नई लीडरशिप को आगे ला सकती है।
आपको याद दिला दें कि मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान तीनों ही राज्यों में एक साथ विधानसभा चुनाव होते आए हैं और उसके चंद महीनों बाद ही लोकसभा चुनाव होते हैं। इस बार विधानसभा चुनाव 2023 में हुए। इस लिहाज से अगले विधानसभा चुनाव 2028 में होंगे और लोकसभा चुनाव 2029 में होंगे। उस समय तक बीजेपी के कौन-कौन से धुरंधर सियासी हाशिए के उस पार होते हैं वही समझने की कोशिश करेंगे।
ये खबर भी पढ़ें...
News Strike : छिंदवाड़ा में सीएम, प्रदेशाध्यक्ष के सामने आई गुटबाजी, विवेक बंटी साहू के साथ ऐसा ‘बर्ताव’!
70 साल का एज क्राइटेरिया आ सकता है आड़े
अब तक सत्तर साल का एज क्राइटेरिया ही बीजेपी में फॉलो होता रहा है। उस लिहाज से भी देवड़ा और विजयवर्गीय शायद सक्रिय राजनीति में न रह सकें, लेकिन ताजा पेटर्न को भी समझें तो इन चार नेताओं के टिकट पर या सियासी भविष्य पर अगले चुनाव तक तलवार लटक सकती है। अगर ये राजनीति में टिके रहे तो ये तय मान कर चलिएगा कि उनके क्षेत्र या समाज में बीजेपी उनके कद का सीनियर नेता नहीं ढूंढ सकी है। इसलिए उनकी राजनीतिक चाल पहले की ही स्पीड से चल रही है।
ये खबर भी पढ़ें...
News Strike : नर्मदा परिक्रमा पर निकलेंगी प्रहलाद पटेल की बेटी, टूटेगा गिनीज बुक रिकॉर्ड, आगे क्या है प्लानिंग?
बात करते हैं उम्रदराज हो रहे कुछ नेताओं की...
रीति पाठक भी ऐसा नाम हैं जो सांसद का पद छोड़कर विधायक बनीं, लेकिन इस जीत के एवेज में उन्हें प्रदेश की सत्ता में कोई पद नहीं मिल सका है। हालांकि, ये उम्मीद की जा सकती है कि बड़ा पद मिले या न मिले अगले चुनाव में उन्हें टिकट मिल जाएगा।
अब राजस्थान के कुछ नेताओं पर एक नजर
वैसे राजस्थान की भजनलाल कैबिनेट में सबसे उम्र दराज मंत्री की उम्र करीब 72 साल हैं। ये मंत्री हैं करोड़ी लाल मीणा। मीणा के अलावा प्रदेश के चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर 68 साल के हैं और स्कूल शिक्षा मंत्री मदन दिलावर भी 66 साल के हैं। साठ पार के मंत्रियों में जोगाराम पटेल, सुरेंद्र पाल सिंह, कन्हैया लाल चौधरी का नाम शामिल है।
कालीचरण सराफ, श्रीचंद कृपलानी, अनिता भदेल, प्रताप सिंह सिंघवी, अजय सिंह किलक, जोगेश्वर गर्ग और पुष्पेंद्र सिंह जैसे कई नाम हैं जो इस बार मंत्री पद के इंतजार में ही बैठे हुए हैं। इसमें कुछ ऐसे नाम भी शामिल हैं जो कभी वसुंधरा राजे के करीबी थे या समर्थक थे इसलिए उन्हें चुपचाप बिठा दिया गया है।
छत्तीसगढ़ के ये नेता साठ बरस के करीब
बात करें कैबिनेट के दूसरे सदस्यों की तो बृजमोहन अग्रवाल करीब 66 साल के हैं। राम विचार नेताम 63 साल के हैं। दोनों ही छत्तीसगढ़ की राजनीति के पुराने नाम भी हैं। दयालदास बघेल का नाम भी इसी पंक्ति में आता है जो पैंसठ के करीब पहुंच चुके हैं या जल्द पहुंचने वाले हैं। इसके अलावा भी अधिकांश मंत्रियों की उम्र पचास पार है।
इन नेताओं को जिम्मेदारी मिलने का इंतजार
इनमें पूर्व केंद्रीय मंत्री रेणुका सिंह का नाम भी शामिल है। विधानसभा चुनाव जीतने के बाद उन्होंने सांसद पद से इस्तीफा दे दिया था। दिलचस्प बात ये रही कि मुख्यमंत्री पद के लिए उनके नाम की भी सबसे ज्यादा चर्चा थी। इसके अलावा सांसद पद से इस्तीफा दे चुकीं गोमती साय, पूर्व नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक भी नई भूमिका की उम्मीद में हैं।
ये सभी वो नाम हैं, जिन्हें इस बार बीजेपी ने चुनाव का टिकट दिया जरूर, लेकिन कोई पद नहीं दिया. इसे देखकर लगता है कि अब से लेकर चुनाव तक अगर कोई और चेहरा इनकी सीट, इनके क्षेत्र या समाज में इनकी जगह लेने के लिए मुफीद लगा तो बीजेपी उसे आगे बढ़ा कर इन नेताओं को सक्रिय राजनीति से छुट्टी दे सकती है. हो सकता है कि अगले चुनाव में तीनों ही राज्यों में ऐसे बहुत सारे चेहरे चुनावी मैदान में नजर ही न आएं.
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