केंद्र का पैसा खर्च करने में कंजूस छत्तीसगढ़ सरकार, 3 हजार करोड़ मिले 1 हजार करोड़ बचा लिए
Arun Tiwari | Apr 08, 2026, 17:47 IST
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छत्तीसगढ़ सरकार ने केंद्र से मिली शहरी विकास के लिए 3,352 करोड़ रुपए में से केवल 64.73% राशि खर्च की, जबकि 1,182 करोड़ रुपए का फंड उपयोग ही नहीं हुआ। इससे कई महत्वपूर्ण शहरी योजनाएं अधूरी रह गईं हैं
Raipur :छत्तीसगढ़ सरकार पैसा खर्च करने में बहुत कंजूस है। वो भी तब जबकि पैसा केंद्र सरकार की तरफ से आया हो। केंद्र सरकार ने शहरी विकास के लिए फंड भेजा लेकिन प्रदेश सरकार से खर्च ही नहीं हुआ।
राज्य में शहरी विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में बड़ी लापरवाही सामने आई है। केंद्र सरकार से मिली 1,182 करोड़ रुपए की राशि समय पर खर्च नहीं की जा सकी। इससे कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं अधूरी रह गईं और विकास कार्यों की रफ्तार प्रभावित हुई।
राज्य को शहरी विकास के लिए अलग अलग योजनाओं के तहत कुल 5 हजार 179 करोड़ रुपए का बजट प्रावधान मिला था। जिसमें से 3 हजार 352 करोड़ रुपए जारी भी किए गए। बावजूद इसके विभाग अब तक केवल 64.73 फीसदी राशि ही खर्च कर पाया है।
बाकी 1 हजार 182 करोड़ रुपए उपयोग न होने के कारण लंबित पड़े हैं। शहरी योजनाओं में सबसे ज्यादा असर आवास, स्वच्छता और इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर पड़ा है। कई मामलों में काम शुरू होने के बाद भी समय पर पूरा नहीं हो सका।
बताया जा रहा है कि शहरी विकास से जुड़ी योजनाओं में आवास, स्वच्छता, पेयजल, सड़क और अन्य बुनियादी सुविधाओं के प्रोजेक्ट शामिल थे। इन योजनाओं का उद्देश्य शहरों में बुनियादी ढांचे को मजबूत करना और नागरिकों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराना था।
हालांकि, योजनाओं के क्रियान्वयन में सुस्ती और समन्वय की कमी के कारण कई प्रोजेक्ट समय पर पूरे नहीं हो पाए। कुछ मामलों में तो काम शुरू ही नहीं हो सका, जबकि कई योजनाएं आधी-अधूरी अवस्था में पड़ी हैं।
विभागीय सूत्रों के अनुसार, टेंडर प्रक्रिया में देरी, तकनीकी अड़चनें और विभिन्न विभागों के बीच तालमेल की कमी इस स्थिति के प्रमुख कारण हैं।
कई बार परियोजनाओं की स्वीकृति के बाद भी समय पर टेंडर जारी नहीं किए गए, जिससे काम शुरू होने में ही लंबा समय लग गया। इसके अलावा निर्माण कार्यों की निगरानी में भी ढिलाई बरती गई, जिससे काम की गुणवत्ता और गति दोनों प्रभावित हुईं।
केंद्र सरकार ने इस स्थिति को गंभीरता से लेते हुए समय पर राशि का उपयोग नहीं होने पर अगली किस्त जारी करने में भी सख्ती बरती है। कई मामलों में आगे की फंडिंग रोक दी गई है, जिससे भविष्य की परियोजनाओं पर भी असर पड़ सकता है।
इसका सीधा असर शहरों के विकास कार्यों और आम जनता को मिलने वाली सुविधाओं पर पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि योजनाओं की नियमित मॉनिटरिंग और प्रभावी क्रियान्वयन नहीं किया गया, तो इस तरह की स्थिति आगे भी बनी रह सकती है।
इसके लिए जरूरी है कि प्रशासनिक स्तर पर जवाबदेही तय की जाए और समयबद्ध तरीके से योजनाओं को पूरा करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं।
सरकार की ओर से दावा किया गया है कि इस समस्या को दूर करने के लिए सुधारात्मक कदम उठाए जा रहे हैं। प्रक्रियाओं को सरल बनाने, टेंडरिंग सिस्टम में पारदर्शिता लाने और विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने पर जोर दिया जा रहा है।
साथ ही, लंबित परियोजनाओं को जल्द से जल्द पूरा करने के निर्देश भी दिए गए हैं। कुल मिलाकर, यह मामला न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है
बल्कि यह भी दर्शाता है कि योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के बिना विकास की कल्पना अधूरी है। यदि समय रहते सुधार नहीं किया गया, तो इससे राज्य के शहरी विकास की रफ्तार पर लंबे समय तक असर पड़ सकता है।
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राज्य में शहरी विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में बड़ी लापरवाही सामने आई है। केंद्र सरकार से मिली 1,182 करोड़ रुपए की राशि समय पर खर्च नहीं की जा सकी। इससे कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं अधूरी रह गईं और विकास कार्यों की रफ्तार प्रभावित हुई।
विकास के खर्च में कंजूसी क्यों
बाकी 1 हजार 182 करोड़ रुपए उपयोग न होने के कारण लंबित पड़े हैं। शहरी योजनाओं में सबसे ज्यादा असर आवास, स्वच्छता और इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर पड़ा है। कई मामलों में काम शुरू होने के बाद भी समय पर पूरा नहीं हो सका।
इन योजनाओं पर पड़ा असर
हालांकि, योजनाओं के क्रियान्वयन में सुस्ती और समन्वय की कमी के कारण कई प्रोजेक्ट समय पर पूरे नहीं हो पाए। कुछ मामलों में तो काम शुरू ही नहीं हो सका, जबकि कई योजनाएं आधी-अधूरी अवस्था में पड़ी हैं।
विभागीय सूत्रों के अनुसार, टेंडर प्रक्रिया में देरी, तकनीकी अड़चनें और विभिन्न विभागों के बीच तालमेल की कमी इस स्थिति के प्रमुख कारण हैं।
कई बार परियोजनाओं की स्वीकृति के बाद भी समय पर टेंडर जारी नहीं किए गए, जिससे काम शुरू होने में ही लंबा समय लग गया। इसके अलावा निर्माण कार्यों की निगरानी में भी ढिलाई बरती गई, जिससे काम की गुणवत्ता और गति दोनों प्रभावित हुईं।
आगे की किस्तें अटकी
इसका सीधा असर शहरों के विकास कार्यों और आम जनता को मिलने वाली सुविधाओं पर पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि योजनाओं की नियमित मॉनिटरिंग और प्रभावी क्रियान्वयन नहीं किया गया, तो इस तरह की स्थिति आगे भी बनी रह सकती है।
इसके लिए जरूरी है कि प्रशासनिक स्तर पर जवाबदेही तय की जाए और समयबद्ध तरीके से योजनाओं को पूरा करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं।
सरकार का दावा
साथ ही, लंबित परियोजनाओं को जल्द से जल्द पूरा करने के निर्देश भी दिए गए हैं। कुल मिलाकर, यह मामला न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है
बल्कि यह भी दर्शाता है कि योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के बिना विकास की कल्पना अधूरी है। यदि समय रहते सुधार नहीं किया गया, तो इससे राज्य के शहरी विकास की रफ्तार पर लंबे समय तक असर पड़ सकता है।
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