रायपुर की लाइफ लाइन खारुन नदी को बचाने कागजों में बन गए चेक डेम, ग्राम पंचायतों ने सुखा दिए 22 हेक्टेयर में लगे पौधे
Arun Tiwari | Apr 21, 2026, 12:49 IST
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राजधानी रायपुर की जीवनरेखा खारुन नदी के संरक्षण कार्यों पर गंभीर सवाल उठे हैं। हालिया रिपोर्ट के अनुसार 2000 से अधिक चेक डेम या तो टूट गए या बह गए, जबकि 22 हेक्टेयर में लगाए गए पौधों में से 60% से ज्यादा सूख चुके हैं।
Raipur. छत्तीसगढ़ में 120 किलोमीटर बहती खारुन नदी राजधानी रायपुर की लाइफ लाइन मानी जाती है। खारुन नदी को बचाने के लिए फंड तो आता है लेकिन वो नदी में ही बह जाता है। हाल ही में सरकार को एक रिपोर्ट मिली है।
इस रिपोर्ट ने सरकार को बता दिया कि चेक डेम कहां बन रहे हैं और पौधे कहां लगाए जा रहे हैं। अधिकारियों ने ऐसे ऐसे चेकडेम बनाए जो बारिश होने से टूट गए। और यह चेकडेम एक दो नहीं बल्कि 2 हजार से ज्यादा हैं।
वहीं 22 हेक्टेयर में लगे पौधे ग्राम पंचायतों के हवाले किए गए लेकिन 60 फीसदी से ज्यादा पौधे तो मर गए। अब सवाल पैदा होता है कि यह चेकडेम जमीन की जगह कहीं कागज में तो नहीं बन गए। वहीं ये पौधे वाकई लगे थे या फिर दिखाए गए थे।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के लिए जीवनरेखा मानी जाने वाली खारुन नदी (Kharun River) को बचाने के नाम पर हो रहे कार्यों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। लगभग 120 किलोमीटर लंबी इस नदी के संरक्षण के लिए हर साल सरकार द्वारा करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं लेकिन हाल ही में सामने आई एक रिपोर्ट ने इन कामों की पोल खोलकर रख दी है।
रिपोर्ट के मुताबिक नदी संरक्षण के तहत बनाए गए चेक डेम और पौधे लगाने कामों में बड़े स्तर पर लापरवाही और अनियमितताएं सामने आई हैं। अधिकारियों ने नदी के जल स्तर को बनाए रखने के लिए बड़ी संख्या में चेक डेम निर्माण का दावा किया। लेकिन जांच में पता चला कि इनमें से कई चेक डेम या तो कमजोर निर्माण के कारण पहली ही बारिश में बह गए या फिर उनकी स्थिति इतनी खराब है कि वे किसी काम के नहीं रहे।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ऐसे चेक डेमों की संख्या एक-दो नहीं, बल्कि दो हजार से भी अधिक बताई जा रही है। इससे यह आशंका भी जताई जा रही है कि कहीं इन चेक डेमों का निर्माण केवल कागजों में ही तो नहीं दिखाया गया। यदि ऐसा है तो यह पर्यावरण संरक्षण के नाम पर एक बड़ा घोटाला भी हो सकता है।
इसी तरह नदी किनारे हरियाली बढ़ाने और कटाव रोकने के मकसद से 22 हेक्टेयर क्षेत्र में पौधारोपण किया गया था। इन पौधों की देखरेख की जिम्मेदारी ग्राम पंचायतों को सौंपी गई थी। लेकिन रिपोर्ट में सामने आया है कि लगाए गए पौधों में से 60 प्रतिशत से अधिक पौधे सूख चुके हैं।
यह जनवरी 2026 की स्थिति है। इसका मतलब साफ है कि पौधारोपण केवल औपचारिकता बनकर रह गया और उसकी देखभाल पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। या फिर इन पौधों के संरक्षण के लिए मिला पैसा पंचायत फंड में चला गया। सवाल यह भी है कि यह भी तो कहीं कागज के फूल ही तो नहीं थे।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इन खामियों को नहीं सुधारा गया तो खारुन नदी का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। नदी पहले ही प्रदूषण, अतिक्रमण और जल की कमी जैसी समस्याओं से जूझ रही है। ऐसे में संरक्षण के नाम पर हो रही लापरवाही स्थिति को और गंभीर बना सकती है।
इस पूरे मामले ने प्रशासन और संबंधित विभागों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब जरूरत है कि इन मामलों की निष्पक्ष जांच हो और दोषी अधिकारियों एवं संबंधित एजेंसियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। खारुन नदी केवल एक जलधारा नहीं बल्कि रायपुर की जीवनरेखा है।
इसे बचाने के लिए योजनाओं का सही क्रियान्वयन और जिम्मेदार रवैया बेहद जरूरी है वरना कागजों में बनी योजनाएं जमीन पर नदी को बचाने में नाकाम ही साबित होंगी। वन मंत्री केदार कश्यप मानते हैं कि रिपोर्ट में जो स्थिति आई है उस पर सरकार गंभीर है।
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इस रिपोर्ट ने सरकार को बता दिया कि चेक डेम कहां बन रहे हैं और पौधे कहां लगाए जा रहे हैं। अधिकारियों ने ऐसे ऐसे चेकडेम बनाए जो बारिश होने से टूट गए। और यह चेकडेम एक दो नहीं बल्कि 2 हजार से ज्यादा हैं।
वहीं 22 हेक्टेयर में लगे पौधे ग्राम पंचायतों के हवाले किए गए लेकिन 60 फीसदी से ज्यादा पौधे तो मर गए। अब सवाल पैदा होता है कि यह चेकडेम जमीन की जगह कहीं कागज में तो नहीं बन गए। वहीं ये पौधे वाकई लगे थे या फिर दिखाए गए थे।
रायपुर की लाइफ लाइन पर सवाल:
रिपोर्ट के मुताबिक नदी संरक्षण के तहत बनाए गए चेक डेम और पौधे लगाने कामों में बड़े स्तर पर लापरवाही और अनियमितताएं सामने आई हैं। अधिकारियों ने नदी के जल स्तर को बनाए रखने के लिए बड़ी संख्या में चेक डेम निर्माण का दावा किया। लेकिन जांच में पता चला कि इनमें से कई चेक डेम या तो कमजोर निर्माण के कारण पहली ही बारिश में बह गए या फिर उनकी स्थिति इतनी खराब है कि वे किसी काम के नहीं रहे।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ऐसे चेक डेमों की संख्या एक-दो नहीं, बल्कि दो हजार से भी अधिक बताई जा रही है। इससे यह आशंका भी जताई जा रही है कि कहीं इन चेक डेमों का निर्माण केवल कागजों में ही तो नहीं दिखाया गया। यदि ऐसा है तो यह पर्यावरण संरक्षण के नाम पर एक बड़ा घोटाला भी हो सकता है।
कागजों में बन गए चेक डेम :
- खारुन नदी पर बनाए गए चेक डेम - 7332
- जनवरी 2026 में इन डेम की संख्या - 5153
- चेक डेम जो बह गए या नष्ट हो गए - 2179
कागज के फूल :
यह जनवरी 2026 की स्थिति है। इसका मतलब साफ है कि पौधारोपण केवल औपचारिकता बनकर रह गया और उसकी देखभाल पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। या फिर इन पौधों के संरक्षण के लिए मिला पैसा पंचायत फंड में चला गया। सवाल यह भी है कि यह भी तो कहीं कागज के फूल ही तो नहीं थे।
इन पंचायतों ने सुखा दिए पौधे :
- ग्राम पंचायत गुमा - 14 हेक्टेयर
- ग्राम पंचायत दतरेगा - 3 हेक्टेयर
- ग्राम पंचायत चांदनीडीह - 5 हेक्टेयर
- वजह - सीवेज लाइन डालने में पौधे नष्ट
निष्कर्ष :
इस पूरे मामले ने प्रशासन और संबंधित विभागों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब जरूरत है कि इन मामलों की निष्पक्ष जांच हो और दोषी अधिकारियों एवं संबंधित एजेंसियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। खारुन नदी केवल एक जलधारा नहीं बल्कि रायपुर की जीवनरेखा है।
इसे बचाने के लिए योजनाओं का सही क्रियान्वयन और जिम्मेदार रवैया बेहद जरूरी है वरना कागजों में बनी योजनाएं जमीन पर नदी को बचाने में नाकाम ही साबित होंगी। वन मंत्री केदार कश्यप मानते हैं कि रिपोर्ट में जो स्थिति आई है उस पर सरकार गंभीर है।
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