131 लोगों की हत्या करने वाला पापाराव किस से मांगना चाहता है माफी? बातचीत में खोले नक्सल संगठन के गहरे राज
Harrison Masih | Apr 11, 2026, 20:00 IST
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छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के एक छोटे से गांव में जन्मा एक साधारण लड़का सुनम चंद्रय्या। वही लड़का आगे चलकर दक्षिण बस्तर में खौफ का दूसरा नाम बन गया। जानिए खूंखार कमांडर पापाराव ने क्यों डाले हथियार और किस्से मांगना चाहता है माफी...
छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के एक छोटे से गांव में जन्मा एक साधारण लड़का, जिसकी दुनिया खेत-खलिहान, परिवार और छोटे-छोटे सपनों तक सीमित थी। वही लड़का आगे चलकर दक्षिण बस्तर में खौफ का दूसरा नाम बन गया। करीब 17-18 साल की उम्र में वह नक्सल संगठन के संपर्क में आया और फिर उसका जीवन पूरी तरह बदल गया।
लड़के का असली नाम सुनम चंद्रय्या था। दिसंबर 1995 में कुख्यात नक्सली लीडर रमन्ना उसे अपने साथ जंगलों में ले गया और वहीं उसका नाम बदलकर ‘पापाराव’ रखा गया। यही वह मोड़ था, जहां से उसका बचपन, मासूमियत और सामान्य जीवन माओवादी हिंसा के अंधेरे में खो गया।
पापाराव ने नक्सल संगठन में एक सामान्य सदस्य के रूप में शुरुआत की, लेकिन धीरे-धीरे वह ACM, DVCM होते हुए DKSZCM कैडर तक पहुंच गया। करीब 30-31 साल तक वह संगठन से जुड़ा रहा और पश्चिम बस्तर डिवीजन का इंचार्ज बना। उस पर 25 लाख रूपए का इनाम भी घोषित था।
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, 100 से ज्यादा जवानों की शहादत से उसका नाम जुड़ा रहा। अंबेली और तर्रेम IED ब्लास्ट जैसी घटनाओं में उसकी भूमिका सामने आई है, जबकि ताड़मेटला, टेकलगुडेम और झीरम हमलों में उसकी संलिप्तता को लेकर अलग-अलग दावे हैं।
![paparao]()
दैनिक भास्कर से बातचीत में पापाराव ने बताया कि हमले की योजना बेहद सुनियोजित होती थी। पहले इलाके की रेकी की जाती थी, फिर सुरक्षाबलों की गतिविधियों पर नजर रखी जाती थी। इसके बाद IED लगाकर हमले को अंजाम दिया जाता था। कई बार स्थानीय लोगों से भी जानकारी मिलती थी।
उसने यह भी बताया कि नक्सलियों के पास मौजूद हथियार अधिकतर सुरक्षाबलों से लूटे गए होते थे, जैसे AK-47 और SLR। बड़े हमलों के बाद भारी मात्रा में हथियार कब्जे में लिए जाते थे।
पापाराव ने बताया कि उसकी दो शादियां हुई थीं। पहली शादी संगठन में शामिल होने से पहले हुई थी। बाद में उसने संगठन की एक महिला सदस्य से शादी की और नियमों के तहत नसबंदी भी करवाई। उसकी दूसरी पत्नी 2025 में एक मुठभेड़ में मारी गई।
![Naxalite commander Paparao]()
2005 में चले सलवा जुडूम अभियान पर उसने कहा कि गांवों को खाली कराने और जलाने का आरोप उसने सरकार और पुलिस पर लगाया, जबकि संगठन के फैसलों के तहत कुछ लोगों को गांव से बाहर निकाला जाता था।
पापाराव ने यह भी स्वीकार किया कि कुछ राजनीतिक हत्याएं संगठन की रणनीति का हिस्सा थीं। उसने कहा कि महेंद्र कर्मा को सलवा जुडूम का नेतृत्व करने के कारण निशाना बनाया गया था। वहीं भीमा मंडावी की हत्या उनके माओवादी विरोधी रुख की वजह से की गई।
हालांकि, उसने यह भी माना कि कुछ घटनाएं "गलती" थीं, जिनकी बाद में संगठन के भीतर समीक्षा भी की गई।
उसने बताया कि नक्सल संगठन आर्थिक रूप से उतना मजबूत नहीं था जितना अक्सर माना जाता है। दैनिक जरूरतों के लिए वे स्थानीय लोगों पर निर्भर रहते थे। पैसे और संसाधनों को जंगल में छिपाकर रखा जाता था।
पिछले कुछ वर्षों में संगठन लगातार कमजोर हुआ। बड़े नेताओं के मारे जाने, सुरक्षाबलों की बढ़ती मौजूदगी और लगातार हो रहे आत्मसमर्पणों ने संगठन की रीढ़ तोड़ दी। पापाराव ने भी इसी दबाव में अपने साथियों के साथ आत्मसमर्पण कर दिया।
सरेंडर के बाद पापाराव ने माना कि उसने गलत रास्ता चुना। उसने कहा कि वह उन परिवारों से माफी मांगना चाहता है, जिन्होंने अपने प्रियजनों को खोया। अब वह सामान्य जीवन जीना चाहता है और समाज के साथ मिलकर काम करना चाहता है। उसने यह भी स्पष्ट किया कि अब वह दोबारा हथियार नहीं उठाएगा, बल्कि जनता के बीच रहकर काम करेगा।
यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस पूरे दौर की है जहां भटके हुए रास्ते, विचारधारा और हिंसा ने कई जिंदगियां प्रभावित कीं। पापाराव का आत्मसमर्पण इस बात का संकेत है कि बदलते हालात में अब बस्तर में शांति की उम्मीद फिर से जगी है।
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लड़के का असली नाम सुनम चंद्रय्या था। दिसंबर 1995 में कुख्यात नक्सली लीडर रमन्ना उसे अपने साथ जंगलों में ले गया और वहीं उसका नाम बदलकर ‘पापाराव’ रखा गया। यही वह मोड़ था, जहां से उसका बचपन, मासूमियत और सामान्य जीवन माओवादी हिंसा के अंधेरे में खो गया।
संगठन में बढ़ता कद
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, 100 से ज्यादा जवानों की शहादत से उसका नाम जुड़ा रहा। अंबेली और तर्रेम IED ब्लास्ट जैसी घटनाओं में उसकी भूमिका सामने आई है, जबकि ताड़मेटला, टेकलगुडेम और झीरम हमलों में उसकी संलिप्तता को लेकर अलग-अलग दावे हैं।
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कैसे बनते थे हमले के प्लान
उसने यह भी बताया कि नक्सलियों के पास मौजूद हथियार अधिकतर सुरक्षाबलों से लूटे गए होते थे, जैसे AK-47 और SLR। बड़े हमलों के बाद भारी मात्रा में हथियार कब्जे में लिए जाते थे।
निजी जीवन और संगठन के नियम
Naxalite commander Paparao
सलवा जुडूम और हिंसा पर बयान
बड़े नेताओं की हत्या पर खुलासा
हालांकि, उसने यह भी माना कि कुछ घटनाएं "गलती" थीं, जिनकी बाद में संगठन के भीतर समीक्षा भी की गई।
आर्थिक स्थिति और संसाधन
क्यों किया सरेंडर?
अब आगे क्या?
यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस पूरे दौर की है जहां भटके हुए रास्ते, विचारधारा और हिंसा ने कई जिंदगियां प्रभावित कीं। पापाराव का आत्मसमर्पण इस बात का संकेत है कि बदलते हालात में अब बस्तर में शांति की उम्मीद फिर से जगी है।
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