अहंकार में अपील पड़ी भारी: HC की सरकार को फटकार, लगाया जुर्माना

Neel Tiwari | Jan 15, 2026, 16:42 IST
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jabalpur highcourt criminal appeal dismissed
jabalpur highcourt criminal appeal dismissed

जबलपुर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की आपराधिक अपील खारिज की है। साथ ही इसे न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग मानते हुए 25 हजार रुपए का जुर्माना लगाया है।

News in short

  • एमपी हाईकोर्ट की जबलपुर डिवीजनल बेंच ने राज्य सरकार की आपराधिक अपील खारिज की।
  • बरी हो चुके आरोपी के खिलाफ अपील को बताया गया बेबुनियाद और गैर-जिम्मेदाराना।
  • कोर्ट ने सरकार पर 25 हजार का जुर्माना लगाया, रेड क्रॉस में जमा करने का आदेश।
  • डाइंग डिक्लेरेशन से सच आया सामने।
  • जुर्माने की राशि जिम्मेदार अधिकारियों से वसूलने की छूट भी सरकार को दी गई।

News in Detail

MP News. जबलपुर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की आपराधिक अपील खारिज की। कोर्ट ने कहा कि बिना ठोस आधार के अपील दायर करना कोर्ट का समय बर्बाद करना है। इस लापरवाही पर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार पर 25 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया है।

दायर अपील पर कोर्ट का सख्त संदेश

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की मुख्यपीठ जबलपुर में जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस विनय सराफ की डिविजनल बेंच ने, राज्य सरकार द्वारा दायर एक आपराधिक अपील को न केवल खारिज कर दिया, बल्कि सरकारी सिस्टम को आईना भी दिखाया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि बिना कानूनी मजबूती के अपील दायर करना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। इससे अदालत का बहुमूल्य समय खराब होता है।



क्या था पूरा मामला?

यह मामला अनूपपुर जिले से जुड़ा था। जहां कृष्णा सिंह मरावी पर अपनी पत्नी सावित्री को दहेज की मांग (टीवी) को लेकर प्रताड़ित करने और आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाया गया था। अभियोजन के अनुसार, 24 नवंबर 2017 को प्रताड़ना से परेशान होकर सावित्री ने खुद पर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा ली थी।

हालांकि, द्वितीय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, अनूपपुर ने 22 जुलाई 2022 को आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया था। इसी फैसले को चुनौती देते हुए राज्य सरकार हाईकोर्ट पहुंची थी।

डाइंग डिक्लेरेशन ने पलटा पूरा केस

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि मामले का सबसे अहम सबूत मृतका का मरणासन्न कथन (Dying declaration) था, जिसे कार्यपालक मजिस्ट्रेट एमएन पांडे ने दर्ज किया था। इस बयान में सावित्री ने साफ कहा था कि, उसके साथ किसी प्रकार की मारपीट या दहेज प्रताड़ना नहीं हुई थी। उसने आग लगने की घटना को दुर्घटना बताया और कहा कि बिजली चले जाने से चिमनी गिर गई, जिससे वह जल गई।

देरी से FIR ने कमजोर किया अभियोजन

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि अभियोजन पक्ष के प्रमुख गवाह अपने पहले के बयानों से मुकर गए। सीता धुर्वे ने पहले दहेज की मांग की बात कही, लेकिन बाद में बयान बदल दिया।

वहीं मृतका की मां सोना बाई ने स्वीकार किया कि पति-पत्नी के संबंध सामान्य थे और घटना एक हादसा थी। इसके अलावा, सावित्री की मृत्यु 9 दिसंबर 2017 को हुई, जबकि एफआईआर 22 जनवरी 2018 को दर्ज की गई, जिसे कोर्ट ने गंभीर देरी माना।

‘अदालत के समय की बर्बादी’ और 25 हजार का जुर्माना

इन सभी तथ्यों के बावजूद राज्य सरकार द्वारा अपील दायर करने पर हाईकोर्ट ने नाराजगी जाहिर की है। कोर्ट ने कहा कि जब मृतका का बयान पूरी तरह स्पष्ट है और उसके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं है, तो ऐसी अपील का कोई औचित्य नहीं बनता। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह अपील संभवतः “अपने या किसी और के अहंकार को संतुष्ट करने” के लिए दायर की गई, जो स्वीकार्य नहीं है।

जिम्मेदार अफसरों से वसूली की छूट

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार पर 25 हजार का जुर्माना लगाते हुए निर्देश दिया कि, यह राशि 30 दिनों के भीतर इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी जबलपुर में जमा की जाए। साथ ही कोर्ट ने सरकार को यह स्वतंत्रता भी दी कि वह इस जुर्माने की रकम उन अधिकारियों या व्यक्तियों से वसूल सकती है, जिन्होंने इस निराधार अपील को दायर करने की सिफारिश की थी।

यह फैसला न केवल एक मामले तक सीमित है, बल्कि सरकारी तंत्र को यह स्पष्ट संदेश भी देता है कि ‘अहंकार’ में की गई कानूनी लड़ाइयों की कीमत अब चुकानी पड़ेगी।

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