31 मार्च के बाद MP के 60% बड़े निजी अस्पतालों में नहीं चलेगा आयुष्मान कार्ड
Amresh Kushwaha | Mar 10, 2026, 09:28 IST
mp ayushman card update nabh mandatory private hospitals impact
मध्य प्रदेश के चार बड़े शहरों में 31 मार्च के बाद आयुष्मान योजना के तहत इलाज मिलना मुश्किल हो सकता है। NABH प्रमाणीकरण की अनिवार्यता के कारण लगभग 60% निजी अस्पताल इस योजना से बाहर हो सकते हैं।
BHOPAL. मध्यप्रदेश के मध्यम और गरीब परिवारों के लिए एक चिंता वाली खबर सामने आई है। दरअसल, 31 मार्च के बाद से प्रदेश के चार बड़े शहरों में आयुष्मान कार्ड से इलाज करवाना मुश्किल हो सकता है। ये शहर हैं भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर। सरकार के एक नए आदेश ने निजी अस्पतालों और मरीजों में हलचल मचा दी है।
राज्य सरकार ने आयुष्मान योजना (Ayushman Scheme) को लेकर एक स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं। इसके तहत 31 मार्च के बाद इन चार बड़े शहरों में केवल वही निजी अस्पताल इस योजना का हिस्सा रहेंगे, जिनके पास एनएबीएच सर्टिफिकेट (National Accreditation Board for Hospitals) का फाइनल लेवल सर्टिफिकेट होगा।
सरकार का तर्क है कि इससे इलाज की गुणवत्ता में सुधार होगा। साथ ही, फर्जी बिलिंग जैसी शिकायतों पर लगाम लगेगी। हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि इन शहरों के 480 अस्पतालों में से करीब 295 अस्पताल इस मानक को पूरा नहीं कर पा रहे हैं। इससे वे इस योजना से बाहर हो जाएंगे।
भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर को प्रदेश का मेडिकल हब माना जाता है। छोटे जिलों और ग्रामीण इलाकों के गंभीर मरीज बेहतर इलाज के लिए इन्हीं शहरों की ओर रुख करते हैं।
यदि 60 प्रतिशत अस्पताल इस योजना से बाहर होते हैं, तो बचे हुए बड़े कॉरपोरेट अस्पतालों पर मरीजों का दबाव अचानक बढ़ जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे न केवल वेटिंग लिस्ट लंबी होगी, बल्कि आपातकालीन स्थिति (Emergency) में मरीजों को बेड मिलना भी दूभर हो जाएगा।
मध्य प्रदेश नर्सिंग होम एसोसिएशन और आईएमए (Indian Medical Association) इस फैसले के कड़े विरोध में हैं। उनका कहना है कि एनएबीएच का प्रमाण पत्र लेना एक स्वैच्छिक प्रक्रिया है। इसे अनिवार्य (Mandatory) करना नियमों के खिलाफ है।
छोटे अस्पतालों का तर्क है कि इस सर्टिफिकेट को हासिल करने के लिए बुनियादी ढांचे पर करोड़ों रुपए खर्च करने होंगे। यह हर किसी के बस की बात नहीं है। उनका सवाल यह भी है कि जब देश के अन्य किसी राज्य में ऐसी शर्त नहीं है, तो केवल मध्य प्रदेश के इन चार शहरों को ही निशाना क्यों बनाया जा रहा है?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मानें तो इस फैसले का सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ेगा। छोटे नर्सिंग होम और क्लीनिक योजना से बाहर होने के कारण मरीजों को मजबूरन बड़े कॉरपोरेट अस्पतालों में जाना होगा।
आयुष्मान कार्ड होने के बावजूद, सीमित अस्पतालों के कारण इलाज महंगा और पहुंच से दूर हो सकता है। सरकार का कहना है कि यह कदम कोरोना काल के दौरान मिली फर्जीवाड़े की शिकायतों के बाद उठाया गया है, लेकिन इसके व्यावहारिक पक्ष ने जनता की चिंता बढ़ा दी है।
मध्य प्रदेश आयुष्मान भारत के सीईओ डॉ. योगेश भरसट का कहना है कि हम अस्पतालों में इलाज की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए नियमों को सख्ती से लागू कर रहे हैं। हालांकि, हम वरिष्ठ अधिकारियों से मिलकर इस मामले की समीक्षा करेंगे, ताकि अधिक से अधिक मरीजों को इसका फायदा मिल सके।
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एनएबीएच (NABH) की शर्त ने बिगाड़ा समीकरण
सरकार का तर्क है कि इससे इलाज की गुणवत्ता में सुधार होगा। साथ ही, फर्जी बिलिंग जैसी शिकायतों पर लगाम लगेगी। हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि इन शहरों के 480 अस्पतालों में से करीब 295 अस्पताल इस मानक को पूरा नहीं कर पा रहे हैं। इससे वे इस योजना से बाहर हो जाएंगे।
मेडिकल हब में बढ़ेगा मरीजों का बोझ
यदि 60 प्रतिशत अस्पताल इस योजना से बाहर होते हैं, तो बचे हुए बड़े कॉरपोरेट अस्पतालों पर मरीजों का दबाव अचानक बढ़ जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे न केवल वेटिंग लिस्ट लंबी होगी, बल्कि आपातकालीन स्थिति (Emergency) में मरीजों को बेड मिलना भी दूभर हो जाएगा।
छोटे अस्पतालों की चिंता
छोटे अस्पतालों का तर्क है कि इस सर्टिफिकेट को हासिल करने के लिए बुनियादी ढांचे पर करोड़ों रुपए खर्च करने होंगे। यह हर किसी के बस की बात नहीं है। उनका सवाल यह भी है कि जब देश के अन्य किसी राज्य में ऐसी शर्त नहीं है, तो केवल मध्य प्रदेश के इन चार शहरों को ही निशाना क्यों बनाया जा रहा है?
मरीजों की जेब पर पड़ेगा सीधा असर
आयुष्मान कार्ड होने के बावजूद, सीमित अस्पतालों के कारण इलाज महंगा और पहुंच से दूर हो सकता है। सरकार का कहना है कि यह कदम कोरोना काल के दौरान मिली फर्जीवाड़े की शिकायतों के बाद उठाया गया है, लेकिन इसके व्यावहारिक पक्ष ने जनता की चिंता बढ़ा दी है।
इलाज की गुणवत्ता बढ़ाना मकसद
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