दतिया की दो सगी बहनों ने बदल लिए अपने पति, कहा- हम खुश नहीं, क्या है Husband Swapping

Manya Jain | May 01, 2026, 18:07 IST
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Husband Swapping
Husband Swapping

दतिया में दो बहनों ने आपसी सहमति से पतियों की अदला-बदली की। ग्वालियर हाईकोर्ट ने इसे अपराध नहीं, बल्कि निजी फैसला बताया। यह अनोखा 'हसबैंड स्वैपिंग' केस अब चर्चा में है।

मध्यप्रदेश के दतिया जिले से एक ऐसा मामले सामने आया है, जिसने सबको हैरान कर के रख दिया है। दरअसल, दतिया में दो सगी बहनों ने मर्जी से अपने पतियों की अदला-बदली कर ली। इसे आमतौर पर 'हसबैंड स्वैपिंग' (Husband Swapping) कहा जा रहा है।

इस मामले में दो सगी बहनों ने अपने पतियों के साथ रहने से इनकार करते हुए एक-दूसरे के पतियों (जीजा और साड़ू) के साथ रहने का फैसला किया है। यह मामला ग्वालियर हाईकोर्ट (Gwalior High Court) की बेंच तक पहुंचा।कोर्ट ने साफ कर दिया कि यह कोई आपराधिक मामला नहीं, बल्कि परिवार के अंदर का निजी विवाद है।

आइए जानते हैं पूरी कहानी...

कैसे शुरू हुआ विवाद?

इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत दतिया निवासी गिरिजा शंकर (Girija Shankar) द्वारा दायर की गई एक याचिका से हुई। गिरिजा शंकर ने हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच में'बंदी प्रत्यक्षीकरण' (Habeas Corpus)याचिका दायर की थी।

बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus petition) एक कानूनी प्रक्रिया है, जिसके तहत किसी व्यक्ति को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में लिए जाने पर अदालत से उसकी स्वतंत्रता की रक्षा की जाती है। यह अदालत से मांग होती है कि उस व्यक्ति को अवैध हिरासत से मुक्त किया जाए और उसे पेश किया जाए।

अपहरण का आरोप

याचिकाकर्ता गिरिजा शंकर का आरोप था कि उसके साड़ू,मायाराम (Mayaram),ने उसकी पत्नी और बेटी का अपहरण कर उन्हें बंधक बना रखा है। मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने पुलिस को आदेश दिया कि महिला को न्यायाधीश के सामने पेश किया जाए। जब महिला कोर्ट में पेश हुई,तो उसने जो बयान दिया,उसने पूरे केस का रुख ही मोड़ दिया।

बहनों की दलील: हम पतियों से संतुष्ट नहीं

अदालत के कटघरे में खड़ी महिला ने साफ लफ्जों में कहा कि उसका अपहरण नहीं हुआ है,बल्कि वह अपनी मर्जी से अपने बहनोई (जीजा) मायाराम के साथ रह रही है।

छोटी बहन का चौंकाने वाला खुलासा

जब मायाराम की मूल पत्नी (यानी याचिकाकर्ता की छोटी साली) को कोर्ट में बुलाया गया,तो उम्मीद थी कि वह इसका विरोध करेगी। लेकिन इसके उलट,उसने भी अपने पति मायाराम के साथ रहने के बजाय अपने जीजा गिरिजा शंकर (याचिकाकर्ता) के साथ जाने की इच्छा जताई।

दोनों बहनों की मुख्य दलीलें

  • वे अपने वर्तमान पतियों के साथ वैवाहिक जीवन से संतुष्ट (Not Satisfied) नहीं थीं।
  • दोनों ने एक-दूसरे के पतियों के साथ जीवन बिताने का स्वेच्छिक निर्णय (Voluntary Decision) लिया है।
  • वे अपने बच्चों को भी नए पार्टनर के साथ ले जाना चाहती हैं।
  • बड़ी बहन ने पहले ही तलाक (Divorce) की अर्जी लगा रखी है,जिस पर फैसला आना बाकी है।

ये बालिगों का फैसला है- हाई कोर्ट

जस्टिस की बेंच ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद याचिका को खारिज कर दिया।

  • दोनों महिलाएं बालिग (Adults) हैं और अपने जीवन के फैसले लेने के लिए स्वतंत्र हैं।
  • चूंकि दोनों ने स्वेच्छा से साथ रहने की बात कही है,इसलिए इसे अपहरण (Kidnapping) की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
  • एडिशनल गवर्नमेंट एडवोकेट डीके शर्मा के मुताबिक,कोर्ट ने इसे 'पारिवारिक विवाद' (Internal Family Dispute) माना और हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

क्या कहता है भारतीय कानून

भारतीय कानून के अनुसार, यदि दो बालिग व्यक्ति आपसी सहमति (Mutual Consent) से साथ रहते हैं, तो उसे तब तक अपराध नहीं माना जा सकता जब तक कि उसमें हिंसा या जबरदस्ती न हो। अडल्ट्री (Adultery) अब भारत में अपराध नहीं है, हालांकि यह तलाक का एक मजबूत आधार जरूर हो सकता है।

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

रिश्ते के विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला बहुत अलग है। यह समाज की सोच और निजी पसंद के बीच संघर्ष है। हमारा सामाज ऐसी चीजों को जल्दी स्वीकार नहीं करता है। लेकिन हमारा कानून हमेशा लोगों की 'सहमति' को प्राथमिकता देता है।

इस केस ने कानून की एक बड़ी बात साफ कर दी है। बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) का इस्तेमाल केवल जबरदस्ती में होता है। यदि किसी को उसकी मर्जी के बिना बंधक बनाया जाए।

अगर व्यक्ति अपनी मर्जी से कहीं रहता है तो रोक नहीं सकते। कोर्ट किसी को वापस भेजने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। कानून बालिग व्यक्ति की स्वतंत्रता और उसकी इच्छा का सम्मान करता है।

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