एमपी में तबादलों पर उठे सवाल: मंत्री मजबूत या सेटिंग सिस्टम ज्यादा ताकतवर?
Ramanand Tiwari | Jun 20, 2026, 08:40 IST
Photograph: (THESOOTR)
BHOPAL. मध्यप्रदेश में तबादला सत्र खत्म होते ही विवाद तेज हो गया है। नियमों की अनदेखी, वरिष्ठता की अवहेलना और सेटिंग सिस्टम के आरोप लग रहे हैं, इससे प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल उठने लगे हैं।
समझें क्या है पूरा मामला...
- एमपी में तबादला सत्र के बाद विभागों में विवाद और शिकायतें तेज।
- नियमों की अनदेखी और वरिष्ठता दरकिनार करने के आरोप।
- एक पद पर दो अधिकारियों की पोस्टिंग के मामले।
- गंभीर बीमारी और विशेष श्रेणी मामलों की अनदेखी।
- मंत्री और अफसरशाही के बीच शक्ति संतुलन पर सवाल।
राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि इस बार भी तबादलों का बड़ा आधार योग्यता या आवश्यकता नहीं, बल्कि "सामंजस्य" और "सेटिंग" रहा। मंत्री बंगलों पर नेताओं, समर्थकों और कर्मचारियों की भीड़ पूरे तबादला सत्र में दिखाई देती रही। अब जब आदेश जारी हो चुके हैं, तो कई फैसलों पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
तबादला अवधि खत्म होते ही शिकायतों की बाढ़...
- वाणिज्यिक कर विभाग और जनजातीय कार्य विभाग सबसे ज्यादा चर्चा में।
- एक पद पर दो-दो अधिकारियों की पोस्टिंग के मामले।
- सेवानिवृत्ति के करीब कर्मचारियों के भी तबादले।
- गंभीर बीमारी और विशेष श्रेणी के मामलों में नियमों की अनदेखी के आरोप।
- जनगणना कार्य में लगे शिक्षकों के तबादले तक कर दिए गए।
- कई विभागों में अफसरशाही के आगे मंत्री कमजोर नजर आने की चर्चा।
मंत्री बंगलों पर लगी रही भीड़, अब फैसलों पर सवाल
विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा कि कुछ विभागों में तबादलों के लिए भारी लेन-देन हुआ। ऐसा आरोप कांग्रेस के विधायक अभय मिश्रा ने लगाए।
कांग्रेस पहले भी सीएमएचओ कार्यालयों और अन्य विभागों में लाखों रुपए लेकर तबादले किए जाने के आरोप लगा चुकी है। भले ही इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई हो, लेकिन मौजूदा विवादों ने एक बार फिर पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
इस बार भी ‘सामंजस्य मॉडल’ बना तबादलों का आधार?
स्कूली शिक्षा, उच्च शिक्षा, नगरीय विकास, पीडब्ल्यूडी और अन्य विभागों में भी ऐसे कई निर्णय चर्चा का विषय बने हैं। आरोप यह भी हैं कि कई जगह ओएसडी और स्थापना शाखाओं की भूमिका सामान्य प्रक्रिया से ज्यादा प्रभावी रही।
अफसरों के आगे मंत्री पड़े हल्के?
सूत्रों के अनुसार, कुछ विभागों में तबादलों की संख्या और प्रक्रिया को लेकर प्रमुख सचिव और एसीएस स्तर के अधिकारियों ने हस्तक्षेप किया।
इससे यह संदेश गया कि अंतिम निर्णय में कई बार अफसरशाही का पलड़ा मंत्रियों से भारी दिखाई दिया। पिछले वर्षों की तरह इस बार भी कुछ विभागों में प्रस्तावित सूची और अंतिम आदेशों के बीच बड़ा अंतर देखने को मिला।
वाणिज्यिक कर विभाग में सबसे ज्यादा गड़बड़ियों की चर्चा
सेवानिवृत्ति के करीब कर्मचारियों के तबादले, रिक्त पदों को खाली छोड़ना और एक ही पद पर दो अधिकारियों की पदस्थापना जैसे मामले चर्चा में हैं। प्रभावित अधिकारी और कर्मचारी सूची में संशोधन की मांग कर रहे हैं।
रिटायरमेंट में चार महीने बाकी, फिर भी तबादला
इसके बावजूद भोपाल सर्कल-4 में पदस्थ बृहस्पति सिंह का तबादला नौगांव कर दिया गया, जबकि उनकी सेवानिवृत्ति में केवल चार महीने शेष बताए जा रहे हैं। इसे नीति के उल्लंघन के रूप में देखा जा रहा है।
एक कुर्सी पर दो अधिकारी, कहीं पूरा पद ही खाली
इसी तरह भोपाल सर्कल-6 में पहले से दो सीटीओ पद भरे होने के बावजूद तीसरी अधिकारी ऋतु रावत की पदस्थापना कर दी गई।
दूसरी ओर बैतूल में सीटीओ अशोक आमों के स्थानांतरण के बाद पद खाली छोड़ दिया गया, जिससे पूरे सर्कल के संचालन पर सवाल खड़े हो गए हैं।
बीमारी और पारिवारिक परिस्थितियों को भी नहीं मिली प्राथमिकता
नमन जैन ने अपनी माता के कैंसर उपचार का हवाला देते हुए तबादला रोकने का आवेदन दिया था। ऐसे कई अन्य मामलों की शिकायतें भी विभिन्न विभागों से सामने आई हैं।
जनगणना ड्यूटी वाले शिक्षकों के तबादले भी विवाद में
इसके बावजूद कुछ मामलों में तबादला आदेश जारी होने की शिकायतें सामने आई हैं। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि ऐसे आदेश नियमों के अनुरूप नहीं माने जाएंगे।
स्थापना शाखाओं की भूमिका जांच के घेरे में
हर बार की तरह इस बार भी तबादले विवादों में
अब निगाहें इस बात पर हैं कि शासन शिकायतों की जांच कर केवल औपचारिकता निभाता है या फिर वास्तव में उन आदेशों की समीक्षा करता है, जिन पर कर्मचारियों और अधिकारियों ने गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई हैं।
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