अमानत राशि लेकर वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाना भूले नगर निगम
Sanjay Sharma | Jul 19, 2025, 19:29 IST
water harvasting system Photograph: (The Sootr)
मध्यप्रदेश में भवनों पर वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगवाना जरूरी है। इसके लिए नगरीय निकाय बिल्डिंग परमिशन के समय अमानत राशि जमा कराते हैं लेकिन सिस्टम लगाते ही नहीं हैं।
BHOPAL. गर्मियों में पानी की किल्लत की समस्या का समाधान करने का यही सही मौका है। बरसात में हम जितना पानी धरती के गर्भ में सहेज लेंगे वहीं पानी हमें ट्यूबवेल और हैंडपम्पों के जरिए साल भर वापस मिलता रहेगा।
बारिश के पानी को धरती के गर्भ तक पहुंचाने के लिए सरकार करोड़ों रुपए खर्च कर जागरुकता अभियान चलाती है। इससे लोगों में तो जागरुकता आ रही है लेकिन जिन संस्थाओं के पास इसके क्रियान्वयन की जवाबदेही है वे पल्ला झाड़े बैठी हैं। नगर पालिका अधिनियम में नगरीय निकायों को दायित्व सौंपा गया है, लेकिन अमानत राशि होने के बाद भी इसमें उनकी रुचि नहीं हैं।
नगरीय क्षेत्र में निर्माण की अनुमति के लिए अमानत राशि जमा करानी होती है। ऐसा इसलिए किया गया ताकि लोगों की लापरवाही की स्थिति में नगरीय निकाय ये काम करा सकें। बिल्डिंग परमिशन के समय नगरीय निकाय यह राशि तो जमा करा रहे हैं, लेकिन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाने में सुस्त हैं।
प्रदेश के नगर निगम और नगर पालिकाओं के पास वाटर हार्वेस्टिंग की मद में करोड़ों रुपए का फंड जमा हो चुका है। अकेले भोपाल की ही बात करें तो बीते तीन साल में ही यह राशि तीन करोड़ से ज्यादा हो गई है। जबलपुर नगर निगम ने बीते दस सालों में भवन निर्माण की जो अनुमतियां जारी की हैं, उनसे वाटर हार्वेस्टिंग की मद में 5 करोड़ से भी अधिक राशि जमा हुई है।
नगर निगम ग्वालियर के खजाने में बीते तीन साल में एक करोड़ रुपए जमा हुए हैं। इनके अलावा उज्जैन, रीवा, सागर, बुरहानपुर, खंडवा, देवास, रतलाम, मुरैना, सतना, कटनी जैसे नगर निगमों के खजाने में वाटर हार्वेस्टिंग के हिस्से का करोड़ों रुपए जमा है।
ये खबर भी पढ़िए : MP News: सीआईटीएस की अनिवार्यता पर विधानसभा में उठेगा सवाल
ट्यूबवेलों से भूमिगत पानी के बेहिसाब दोहन की वजह से जलस्तर काफी नीचे चला गया है। इस वजह से प्रदेश के अधिकांश क्षेत्रों में सर्दी बीतने से पहले ही पानी की किल्लत शुरू हो जाती है। भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर जैसे बड़े शहरों में तो आमजन की जलापूर्ति पूरी तरह नदियों और तालाबों पर निर्भर हो गई है। पानी की इस विकराल समस्या के बावजूद जहां लोग लापरवाह बने हुए हैं।
वहीं नगरीय निकाय भी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा रहे हैं। बरसात में व्यर्थ बह जाने वाले पानी को भूगर्भ तक पहुंचाने के लिए ठोस उपायों की अनदेखी की जा रही है। लोग बिल्डिंग परमिशन लेते समय जो राशि जमा कराते हैं वह वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाने की ग्यारंटी के रूप में होती है। लोग भी उलझन से बचने राशि वापस लेने नहीं आते और निकाय भी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं।
भोपाल नगर निगम ने वित्त वर्ष 2024-25 में बिल्डिंग परमिशन देते समय वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम की मद में 1,16,95,629 की अमानत राशि जमा कराई है। इससे पहले 2023-24 में जमा की गई अमानत राशि 80,48,000 रुपए थी वहीं 2022-23 में नगर निगम के खजाने में वाटर हार्वेस्टिंग के मद में 1,07,21,000 रुपए पहुंचे थे। इससे पहले के सालों में भी नगर निगम को इस मद में बेहिसाब रुपया मिलता रहा है।
वाटर हार्वेस्टिंग के नाम पर खजाना भरने में जबलपुर नगर निगम भी पीछे नहीं है। साल 2019 तक जबलपुर में 4809 बिल्डिंग परमिशन जारी करने के दौरान इस मद में 5 करोड़ रुपए जमा थे। इसके बाद के पांच साल यानी 2024 के बीच भी 2 करोड़ रुपए नगर निगम को मिले हैं। ग्वालियर नगर निगम वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम के नाम पर रुपया जमा करने में प्रदेश के तीन बड़े शहरों में चौथे नंबर पर है। इसके बावजूद नगर निगम को हर तीन साल में बिल्डिंग परमिशन के दौरान 80 लाख से एक करोड़ रुपए मिल रहे हैं।
ये खबर भी पढ़िए : ग्लोबल स्किल्स पार्क की मेस पर मेहरबान प्रबंधन
मध्यप्रदेश में भले ही भवनों पर वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगवाना जरूरी है लेकिन इस नियम का उल्लंघन किया जा रहा है। न तो लोग इसके लिए जागरुकता दिखा रहे हैं और जिम्मेदार संस्थाएं भी आंखें मूंदे बैठी हैं। सरकारी प्रोजेक्टों में भी इसकी अनिवार्यता को अनदेखा कर अनुमतियां जारी की जा रही हैं।
राजधानी भोपाल की बात करें तो बीते कुछ सालों में अनगिनत हाउसिंग प्रोजेक्टों को मंजूरी दी गई है। इनमें से कुछ तो पूरी तरह से बनकर तैयार हो चुके हैं लेकिन उनमें भी वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम नहीं लगाए गए हैं। वहीं सरकार के विभागों के भवनों में भी या तो ये सिस्टम लगाए ही नहीं गए या फिर रस्मअदायगी कर छोड़ दिए गए हैं। यही हालत प्रदेश के दूसरे शहरों की है।
ये खबर भी पढ़िए : एवीएफओ भर्ती में डिप्लोमा होल्डर्स को दूर कर रहा पशुपालन विभाग
नगरीय निकायों द्वारा बीते दो सालों में बेहिसाब बिल्डिंग परमिशन जारी की गई हैं। इसके बदले में लोगों द्वारा जो अमानत राशि जमा कराई गई थी उसके बदले में निकाय हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाना ही भूल गए। जबलपुर, ग्वालियर, इंदौर और भोपाल में ही बीते दो सालों में 10 हजार से ज्यादा निजीऔर सरकारी इमारतें बनी हैं। लेकिन इनमें से 10 फीसदी पर भी वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम नहीं है। सरकार के स्तर पर भी नगरीय निकायों पर वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाने की कसावट नहीं है। इसका फायदा उठाकर निकाय इस राशि का उपयोग दूसरे कामों में कर रहे हैं।
वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम एक प्रणाली है जो बारिश के व्यर्थ बहते पानी को जमीन के नीचे उतारता है। इसमें बारिश में छत पर बरसने वाले पानी को पाइप लाइन के सहारे नीचे उतारा जाता है और एक फिल्टर की मदद से साफ कर जमीन के अंदर पहुंचाया जाता है। हार्वेस्टिंग सिस्टम को बाजार से खरीदा या स्वयं तैयार किया जा सकता है।
आमतौर पर एक हजार वर्गफीट की छत से बारिश के दिनों में आठ लाख लीटर पानी से भूमिगत जल स्तर को रिचार्ज किया जा सकता है। इस लिहाज से अकेले भोपाल में सरकारी संस्थाओं की छतों से ही करोड़ों लीटर पानी जमीन में उतारकर जल स्तर को बढ़ा सकते हैं।
ये खबर भी पढ़िए : डीजीटी से तय योग्यता के बिना प्रदेश में प्रशिक्षण अधिकारियों की भर्ती
अगर आपको ये खबर अच्छी लगी हो तो 👉 दूसरे ग्रुप्स, 🤝दोस्तों, परिवारजनों के साथ शेयर करें📢🔃🤝💬👩👦👨👩👧👧👩
बारिश के पानी को धरती के गर्भ तक पहुंचाने के लिए सरकार करोड़ों रुपए खर्च कर जागरुकता अभियान चलाती है। इससे लोगों में तो जागरुकता आ रही है लेकिन जिन संस्थाओं के पास इसके क्रियान्वयन की जवाबदेही है वे पल्ला झाड़े बैठी हैं। नगर पालिका अधिनियम में नगरीय निकायों को दायित्व सौंपा गया है, लेकिन अमानत राशि होने के बाद भी इसमें उनकी रुचि नहीं हैं।
नगरीय क्षेत्र में निर्माण की अनुमति के लिए अमानत राशि जमा करानी होती है। ऐसा इसलिए किया गया ताकि लोगों की लापरवाही की स्थिति में नगरीय निकाय ये काम करा सकें। बिल्डिंग परमिशन के समय नगरीय निकाय यह राशि तो जमा करा रहे हैं, लेकिन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाने में सुस्त हैं।
प्रदेश के नगर निगम और नगर पालिकाओं के पास वाटर हार्वेस्टिंग की मद में करोड़ों रुपए का फंड जमा हो चुका है। अकेले भोपाल की ही बात करें तो बीते तीन साल में ही यह राशि तीन करोड़ से ज्यादा हो गई है। जबलपुर नगर निगम ने बीते दस सालों में भवन निर्माण की जो अनुमतियां जारी की हैं, उनसे वाटर हार्वेस्टिंग की मद में 5 करोड़ से भी अधिक राशि जमा हुई है।
नगर निगम ग्वालियर के खजाने में बीते तीन साल में एक करोड़ रुपए जमा हुए हैं। इनके अलावा उज्जैन, रीवा, सागर, बुरहानपुर, खंडवा, देवास, रतलाम, मुरैना, सतना, कटनी जैसे नगर निगमों के खजाने में वाटर हार्वेस्टिंग के हिस्से का करोड़ों रुपए जमा है।
ये खबर भी पढ़िए : MP News: सीआईटीएस की अनिवार्यता पर विधानसभा में उठेगा सवाल
अमानत राशि ही वापस नहीं ले रहे लोग
वहीं नगरीय निकाय भी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा रहे हैं। बरसात में व्यर्थ बह जाने वाले पानी को भूगर्भ तक पहुंचाने के लिए ठोस उपायों की अनदेखी की जा रही है। लोग बिल्डिंग परमिशन लेते समय जो राशि जमा कराते हैं वह वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाने की ग्यारंटी के रूप में होती है। लोग भी उलझन से बचने राशि वापस लेने नहीं आते और निकाय भी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं।
4 पॉइंट्स में समझें पूरी खबर
|
पानी सहेजना भूल खजाना भर रहे निकाय
वाटर हार्वेस्टिंग के नाम पर खजाना भरने में जबलपुर नगर निगम भी पीछे नहीं है। साल 2019 तक जबलपुर में 4809 बिल्डिंग परमिशन जारी करने के दौरान इस मद में 5 करोड़ रुपए जमा थे। इसके बाद के पांच साल यानी 2024 के बीच भी 2 करोड़ रुपए नगर निगम को मिले हैं। ग्वालियर नगर निगम वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम के नाम पर रुपया जमा करने में प्रदेश के तीन बड़े शहरों में चौथे नंबर पर है। इसके बावजूद नगर निगम को हर तीन साल में बिल्डिंग परमिशन के दौरान 80 लाख से एक करोड़ रुपए मिल रहे हैं।
ये खबर भी पढ़िए : ग्लोबल स्किल्स पार्क की मेस पर मेहरबान प्रबंधन
वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम की अमानत राशि
|
सरकारी भवनों पर भी नहीं लगे सिस्टम
राजधानी भोपाल की बात करें तो बीते कुछ सालों में अनगिनत हाउसिंग प्रोजेक्टों को मंजूरी दी गई है। इनमें से कुछ तो पूरी तरह से बनकर तैयार हो चुके हैं लेकिन उनमें भी वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम नहीं लगाए गए हैं। वहीं सरकार के विभागों के भवनों में भी या तो ये सिस्टम लगाए ही नहीं गए या फिर रस्मअदायगी कर छोड़ दिए गए हैं। यही हालत प्रदेश के दूसरे शहरों की है।
ये खबर भी पढ़िए : एवीएफओ भर्ती में डिप्लोमा होल्डर्स को दूर कर रहा पशुपालन विभाग
अमानत राशि लेकर भूले निकाय
जलस्तर को ऐसे करता है रिचार्ज
आमतौर पर एक हजार वर्गफीट की छत से बारिश के दिनों में आठ लाख लीटर पानी से भूमिगत जल स्तर को रिचार्ज किया जा सकता है। इस लिहाज से अकेले भोपाल में सरकारी संस्थाओं की छतों से ही करोड़ों लीटर पानी जमीन में उतारकर जल स्तर को बढ़ा सकते हैं।
ये खबर भी पढ़िए : डीजीटी से तय योग्यता के बिना प्रदेश में प्रशिक्षण अधिकारियों की भर्ती
thesootr links
- मध्यप्रदेश की खबरें पढ़ने यहां क्लिक करें
- छत्तीसगढ़की खबरें पढ़ने यहां क्लिक करें
- राजस्थान की खबरें पढ़ने यहां क्लिक करें
- रोचक वेब स्टोरीज देखने के लिए करें क्लिक
- जॉब्स और एजुकेशन की खबरें पढ़ने के लिए क्लिक करें
- निशुल्क वैवाहिक विज्ञापन और क्लासिफाइड देखने के लिए क्लिक करें
अगर आपको ये खबर अच्छी लगी हो तो 👉 दूसरे ग्रुप्स, 🤝दोस्तों, परिवारजनों के साथ शेयर करें📢🔃🤝💬👩👦👨👩👧👧👩
नवरात्रि के पहले इंदौर में 92 लाख रुपए की गर्भपात किट मिलने से भड़के हिंदूवादी नेता
By Sanjay Gupta, Sandeep Kumar
20 हजार करोड़ रुपए के बकाया चालान: सुप्रीम कोर्ट ने दिए अनोखे सुझाव: बिजली बिल में जुड़ सकती है चालान की राशि
By Neel Tiwari
छत्तीसगढ़ कांग्रेस का कलेक्ट्रेट घेराव, पुलिस से झूमाझटकी, भूपेश बघेल बोले ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें
By Arun Tiwari
मध्य प्रदेश में 1 अक्टूबर से राशन दुकानें बंद, राशन विक्रेता संघ ने 5 मांगों पर दी चेतावनी
By Sandeep Kumar
IAS आशीष टिकरिहा को जनसंपर्क संचालक का अतिरिक्त प्रभार, वेयर हाउसिंग कॉरपोरेशन के प्रबंध संचालक की जिम्मेदारी भी रहेगी
By VINAY VERMA
राजस्थान हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, तलाक के बाद पासपोर्ट पर पिता के नाम की कोई जरूरत नहीं
By Ashish Bhardwaj
पाटन चुनाव याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा निर्देश, भूपेश बघेल की आपत्ति पर पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट करेगा सुनवाई
By Arun Tiwari