भूत बंगला बन गया 320 करोड़ का कोचिंग हब प्रोजेक्ट, अब एग्जिट रूट की तलाश
Mukesh Sharma | Jun 18, 2026, 17:54 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान में जयपुर के प्रताप नगर में 320 करोड़ की लागत से बना कोचिंग हब पूरी तरह फ्लॉप हो चुका है। हाउसिंग बोर्ड अब इसे सरकारी विभागों को सौंपने की कवायद में है।
राजस्थान के जयपुर में कोचिंग संस्थानों को एक छत के नीचे लाने के लिए बनाया कोचिंग हब फेल हो चुका है। करीब 320 करोड़ रुपए का यह प्रोजेक्ट हाउसिंग बोर्ड ने तैयार किया था।
इस कोचिंग हब को प्रदेश के शैक्षिक परिदृश्य को बदलने वाला क्रांतिकारी कदम बताकर प्रचारित किया गया था। विशेषज्ञों का कहना है कि शुरुआत से ही यह एक फ्लॉप प्रस्ताव (Flawed Proposal) था। ऐसे प्रोजेक्ट के लिए जो प्लानिंग होनी चाहिए थी, वह हाउसिंग बोर्ड ने नहीं की।
यह प्रोजेक्ट इस बात का नमूना है कि कैसे सरकारी सिस्टम करोड़ों रुपए अदूरदर्शिता और वित्तीय लालसा की भेंट चढ़ा देता है। इससे 67 हजार वर्गमीटर जमीन पर करीब 9 लाख वर्गफुट का यह ढांचा आज एक भूतहा महल बन चुका है।
पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने 2021 में कोचिंग हब को लेकर बड़े-बड़े दावे किए थे। 3 साल बाद भी स्थिति यह है कि हब में गिनती के चार कोचिंग इंस्टीट्यूट संचालित हैं। यह भी करीब-करीब बंद से ही हैं। क्योंकि कोचिंग हब तक छात्र पहुंच ही नहीं रहे हैं।
हाउसिंग बोर्ड ने तब कोचिंग हब से सौ करोड़ से अधिक की कमाई का अनुमान लगाया था। टावरों को कोचिंग सेंटर को बेचने, कोचिंग हब के बाहर 90 बड़े शोरूमों की बिक्री से कमाई करने का अनुमान लगाया था। अधिकारियों का कहना है कि प्रोजेक्ट की वित्तीय फिजिबिलिटी का एमएनआईटी से परीक्षण भी कराया गया, जिसमें इस प्रोजेक्ट को पूरी तरह उपयोगी माना था।
हालांकि प्रोजेक्ट के बाद बहुत ही कम कोचिंग सेंटर ने जगह लेने में दिलचस्पी दिखाई। तब 68 कोचिंग संस्थान संचालकों ने जगह लेने के लिए अर्जी लगाई। इनमें से आधे ने टोकन मनी भी जमा करवा दी थी। हालांकि बाद में सिर्फ 14 संस्थान संचालकों ने ही पूरी राशि दी। शेष टोकन राशि भी ले जा चुके हैं।
कोचिंग हब में 9 टावर बनाए गए। प्रत्येक टावर के हर फ्लोर पर 1100 वर्गफीट से लेकर 14 हजार वर्गफीट का कारपेट क्षेत्र रखा गया।
हर टावर 7 मंजिल का है। करीब एक लाख वर्गफीट क्षेत्रफल का निर्मित है। भवनों के नीचे पार्किंग है। छात्रों की सुविधा के लिए लाइब्रेरी और पार्क की सुविधा दी गई है। यहां जॉगिंग ट्रेक, वॉकिंग ट्रेक, साइक्लिंग ट्रेक, ओपन एयर जिम, इनडोर जिम, हेल्थ चेकअप सेंटर, बास्केटबॉल एवं टेनिस बॉल कोर्ट, योगा और मेडिटेशन सेंटर हैं।
32,325 वर्गफीट में सेंट्रल लाइब्रेरी एवं 34,280 वर्गफीट में सभागार भी बनाया है। इसमें 1200 लोगों के बैठने की क्षमता है।
कोचिंग संचालकों का आरोप है कि हाउसिंग बोर्ड ने सुरक्षित कैंपस, साइबर लैब और स्मार्ट इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे चमचमाते वादों का ऐसा जाल बुना कि लोग झांसे में आ गए।
बिनोरी कोचिंग के डॉ. जितेंद्र कुमार मीणा ने बताया कि जब अगस्त 2023 में स्पेस देखने आए तो हाउसिंग बोर्ड के अधिकारियों ने उन्हें, पूरा बिक चुका है, कहकर गुमराह किया था। इस हाइप के चक्कर में उन्होंने 8500 वर्गफुट स्पेस खरीदकर करोड़ों रुपए फंसा दिए।
आज छात्र न होने के कारण जेब से भारी-भरकम ब्याज भरने को मजबूर हैं और जैसे-तैसे अपने स्पेस को बेचकर निकलने की कोशिश में हैं। यह स्थिति यहां चल रहे अन्य कोचिंग संस्थानों की भी है।
कोचिंग संस्थानों के जानकार बताते हैं कि जयपुर में कोचिंग संस्थान किराए या लीज के व्यावहारिक मॉडल पर चलते हैं। उनसे करोड़ों रुपए की स्थाई संपत्ति खरीदने की उम्मीद करना एक डेड-ऑन-अराइवल योजना थी। यह हाल ही में 30 इंस्टीट्यूट का अपने कदम वापिस खींचने से साबित है।
सच्चाई तो यह है कि हाउसिंग बोर्ड के तत्कालीन कर्ताधर्ताओं ने कोचिंग हब के निर्माण से पहले बाजार की वास्तविकताओं का आकलन ही किया ही नहीं था। बल्कि उन्हें सिर्फ झूठी वाही-वाही लूटने व अपने आर्थिक स्वार्थों (Ulterior Motives) को पूरा करने से ही मतलब था।
खोजाराम आईएएस एकेडमी दो नंबर टॉवर के पांचवे फ्लोर पर है। यहां गिनती के छात्र हैं। वह भी इसलिए कि एकेडमी मालिक का नजदीक में ही स्कूल है। वह सांगानेर इलाके के ही रहने वाले हैं।
यहां पढ़ने वाले तुषार, प्रिया और स्वाती का कहना है कि सबसे बड़ी समस्या ट्रांसपोर्टेशन की है। जगतपुरा की ओर से कोचिंग हब तक कोई पब्लिक ट्रांसपोर्ट नहीं है।
तीनों ने बताया कि वे कोचिंग संचालक के स्कूल से निकले हुए छात्र हैं। इसलिए यहीं कोचिंग कर रहे हैं। हमें अपने घरों से यहां आने के लिए स्कूटी खरीदनी पड़ी।
हब के भीतर शाम 7 बजे के बाद सन्नाटा पसर जाता है। पुलिस गश्त नहीं के बराबर है। सुरक्षा की कमी के कारण परिसर के भीतर से सीसीटीवी कैमरे तक चोरी हो चुके हैं।
कोचिंग हब आने-जाने के दौरान छात्राओं के साथ छेड़छाड़ और मोबाइल छीनने की वारदातें आम हैं। डर के कारण अभिभावकों ने बच्चों को यहां भेजना ही बंद कर दिया है।
हाउसिंग बोर्ड को मेटेनेंस पर करीब 5 लाख रुपए महीना खर्च करने पड़ रहे है। हाउसिंग बोर्ड ने अपनी नाकामी छिपाने के लिए अब इसके मूल उद्देश्य को ही बदलने की कवायद शुरू कर दी है।
हाउसिंग बोर्ड के डिप्टी हाउसिंग कमिश्नर संजय शर्मा बताते हैं कि एक-एक लाख वर्गफुट एरिया वाली कुल 9 टॉवर हैं। IIT जोधपुर हब में स्थान देने के प्रस्ताव को राज्य सरकार ने तो मंजूरी दे दी है अब केंद्र सरकार की हरी झंडी मिलने का इंतजार है।
इसके अलावा रीको भी काफी बड़ा एरिया मांग रहा है। पुलिस विभाग भी एरिया मांग रहा है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद भी हब मांग रहा है।
कोचिंग हब प्रोजेक्ट के फेल होने पर संजय शर्मा का अपना तर्क है। उनका कहना है कि कोचिंग इंस्टीट्यूट चलाने के लिए कोई नियम आदि नहीं हैं। यदि हैं तो उनकी पालना नहीं हो रही है।
डिप्टी कमिश्नर का दावा है कि कोचिंग इंस्टीट्यूट के लिए सुरक्षा मानकों की सख्ती से पालना हो तो कोचिंग इंस्टीट्यूट के लिए कोचिंग हब से बेहतर कोई विकल्प नहीं है।
ऐसे में सवाल उठना वाजिब है कि यदि इस हब को अंततः सरकारी दफ्तरों या यूनिवर्सिटी को ही सौंपना था, तो कोचिंग हब के नाम पर करोड़ों रुपए का भारी-भरकम इंफ्रास्ट्रक्चर क्यों खड़ा किया गया? क्यों गलाकाट प्रतिस्पर्धा के दौर में सभी कोचिंग्स को एक छत के नीचे लाने का अव्यावहारिक सपना बेचा गया?
हाउसिंग बोर्ड के कर्ताधर्ताओं ने या तो सही आकलन किया ही नहीं या फिर जानबूझकर सच को छिपाया। नतीजा आज सबके सामने है कि 320 करोड़ रुपए की जनता की गाढ़ी कमाई धूल फांक रही है और जिम्मेदार मौन हैं।
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इस कोचिंग हब को प्रदेश के शैक्षिक परिदृश्य को बदलने वाला क्रांतिकारी कदम बताकर प्रचारित किया गया था। विशेषज्ञों का कहना है कि शुरुआत से ही यह एक फ्लॉप प्रस्ताव (Flawed Proposal) था। ऐसे प्रोजेक्ट के लिए जो प्लानिंग होनी चाहिए थी, वह हाउसिंग बोर्ड ने नहीं की।
यह प्रोजेक्ट इस बात का नमूना है कि कैसे सरकारी सिस्टम करोड़ों रुपए अदूरदर्शिता और वित्तीय लालसा की भेंट चढ़ा देता है। इससे 67 हजार वर्गमीटर जमीन पर करीब 9 लाख वर्गफुट का यह ढांचा आज एक भूतहा महल बन चुका है।
कोचिंग सेंटरों ने नहीं दिखाई दिलचस्पी
हाउसिंग बोर्ड ने तब कोचिंग हब से सौ करोड़ से अधिक की कमाई का अनुमान लगाया था। टावरों को कोचिंग सेंटर को बेचने, कोचिंग हब के बाहर 90 बड़े शोरूमों की बिक्री से कमाई करने का अनुमान लगाया था। अधिकारियों का कहना है कि प्रोजेक्ट की वित्तीय फिजिबिलिटी का एमएनआईटी से परीक्षण भी कराया गया, जिसमें इस प्रोजेक्ट को पूरी तरह उपयोगी माना था।
हालांकि प्रोजेक्ट के बाद बहुत ही कम कोचिंग सेंटर ने जगह लेने में दिलचस्पी दिखाई। तब 68 कोचिंग संस्थान संचालकों ने जगह लेने के लिए अर्जी लगाई। इनमें से आधे ने टोकन मनी भी जमा करवा दी थी। हालांकि बाद में सिर्फ 14 संस्थान संचालकों ने ही पूरी राशि दी। शेष टोकन राशि भी ले जा चुके हैं।
जयपुर कोचिंग हब
एक से बढ़कर एक सुविधाएं
हर टावर 7 मंजिल का है। करीब एक लाख वर्गफीट क्षेत्रफल का निर्मित है। भवनों के नीचे पार्किंग है। छात्रों की सुविधा के लिए लाइब्रेरी और पार्क की सुविधा दी गई है। यहां जॉगिंग ट्रेक, वॉकिंग ट्रेक, साइक्लिंग ट्रेक, ओपन एयर जिम, इनडोर जिम, हेल्थ चेकअप सेंटर, बास्केटबॉल एवं टेनिस बॉल कोर्ट, योगा और मेडिटेशन सेंटर हैं।
32,325 वर्गफीट में सेंट्रल लाइब्रेरी एवं 34,280 वर्गफीट में सभागार भी बनाया है। इसमें 1200 लोगों के बैठने की क्षमता है।
सब बिक चुका है का भ्रम
बिनोरी कोचिंग के डॉ. जितेंद्र कुमार मीणा ने बताया कि जब अगस्त 2023 में स्पेस देखने आए तो हाउसिंग बोर्ड के अधिकारियों ने उन्हें, पूरा बिक चुका है, कहकर गुमराह किया था। इस हाइप के चक्कर में उन्होंने 8500 वर्गफुट स्पेस खरीदकर करोड़ों रुपए फंसा दिए।
आज छात्र न होने के कारण जेब से भारी-भरकम ब्याज भरने को मजबूर हैं और जैसे-तैसे अपने स्पेस को बेचकर निकलने की कोशिश में हैं। यह स्थिति यहां चल रहे अन्य कोचिंग संस्थानों की भी है।
बाजार की हकीकत से खिलवाड़
सच्चाई तो यह है कि हाउसिंग बोर्ड के तत्कालीन कर्ताधर्ताओं ने कोचिंग हब के निर्माण से पहले बाजार की वास्तविकताओं का आकलन ही किया ही नहीं था। बल्कि उन्हें सिर्फ झूठी वाही-वाही लूटने व अपने आर्थिक स्वार्थों (Ulterior Motives) को पूरा करने से ही मतलब था।
ट्रांसपोर्टेशन का गणित फेल
यहां पढ़ने वाले तुषार, प्रिया और स्वाती का कहना है कि सबसे बड़ी समस्या ट्रांसपोर्टेशन की है। जगतपुरा की ओर से कोचिंग हब तक कोई पब्लिक ट्रांसपोर्ट नहीं है।
तीनों ने बताया कि वे कोचिंग संचालक के स्कूल से निकले हुए छात्र हैं। इसलिए यहीं कोचिंग कर रहे हैं। हमें अपने घरों से यहां आने के लिए स्कूटी खरीदनी पड़ी।
कोचिंग हब के छात्र
अपराध के कारण असुरक्षित माहौल
कोचिंग हब आने-जाने के दौरान छात्राओं के साथ छेड़छाड़ और मोबाइल छीनने की वारदातें आम हैं। डर के कारण अभिभावकों ने बच्चों को यहां भेजना ही बंद कर दिया है।
टीचर
करोड़ों स्वाहा करने के बाद अब एग्जिट रूट की तलाश
हाउसिंग बोर्ड के डिप्टी हाउसिंग कमिश्नर संजय शर्मा बताते हैं कि एक-एक लाख वर्गफुट एरिया वाली कुल 9 टॉवर हैं। IIT जोधपुर हब में स्थान देने के प्रस्ताव को राज्य सरकार ने तो मंजूरी दे दी है अब केंद्र सरकार की हरी झंडी मिलने का इंतजार है।
इसके अलावा रीको भी काफी बड़ा एरिया मांग रहा है। पुलिस विभाग भी एरिया मांग रहा है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद भी हब मांग रहा है।
कोचिंग हब प्रोजेक्ट के फेल होने पर संजय शर्मा का अपना तर्क है। उनका कहना है कि कोचिंग इंस्टीट्यूट चलाने के लिए कोई नियम आदि नहीं हैं। यदि हैं तो उनकी पालना नहीं हो रही है।
डिप्टी कमिश्नर का दावा है कि कोचिंग इंस्टीट्यूट के लिए सुरक्षा मानकों की सख्ती से पालना हो तो कोचिंग इंस्टीट्यूट के लिए कोचिंग हब से बेहतर कोई विकल्प नहीं है।
जयपुर हब
सवाल तो उठेंगे ही
हाउसिंग बोर्ड के कर्ताधर्ताओं ने या तो सही आकलन किया ही नहीं या फिर जानबूझकर सच को छिपाया। नतीजा आज सबके सामने है कि 320 करोड़ रुपए की जनता की गाढ़ी कमाई धूल फांक रही है और जिम्मेदार मौन हैं।
FAQ
जयपुर कोचिंग हब क्यों फेल हुआ?
पूर्ववर्ती अशोक गहलोत सरकार ने जयपुर के प्रताप नगर में कोचिंग संस्थानों को एक जगह लाने के लिए कोचिंग हब बनाया गया। लेकिन इस हब में कोचिंग संस्थान नहीं आ पाए। कोचिंग हब के फेल होने की तीन मुख्य वजहें हैं। पहली, कोचिंग संस्थान किराए पर चलते हैं, करोड़ों में जगह नहीं खरीदते। दूसरी, कोचिंग हब तक पब्लिक ट्रांसपोर्ट नहीं है। तीसरी, सुरक्षा की कमी से छात्राओं के साथ अपराध की घटनाएं हुईं। अभिभावकों ने बच्चे भेजने बंद कर दिए।- जयपुर कोचिंग हब का भविष्य में क्या होगा?
हाउसिंग बोर्ड अब इसे सरकारी संस्थानों को सौंपने की तैयारी में है। IIT जोधपुर को यहां जगह देने का प्रस्ताव राज्य सरकार ने मंजूर किया है। RIICO, पुलिस विभाग और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद भी जगह मांग रहे हैं। - जयपुर कोचिंग हब में अभी कितने कोचिंग संस्थान चल रहे हैं?
9 टावरों वाले इस विशाल परिसर में आज सिर्फ 4 कोचिंग संस्थान हैं। वो भी लगभग बंद जैसी स्थिति में। 68 में से सिर्फ 14 संस्थानों ने पूरी राशि जमा की थी और बाकी टोकन मनी वापस ले गए।
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