होटल को नहीं मिलेगी कीमती जमीन, सिंगल बेंच के आदेश पर लगी रोक
Mukesh Sharma | Jul 21, 2026, 08:34 IST
300 करोड़ की जमीन 8 करोड़ में देने के आदेश पर डिवीजन बेंच ने लगाई रोक
राजस्थान हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने जेएलएन मार्ग स्थित करीब 300 करोड़ की जमीन को एएमबी होटल्स को मात्र आठ करोड़ में सौंपने के सिंगल बेंच के आदेश पर रोक लगा दी है।
समझें क्या है पूरा मामला
- जेडीए की अपील पर हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने सिंगल बेंच के फैसले पर लगाई अंतरिम रोक।
- कोर्ट का मानना, याचिकाकर्ता के बजाय प्रतिवादी को राहत देना क्षेत्राधिकार से बाहर।
- वर्ष 2007 में 8 करोड़ में नीलाम हुई इस जमीन की वर्तमान कीमत लगभग 300 करोड़ रुपए है।
- डिवीजन बेंच ने एएमबी होटल्स प्रा. लि. और अन्य से जवाब तलब किया।
जस्टिस इन्द्रजीत सिंह और जस्टिस संदीप तनेजा की बैंच ने यह अंतरिम आदेश जेडीए की अपील पर दिए। कोर्ट ने एकलपीठ के याचिकाकर्ता और एएमबी होटल्स प्रा.लि.से जवाब भी मांगा है।
जेडीए के एडवोकेट अमित कुडी ने कोर्ट को बताया कि एकलपीठ ने अपने क्षेत्राधिकार के बाहर जाकर आदेश दिया है। बोलीदाता फर्म एकलपीठ के समक्ष याचिकाकर्ता ही नहीं थी और ना ही जमीन का कब्जा दिलवाने की गुहार लगाई थी। इसके बावजूद एकलपीठ ने दो मई के आदेश में फर्म को जमीन का कब्जा सौंपने के आदेश कर दिए।
एकलपीठ ने नीलामी को कंफर्म कर दिया। जबकि यह अधिकार जेडीए को है। जमीन की अनुमानित कीमत वर्तमान में करीब 300 करोड़ रुपए हो गई है। जबकि 2007 में नीलामी के समय जमीन मात्र 8 करोड़ रुपए में नीलाम हुई थी। एकलपीठ के आदेश को रद्द किया जाए।
नीलाम हुई थी जमीन
इसी बीच, गोपाललाल नाम के व्यक्ति ने जमीन को अपना बताते हुए जेडीए ट्रिब्यूनल में चुनौती दी। ट्रिब्यूनल ने 20 दिसंबर, 2007 को गोपाललाल की याचिका खारिज कर दी और जेडीए को जमीन का मालिक माना।
ट्रिब्यूनल में मामले के लंबित रहने के दौरान ही एएमबी होटल्स ने जेडीए से 4,90,00,000 रुपए वापस ले लिए थे।
हाई कोर्ट पहुंचा गोपाल
यदि उसकी जमीन को अवाप्त भी माना जाए तो इसे सरकार के 26 मई, 2000 के सकुर्लर के अनुसार आवासीय आरक्षित दर की 25 फीसदी पर नियमित करना चाहिए। जेडीए ने याचिकाकर्ता को अतिक्रमी बताया।
कोर्ट ने कहा जमीन तो जेडीए की लेकिन...
अवाप्ति प्रक्रिया को पूर्व खातेदारों व याचिकाकर्ता ने कभी चुनौती नहीं दी। वह सांगानेर के सहायक सैटलमेंट अधिकारी के 6 नवंबर, 1985 के आदेश के आधार पर जमीन अपनी बता रहा है। यह आदेश अवैध है, क्यों कि जेडीए 1982 में ही जमीन का कब्जा ले चुका था।
लेकिन प्रतिवादी को दे दी राहत
कंपनी ने मुकदमा लंबित होने के कारण 4,90,00,000 रुपए वापस ले लिए थे। उसकी शेष राशि 3,30,05,000 रुपए जेडीए के पास रही। उसने जमीन का कब्जा भी नहीं लिया था।
300 करोड़ की जमीन 8 करोड़ में देने के आदेश पर डिवीजन बेंच ने लगाई रोक
अलग याचिका दायर करती होटल कंपनी
गलत ठहरा चुकी है खंडपीठ
यदि अदालत प्रतिवादी को राहत देती है तो ऐसा लगेगा जैसे याचिका प्रतिवादी ने दायर की है। इस मामले में साल 2007 में एकलपीठ ने चैनपुरा गांव की जमीन अवाप्ति को कानूनी ठहराते हुए जमीन के खातेदार की याचिका खारिज कर दी थी।
इस मामले में पिंकसिटी गृह निर्माण सहकारी समिति प्रतिवादी थी। वह उक्त अवाप्शुदा जमीन पर सिद्वार्थ नगर नाम की कॉलानी बसा चुकी थी। कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए सोसायटी के सदस्यों को पट्टे जारी करने के निर्देश दे दिए थे।
सरकार और जेडीए ने इस आदेश को खंडपीठ में चुनौती दी थी। 02 अप्रेल, 2010 को खंडपीठ ने एकलपीठ के पिंकसिटी गृह निर्माण सहकारी समिति के सदस्यों के पक्ष में पट्टे जारी करने के एकलपीठ के आदेश को गलत बताया था। इससे पहले भी एक अन्य अपील पर खंडपीठ ने गृह निर्माण सहकारी समिति सदस्यों को पट्टे देने के एकलपीठ के निर्देश को रद्ध कर दिया था।
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