संती देवी की कहानी: किडनी देकर बेटे को दिया जीवन, उसकी भी हो गई मौत

Purshottam Kumar Joshi | Jan 14, 2026, 19:23 IST
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Photograph: (the sootr)

राजस्थान में सीकर के नांगल गांव की संती देवी यादव ने अपनी किडनी देकर बेटे की जान बचाई, लेकिन अंततः वह भी मौत के मुंह से नहीं बच सका। संती देवी के जीवन में त्रासदी का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है।

Sikar. राजस्थान में सीकर के नांगल गांव की संती देवी यादव की ऐसी दास्तां है जिसके तीन साल में पति, दो बेटे, बहू और सास को खोने के बाद अपनी किडनी देकर बेटे मुकेश को जीवनदान देने की कोशिश की लेकिन उसकी भी मौत हो गई। जो भी संती देवी की यह संघर्ष भरी कहानी हर किसी की आंखे नम कर रही है।

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संती देवी यादव का दिल तोड़ने वाला संघर्ष

नांगल गांव की संती देवी यादव की कहानी ऐसी है, जो हर किसी को गहरे सोच में डाल दे। एक मां जब अपने बच्चे की जान बचाने के लिए अपना शरीर का हिस्सा तक दे देती है, तब भी अगर मौत उसे हरा देती है, तो यह सिर्फ किस्मत का खेल नहीं, संवेदनाओं का भी मामला बन जाता है। तीन सालों में परिवार के छह सदस्य खोने वाली संती देवी अब अकेले अपने जीवन के दर्दनाक संघर्षों से जूझ रही हैं।

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संती देवी का परिवार

संती देवी का परिवार कभी खुशहाल था। वह और उनके पति छीतर मांडिया खेती और पशुपालन के जरिए जीवनयापन करते थे। एक साधारण कृषक परिवार में खुशहाली का माहौल था, लेकिन तीन साल पहले आई एक के बाद एक त्रासदियों ने इस परिवार को पूरी तरह से तोड़ दिया। सबसे पहले घर की जवान बहू की ब्रेन हैमरेज से मौत हो गई। बहू की असमय मौत का गहरा दुख अभी जरा भी कम नहीं हुआ था कि कुछ समय बाद संती देवी के पति को हार्ट अटैक आया और वह भी जिंदगी की जंग हार गए।

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तीसरी त्रासदी: संती देवी के बड़े बेटे की मौत

पति और बहू की मौत के गहरे सदमे से उबरने की कोशिश कर ही रही थीं कि परिवार पर तीसरी त्रासदी आ पड़ी। उनके बड़े बेटे सांवरमल (45) की भी ब्रेन हैमरेज से मौत हो गई। एक के बाद एक अपनों को खोकर संती देवी पूरी तरह से टूट चुकी थीं।

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मां ने दी अपनी किडनी, बेटे की जान बचाई

इन सभी दुखों के बीच जब छोटे बेटे मुकेश की तबियत खराब हुई, तो डॉक्टरों ने बताया कि उसकी दोनों किडनियां खराब हो चुकी हैं। इस पर संती देवी ने खुद को एक तरफ रखते हुए हिम्मत दिखाई और बेटे की जान बचाने के लिए अपनी एक किडनी देने का फैसला लिया। किडनी ट्रांसप्लांट सफल रहा और मुकेश की हालत में सुधार हुआ, जिससे संती देवी को लगा कि उन्होंने अपने बेटे को मौत के मुंह से वापस खींच लिया।

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फिर से टूटे हुए सपने, मुकेश की मौत

कुछ समय तक सब ठीक रहा, लेकिन एक महीने पहले मुकेश की तबियत फिर से बिगड़ी। तमाम कोशिशों और इलाज के बावजूद, मंगलवार को मुकेश (37) भी जिंदगी की जंग हार गया। जिस बेटे के लिए संती देवी ने अपनी किडनी दी थी, वह भी अब नहीं रहा। मुकेश का यूं चले जाना संती देवी और उनके पूरे गांव के लिए एक बड़ा शॉक था। गांव में शोक की लहर दौड़ गई, और हर किसी के मन में यही सवाल था, "इस परिवार के साथ ऐसा क्यों हुआ?"

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संती देवी का आर्थिक और मानसिक संकट

मुकेश के इलाज और किडनी ट्रांसप्लांट पर संती देवी ने अपनी सारी जमा पूंजी खर्च कर दी थी। अब वह खेती और पशुपालन के जरिए अपनी रोजी-रोटी चला रही हैं। आर्थिक संकट के साथ-साथ मानसिक पीड़ा ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया है। संती देवी के जीवन में संघर्षों का सिलसिला लगातार जारी है, और वह हर दिन अपने दर्द को समेटकर आगे बढ़ने की कोशिश कर रही हैं।

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संती देवी की कहानी

संती देवी की कहानी यह बताती है कि एक मां अपनी संतान के लिए क्या कुछ नहीं कर सकती। वह अपनी किडनी दे सकती है, अपने शरीर का एक हिस्सा दे सकती है, लेकिन फिर भी जब भाग्य उसे धोखा दे, तो यह बेहद दुखद और दर्दनाक होता है। उनकी इस कड़ी मेहनत, बलिदान और संघर्ष की यात्रा हर किसी के लिए एक प्रेरणा बन सकती है, कि हालात चाहे जैसे भी हों, इंसान को कभी हार नहीं माननी चाहिए।

मुख्य बिंदू:

  • संती देवी ने अपने बेटे मुकेश की दोनों किडनियां खराब होने के बाद अपनी एक किडनी दी थी, ताकि उसका इलाज हो सके और उसकी जान बचाई जा सके।
  • संती देवी ने तीन साल में अपने पति, दो बेटों, बहू और सास को खो दिया था। इनमें से उनके बड़े बेटे की भी ब्रेन हैमरेज से मौत हुई।
  • संती देवी आर्थिक और मानसिक संकटों से जूझ रही हैं। उन्होंने अपने बेटे के इलाज और किडनी ट्रांसप्लांट पर अपनी सारी जमा पूंजी खर्च कर दी थी। अब वह खेती और पशुपालन के जरिए जीवन यापन कर रही हैं।
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