सीकर ऑनर किलिंग केस, हाईकोर्ट ने 11 आरोपियों को बरी किया, फांसी का फैसला भी रद्द
Mukesh Sharma | Oct 30, 2026, 22:37 IST
सीकर ऑनर किलिंग केस
राजस्थान हाईकोर्ट ने सीकर के चर्चित ऑनर किलिंग मामले में 11 आरोपियों को बरी कर दिया है। और मुख्य आरोपी रामगोपाल की फांसी की सजा पर भी रोक लगा दी है। कोर्ट ने सबूतों में कमियों पर पुलिस जांच को कठघरे में खड़ा किया और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के लिए एसओपी बनाने के निर्देश दिए।
जस्टिस महेंद्र कुमार गोयल और जस्टिस भुवन गोयल की खंडपीठ ने यह फैसला सीकर की एडीजे-1 अदालत की ओर से भेजे गए डेथ रेफरेंस और आरोपियों की अपीलों पर सुनवाई के बाद दिया। ट्रायल कोर्ट ने 30 नवंबर 2024 को रामगोपाल को मृत्युदंड सुनाया था। वहीं अन्य आरोपियों को उम्रकैद और अलग-अलग सजाएं दी थीं।
यह मामला अक्टूबर 2019 का है। अभियोजन के अनुसार, रामगोपाल की बेटी प्रेम और गणपत लाल एक-दूसरे से प्रेम करते थे। रामगोपाल इस रिश्ते से नाराज था। आरोप था कि उसने अपने रिश्तेदारों और अन्य लोगों के साथ मिलकर दोनों की हत्या की साजिश रची।
अभियोजन की कहानी के मुताबिक, 21 अक्टूबर 2019 की रात गणपत लाल को सीकर के पलसाना बाइपास स्थित पेट्रोल पंप से ले जाया गया। इसके बाद प्रेम और गणपत की हत्या कर दी गई। गणपत के शरीर पर 22 चोटें मिली थीं। वहीं प्रेम की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में 12 चोटों का जिक्र था। रिपोर्ट के अनुसार, प्रेम की मौत गला घोंटने से हुई थी।
पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ सीसीटीवी फुटेज, बरामदगी और अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्य पेश किए थे। इन्हीं के आधार पर ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को दोषी माना था।
हाईकोर्ट ने मामले में सीसीटीवी फुटेज को अहम साक्ष्य माना, लेकिन उसकी जब्ती और सुरक्षा की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत के अनुसार, ट्रायल कोर्ट ने पेट्रोल पंप और रामगोपाल के घर के CCTV फुटेज पर काफी भरोसा किया था। लेकिन फुटेज को पेन ड्राइव में कॉपी करने और उसे सुरक्षित रखने की प्रक्रिया में जरूरी सावधानियां नहीं बरती गईं।
अदालत ने पाया कि पेन ड्राइव को सील करने और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य से जुड़े जरूरी प्रमाणपत्र की प्रक्रिया में कमियां थीं। रिकॉर्ड से यह भी स्पष्ट नहीं हुआ कि DVR को मालखाने से कब और किसने निकाला। पेट्रोल पंप का DVR भी घटना के करीब साढ़े तीन महीने बाद जब्त किया गया था।
कोर्ट के सामने यह सवाल भी था कि जांच अधिकारी ऐसे लोगों की पहचान कैसे कर रहे थे, जिनसे वे पहले परिचित नहीं थे। फुटेज में कई चेहरों की पहचान भी स्पष्ट नहीं थी। ऐसे में अदालत ने माना कि इन फुटेज के आधार पर आरोपियों की मौजूदगी और उनकी भूमिका भरोसेमंद तरीके से साबित नहीं होती।
हाईकोर्ट ने अभियोजन की कहानी में कई विरोधाभास भी पाए। एक तरफ दावा किया गया कि प्रेम को रात में उसके घर पर पीटा गया था और बाद में वह गणपत के साथ पेट्रोल पंप पहुंची। दूसरी तरफ एक आरोपी पर उसे जयपुर की ओर से सीकर लाने का आरोप था।
टोल प्लाजा के रिकॉर्ड और घटनाक्रम के समय में भी तालमेल नहीं मिला। पेट्रोल पंप पर प्रेम की मौजूदगी सीसीटीवी फुटेज से स्पष्ट नहीं हो सकी। कथित हत्या में इस्तेमाल केबल, वाहनों और अन्य सामान की बरामदगी भी आरोपियों की भूमिका निर्णायक रूप से साबित नहीं कर पाई।
अदालत ने यह भी नोट किया कि खाटूश्यामजी थाने में घटना के शुरुआती दौर में हुई जांच का रिकॉर्ड पेश नहीं किया गया। कोर्ट ने साफ किया कि आरोपियों की ओर से संतोषजनक जवाब नहीं देना, अभियोजन के अधूरे सबूतों की कमी पूरी नहीं कर सकता।
राज्य सरकार ने रामगोपाल को मिली फांसी की सजा की पुष्टि के लिए हाईकोर्ट में डेथ रेफरेंस भेजा था। लेकिन जब अदालत ने पाया कि दोषसिद्धि ही भरोसेमंद सबूतों पर कायम नहीं रह सकती, तो मृत्युदंड की पुष्टि का आधार भी नहीं बचा। इसी के साथ डेथ रेफरेंस खारिज कर दिया गया और सभी 11 आरोपियों की अपीलें मंजूर कर ली गईं।
इस मामले में पुलिस जांच की कमियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को जुटाने और सुरक्षित रखने की प्रक्रिया सुधारने पर भी जोर दिया। अदालत ने डीजीपी को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता-2023 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम-2023 के अनुरूप CCTV फुटेज और कॉल डिटेल रिकॉर्ड जैसे इलेक्ट्रॉनिक सबूतों के लिए मानक संचालन प्रक्रिया यानी SOP तैयार करने के निर्देश दिए हैं।
इस प्रक्रिया में CCTV फुटेज की समय पर पहचान, मूल स्टोरेज डिवाइस की जब्ती, फॉरेंसिक कॉपी तैयार करने, हैश वैल्यू दर्ज करने और सबूतों की सीलिंग व सुरक्षित रखरखाव जैसे बिंदु शामिल होंगे। अदालत ने जांच अधिकारियों और थाना प्रभारियों को प्रशिक्षण देने के निर्देश भी दिए हैं। अभियोजन अधिकारियों को इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य अदालत में साबित करने की ट्रेनिंग देने पर भी जोर दिया गया है।
इस फैसले से एक बार फिर यह सवाल सामने आया है कि गंभीर आपराधिक मामलों में केवल आरोप और परिस्थितियां काफी नहीं हैं। अदालत में हर सबूत को कानून के मुताबिक जुटाना, सुरक्षित रखना और प्रमाणित करना भी उतना ही जरूरी है।
प्रेम प्रसंग बना था विवाद की वजह
अभियोजन की कहानी के मुताबिक, 21 अक्टूबर 2019 की रात गणपत लाल को सीकर के पलसाना बाइपास स्थित पेट्रोल पंप से ले जाया गया। इसके बाद प्रेम और गणपत की हत्या कर दी गई। गणपत के शरीर पर 22 चोटें मिली थीं। वहीं प्रेम की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में 12 चोटों का जिक्र था। रिपोर्ट के अनुसार, प्रेम की मौत गला घोंटने से हुई थी।
पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ सीसीटीवी फुटेज, बरामदगी और अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्य पेश किए थे। इन्हीं के आधार पर ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को दोषी माना था।
CCTV फुटेज पर सबसे बड़ा सवाल
अदालत ने पाया कि पेन ड्राइव को सील करने और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य से जुड़े जरूरी प्रमाणपत्र की प्रक्रिया में कमियां थीं। रिकॉर्ड से यह भी स्पष्ट नहीं हुआ कि DVR को मालखाने से कब और किसने निकाला। पेट्रोल पंप का DVR भी घटना के करीब साढ़े तीन महीने बाद जब्त किया गया था।
कोर्ट के सामने यह सवाल भी था कि जांच अधिकारी ऐसे लोगों की पहचान कैसे कर रहे थे, जिनसे वे पहले परिचित नहीं थे। फुटेज में कई चेहरों की पहचान भी स्पष्ट नहीं थी। ऐसे में अदालत ने माना कि इन फुटेज के आधार पर आरोपियों की मौजूदगी और उनकी भूमिका भरोसेमंद तरीके से साबित नहीं होती।
अभियोजन की कहानी में भी विरोधाभास
टोल प्लाजा के रिकॉर्ड और घटनाक्रम के समय में भी तालमेल नहीं मिला। पेट्रोल पंप पर प्रेम की मौजूदगी सीसीटीवी फुटेज से स्पष्ट नहीं हो सकी। कथित हत्या में इस्तेमाल केबल, वाहनों और अन्य सामान की बरामदगी भी आरोपियों की भूमिका निर्णायक रूप से साबित नहीं कर पाई।
अदालत ने यह भी नोट किया कि खाटूश्यामजी थाने में घटना के शुरुआती दौर में हुई जांच का रिकॉर्ड पेश नहीं किया गया। कोर्ट ने साफ किया कि आरोपियों की ओर से संतोषजनक जवाब नहीं देना, अभियोजन के अधूरे सबूतों की कमी पूरी नहीं कर सकता।
फांसी की सजा की पुष्टि क्यों नहीं हुई?
इलेक्ट्रॉनिक सबूतों के लिए SOP बनाने के निर्देश
इस प्रक्रिया में CCTV फुटेज की समय पर पहचान, मूल स्टोरेज डिवाइस की जब्ती, फॉरेंसिक कॉपी तैयार करने, हैश वैल्यू दर्ज करने और सबूतों की सीलिंग व सुरक्षित रखरखाव जैसे बिंदु शामिल होंगे। अदालत ने जांच अधिकारियों और थाना प्रभारियों को प्रशिक्षण देने के निर्देश भी दिए हैं। अभियोजन अधिकारियों को इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य अदालत में साबित करने की ट्रेनिंग देने पर भी जोर दिया गया है।
इस फैसले से एक बार फिर यह सवाल सामने आया है कि गंभीर आपराधिक मामलों में केवल आरोप और परिस्थितियां काफी नहीं हैं। अदालत में हर सबूत को कानून के मुताबिक जुटाना, सुरक्षित रखना और प्रमाणित करना भी उतना ही जरूरी है।
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