जबलपुर स्वास्थ्य विभाग में ‘भ्रष्टाचार का साम्राज्य’ ध्वस्त, करोड़ों के फर्जी बिल घोटाले में CMHO डॉ. संजय मिश्रा निलंबित

Neel Tiwari | Apr 03, 2026, 23:43 IST
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Photograph: (the sootr)

जबलपुर स्वास्थ्य विभाग में हुई भ्रष्टाचार के मामले में CMHO डॉ. संजय मिश्रा को निलंबित किया गया है। करोड़ों के फर्जी बिलों का घोटाला सामने आया, जिसमें सरकारी धन की लूट हुई।

News in Short

  • 1 करोड़ से ज्यादा के फर्जी बिल, बिना सामान भुगतान का मामला उजागर।
  • 93 लाख रुपए का भुगतान पहले ही किया जा चुका था।
  • स्टोर में सामान नहीं, सिर्फ कागजों में एंट्री।
  • सीएमएचओ, DPM ने मिलकर अपने ही विभाग को लूट।
  • जांच में अधिकारियों के बयान आपस में टकराए।

Intro

जबलपुर के स्वास्थ्य विभाग में भ्रष्टाचार की ऐसी परतें खुली हैं, जिसने पूरे सिस्टम को कठघरे में खड़ा कर दिया है। बिना सामान खरीदे करोड़ों के भुगतान का खेल महीनों से चल रहा था और जिम्मेदार अधिकारी कि इसमें पूरी मिलीभगत थी। अब आखिरकार प्रशासन ने सख्ती दिखाते हुए CMHO डॉ. संजय मिश्रा को निलंबित कर दिया है।

News in Detail

जबलपुर स्वास्थ्य विभाग में सालों से चल रहे फर्जीवाड़ों की कलाई आखिरकार खुलना शुरू हो चुकी है। सीएमएचओ संजय मिश्रा सहित उसके अधीनस्थ अधिकारियों के द्वारा किया गया करोड़ का घोटाला सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि संगठित भ्रष्टाचार की कहानी बयां करता है।

जांच में खुलासा हुआ कि बिना किसी सामग्री की आपूर्ति के ही 1 करोड़ से अधिक के फर्जी बिल लगाकर भुगतान की प्रक्रिया पूरी कर दी गई। यह सीधे-सीधे सरकारी धन की लूट का मामला है, जिसमें जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारी भी शामिल पाए गए।



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जांच में खुली ‘कागजी खरीद’ की पोल

31 मार्च 2026 को गठित जांच दल ने जब CMHO कार्यालय का औचक निरीक्षण किया, तो सारा खेल सामने आ गया। स्टॉक रजिस्टर में 17 और 24 मार्च को 13 बिलों की एंट्री दर्ज थी, लेकिन जब मौके पर भंडार गृह की जांच हुई, तो वहां एक भी सामान मौजूद नहीं मिला। यानी पूरा लेन-देन सिर्फ कागजों में किया गया था।

भुगतान पहले, सामान कभी नहीं

सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इन 13 बिलों में से 12 बिलों का भुगतान करीब 93 लाख रुपए पहले ही जारी किया जा चुका था। यह न सिर्फ वित्तीय नियमों का खुला उल्लंघन है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि विभाग के भीतर मिलीभगत कितनी गहरी थी। मप्र भंडार क्रय नियम 2015 को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया। फर्जी खरीदारी कर कमाई गई यह अवैध रकम निकले कर्मचारियों से लेकर सीएमएचओ तक बटती थी।

लेखा प्रणाली भी ‘गायब’, कैशबुक अधूरी

जांच में यह भी सामने आया कि लेखा शाखा की कैशबुक सितंबर 2025 के बाद अपडेट ही नहीं की गई थी। ऐसे में करोड़ों के लेन-देन को रिकॉर्ड में ही नहीं लाया गया। यह स्थिति साफ दिखाती है कि घोटाले को छिपाने के लिए सुनियोजित तरीके से दस्तावेजी व्यवस्था को भी निष्क्रिय कर दिया गया था।

बचने के लिए दिए बयानों ने ही खोल दी पोल

जांच के दौरान अधिकारियों के बयान भी इस घोटाले की गंभीरता को और बढ़ाते हैं।
फार्मासिस्ट ने स्वीकार किया कि उसने वरिष्ठ अधिकारी के कहने पर फर्जी एंट्री की। वहीं स्टोर कीपर और DPM ने सामग्री उपलब्ध होने के भ्रामक दावे किए, जिन्हें जांच टीम ने खारिज कर दिया। यह साफ संकेत है कि विभाग में जिम्मेदारी तय करने से बचने के लिए एक-दूसरे पर आरोप डालने का खेल खेला गया।

पहले भी आरोपों से घिरे रहा हैं डॉ. मिश्रा

यह पहली बार नहीं है जब सीएमएचओ डॉ. संजय मिश्रा पर गंभीर आरोप लगे हों। इससे पहले भी उनके खिलाफ भ्रष्टाचार, पद के दुरुपयोग और वित्तीय अनियमितताओं के कई मामले सामने आ चुके हैं। निजी लबों में भागीदारी सहित दो पत्नियों होने के आप भी उनके ऊपर लगे हैं।

सालों की खरीदारी का स्टॉक रजिस्टर गायब कर देने से लेकर नकली GEM ID से खरीदारी जैसे मुद्दों पर तो जांच रिपोर्ट अब तक सामने भी नहीं आ पाई है। उनके खिलाफ शिकायतें लोकायुक्त तक पहुंचीं और मामला हाईकोर्ट में भी गया, जहां से जांच के आदेश जारी हुए। हालांकि विभाग में अपने संबंधों के चलते मिश्रा हर विभागीय जांच को टालने या तथ्यों को दबाने में हमेशा कामयाब रहा है।

शिकायतकर्ताओं पर दबाव बनाने के आरोप

डॉ. मिश्रा पर यह भी आरोप है कि उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज शिकायतों और अवमानना याचिकाओं को वापस लेने के लिए शिकायतकर्ताओं पर दबाव बनाया। इस तरह के आरोप न सिर्फ प्रशासनिक आचरण पर सवाल उठाते हैं, बल्कि यह भी दिखाते हैं कि सिस्टम के भीतर जवाबदेही किस हद तक कमजोर हो चुकी थी।

आखिरकार गिरी ‘गाज’, निलंबन आदेश जारी

3 अप्रैल 2026 को जारी आदेश में डॉ. संजय मिश्रा को मध्य प्रदेश सिविल सेवा नियम 1966 के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया।

आदेश में स्पष्ट कहा गया कि उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग किया, प्रशासनिक नियंत्रण खो दिया और वित्तीय अनुशासन का घोर उल्लंघन किया।

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सिस्टम पर बड़ा सवाल,कितने और ‘मिश्रा’ छिपे हैं?

यह मामला सिर्फ एक अधिकारी के निलंबन तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। अगर जांच निष्पक्ष और गहराई से हुई, तो यह घोटाला और बड़े नामों को भी बेनकाब कर सकता है। फिलहाल, यह कार्रवाई भ्रष्टाचार के खिलाफ एक शुरुआत जरूर है, लेकिन क्या यह अंत तक पहुंचेगी, यही सबसे बड़ा सवाल है।

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