कूल टीचर बनने की दौड़ और उससे जुड़े खतरे
Pawan Modiya | Jul 17, 2026, 17:46 IST
कूल टीचर
सोशल मीडिया पर लोकप्रिय बनने की होड़ में कई शिक्षक छात्रों से निजी डिजिटल संपर्क बढ़ा रहे हैं। इससे शिक्षक और छात्र के बीच जरूरी पेशेवर दूरी कम हो सकती है। यह बच्चों की निजता, सुरक्षा और शिक्षक की विश्वसनीयता, तीनों के लिए चिंता का विषय बन रहा है।
आजकल एक नए तरह के शिक्षक सामने आए हैं, जिन्हें बच्चे और कई अभिभावक भी खूब पसंद करते हैं। वे इंस्टाग्राम रील बनाकर पढ़ाते हैं, ट्रेंडिंग गानों पर गणित समझाते हैं, रात में लाइव आकर बोर्ड परीक्षा की तैयारी कराते हैं और छात्रों के डायरेक्ट मैसेज (DM) का भी जवाब देते हैं। उनके वीडियो पर अक्सर लिखा होता है- "स्कूल पढ़ाई का बोझ नहीं, मजेदार जगह होना चाहिए।"
उनका उद्देश्य बच्चों को बेहतर तरीके से पढ़ाना होता है, लेकिन इस कोशिश के कुछ गंभीर खतरे भी हैं। आज "कूल टीचर" बनने की होड़ में कई शिक्षक धीरे-धीरे शिक्षक से ज्यादा सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर बनते जा रहे हैं। इससे शिक्षक और छात्र के बीच जरूरी पेशेवर दूरी कम होने लगी है।
शिक्षक सिर्फ पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह बच्चों की सुरक्षा और मार्गदर्शन की जिम्मेदारी भी निभाता है। यही वजह है कि भारत के कानून, जैसे POCSO Act, शिक्षकों पर बच्चों की सुरक्षा की खास जिम्मेदारी डालते हैं।
यह जिम्मेदारी सिर्फ स्कूल तक सीमित नहीं है। अगर कोई शिक्षक किसी नाबालिग छात्र को इंस्टाग्राम पर फॉलो करता है, देर रात निजी चैट करता है, मीम भेजता है या उसकी निजी पोस्ट पर लगातार टिप्पणी करता है, तो शिक्षक और छात्र के बीच की पेशेवर सीमा कमजोर होने लगती है।
कई बार शिक्षक का इरादा गलत नहीं होता। लेकिन लगातार निजी बातचीत भरोसे की ऐसी स्थिति बना सकती है, जिसका कोई दूसरा व्यक्ति गलत फायदा उठा सकता है। इसलिए शिक्षक और छात्र के बीच स्पष्ट सीमाएं बनाए रखना जरूरी है। आज सोशल मीडिया पर भेजा गया कोई भी संदेश हमेशा निजी नहीं रहता। उसका स्क्रीनशॉट कभी भी सबूत बन सकता है।
सोशल मीडिया पर सफल होने के लिए ज्यादा व्यूज, लाइक और फॉलोअर्स चाहिए। इसलिए कई बार पढ़ाई से ज्यादा ध्यान मनोरंजन पर चला जाता है। धीरे-धीरे शिक्षक ज्ञान देने वाले व्यक्ति से ज्यादा एक "पर्सनल ब्रांड" बन जाता है। ऐसे में सख्ती करना, कम अंक देना या अनुशासन बनाए रखना भी मुश्किल हो सकता है, क्योंकि इससे उसकी लोकप्रियता प्रभावित हो सकती है।
आज कई शिक्षक कक्षा के वीडियो सोशल मीडिया पर डालते हैं। उनमें छात्रों की आवाज, हंसी, गलत जवाब या शर्मिंदगी के पल भी रिकॉर्ड हो जाते हैं। भले ही चेहरा धुंधला कर दिया जाए, लेकिन बच्चे की पहचान कई बार फिर भी हो सकती है।
भारत का डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 कहता है कि 18 साल से कम उम्र के बच्चे अपने निजी डेटा के इस्तेमाल की कानूनी सहमति खुद नहीं दे सकते। संयुक्त राष्ट्र भी बच्चों की डिजिटल निजता की रक्षा पर जोर देता है। इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि क्या यह कानूनी है, बल्कि यह भी है कि क्या यह नैतिक रूप से सही है।
सोशल मीडिया पर लोकप्रियता सभी शिक्षकों को समान रूप से नहीं मिलती। कई बार लिंग, जाति या धर्म के आधार पर भी लोगों की प्रतिक्रिया अलग होती है। इसके बावजूद कई स्कूल चाहते हैं कि उनके शिक्षक सोशल मीडिया पर स्कूल की अच्छी छवि बनाएं। इससे शिक्षकों पर अतिरिक्त दबाव भी बढ़ रहा है।
सीबीएसई और कई राज्य सरकारों ने शिक्षकों को पेशेवर व्यवहार बनाए रखने की सलाह दी है। तमिलनाडु जैसे राज्यों ने तो शिक्षकों और छात्रों के बीच डिजिटल बातचीत को लेकर दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं। POCSO कानून बच्चों के साथ किसी भी तरह के यौन उत्पीड़न, ग्रूमिंग या अनुचित ऑनलाइन संपर्क को अपराध मानता है। यानी ऑनलाइन हो या ऑफलाइन, शिक्षक और छात्र का रिश्ता हमेशा पेशेवर, पारदर्शी और सुरक्षित होना चाहिए।
स्कूलों को स्पष्ट नियम बनाने चाहिए। जैसे
एक शिक्षक का काम हर छात्र का दोस्त बनना या सोशल मीडिया पर मशहूर होना नहीं है। उसका सबसे बड़ा काम है छात्रों का भरोसा जीतना और उन्हें सुरक्षित माहौल में अच्छी शिक्षा देना। इसलिए अगली बार कोई रील बनाने या पोस्ट डालने से पहले हर शिक्षक को खुद से एक सवाल पूछना चाहिए— क्या यह काम मेरे छात्रों की पढ़ाई के लिए है, या सिर्फ ज्यादा लाइक और फॉलोअर्स पाने के लिए?
इसी सवाल का जवाब तय करेगा कि सोशल मीडिया शिक्षा का माध्यम बनेगा या बच्चों के लिए नया खतरा।
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उनका उद्देश्य बच्चों को बेहतर तरीके से पढ़ाना होता है, लेकिन इस कोशिश के कुछ गंभीर खतरे भी हैं। आज "कूल टीचर" बनने की होड़ में कई शिक्षक धीरे-धीरे शिक्षक से ज्यादा सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर बनते जा रहे हैं। इससे शिक्षक और छात्र के बीच जरूरी पेशेवर दूरी कम होने लगी है।
क्यों जरूरी है यह दूरी?
यह जिम्मेदारी सिर्फ स्कूल तक सीमित नहीं है। अगर कोई शिक्षक किसी नाबालिग छात्र को इंस्टाग्राम पर फॉलो करता है, देर रात निजी चैट करता है, मीम भेजता है या उसकी निजी पोस्ट पर लगातार टिप्पणी करता है, तो शिक्षक और छात्र के बीच की पेशेवर सीमा कमजोर होने लगती है।
हर गलत शुरुआत बुरे इरादे से नहीं होती
जब पढ़ाई भी कंटेंट बन जाती है
क्या बच्चों की निजता सुरक्षित है?
भारत का डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 कहता है कि 18 साल से कम उम्र के बच्चे अपने निजी डेटा के इस्तेमाल की कानूनी सहमति खुद नहीं दे सकते। संयुक्त राष्ट्र भी बच्चों की डिजिटल निजता की रक्षा पर जोर देता है। इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि क्या यह कानूनी है, बल्कि यह भी है कि क्या यह नैतिक रूप से सही है।
हर शिक्षक को बराबर फायदा नहीं मिलता
कानून कहता है कि शिक्षक पेशेवर हो
स्कूलों को क्या करना चाहिए?
- शिक्षक छात्रों को निजी सोशल मीडिया अकाउंट से फॉलो न करें।
- निजी मैसेज (DM) से बातचीत न करें।
- देर रात लाइव सेशन न रखें।
- छात्रों के वीडियो या तस्वीरें निजी सोशल मीडिया अकाउंट पर पोस्ट न करें।
असली जिम्मेदारी क्या है?
इसी सवाल का जवाब तय करेगा कि सोशल मीडिया शिक्षा का माध्यम बनेगा या बच्चों के लिए नया खतरा।
(लेख हिंदू से साभार)
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