सामाजिक-शैक्षणिक पिछड़ापन: संविधान में परिभाषा अब भी अधूरी
The Sootr | Aug 10, 2026, 14:41 IST
samajik shaikshanik pichhdapan
लार्ड केल्विन के मापन सिद्धांत के हवाले से लेखक सवाल उठाते हैं कि संविधान में सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ेपन को स्पष्ट परिभाषित और नापने योग्य क्यों नहीं बनाया गया। ताकि आरक्षण व्यवस्था वैज्ञानिक आधार पर तय हो सके।
विज्ञान का वह सिद्धांत, जो केल्विन ने दिया
केल्विन ने एक बात कही जो मैंने छात्र जीवन में पढ़ी थी, लेकिन आज तक याद है और वह बात मुझे बहुत पसंद है। केल्विन ने कहा कि यदि आप किसी चीज को नाप नहीं सकते और उसे अंकों में व्यक्त नहीं कर सकते, तो फिर वह चीज विज्ञान की परिधि में नहीं आती।
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कानून में परिभाषा जरूरी क्यों होती है
संविधान के अपरिभाषित शब्द: सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन
पिछड़ापन सापेक्ष है, पर सीमा तय होनी चाहिए
समाज में भी एक ही जाति में अनेक उपजातियां हैं जो अपने आपको एक-दूसरे से श्रेष्ठ मानती हैं। देश, काल और परिस्थिति के हिसाब से कहीं कोई पिछड़ा है तो दूसरी जगह वही अगड़ा है।
एक निजी अनुभव, जो आज भी याद है
उस परिवार के मुखिया ने गेट पर ही मेरा परिचय पूछा। कहा कि बच्चे हो इसलिए माफ कर देता हूं। सनाढ्य ब्राह्मण होकर तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई कान्यकुब्जों के यहां रिश्ता मांगने की।
पिछड़ेपन को नापने का पैमाना क्यों जरूरी
आज विज्ञान इतना विकसित हो चुका है कि दया, ममता, क्रोध जैसी अमूर्त-अदृश्य भावनाएं भी नापी जाने लगी हैं। इन्हें नापने की भी विधियां खोजी जा चुकी हैं और उनका शोध कार्यों में उपयोग किया जा रहा है। फिर सामाजिक-शैक्षणिक पिछड़ापन को नापने में क्या दिक्कत है। भेदभाव, असमानता - इन सबको परिभाषित कीजिए और इनको नापने का वैज्ञानिक पैमाना बनाइए।
आंकड़ों का खेल: एक ही सच, दो कहानियां
हम यह भी कह सकते हैं कि केवल 0.00075% छात्रों ने शिकायत की है, जो कि नगण्य है, अब भेदभाव नहीं बचा। हम यह भी कह सकते हैं कि शिकायतों में 150% की वृद्धि हुई है, भेदभाव चरम पर है।
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वैज्ञानिक पैमाना ही समाधान
एक सामान्य शिक्षित व्यक्ति भी उस पैमाने पर नापकर बता सके कि अमुक व्यक्ति पिछड़े में आता है कि नहीं, और यदि वह उस पैमाने में नहीं आ रहा है तो फिर उसे आरक्षण से अलग किया जाए। विचार मंथनकर्मचारी नेता सुधीर नायक
( नोट: लेखक सुधीर नायक, मप्र के कर्मचारी नेता एवं लेखक हैं। लेख में प्रकाशित विचार उनके व्यक्तिगत हैं)
FAQ
- लेखक ने लार्ड केल्विन के सिद्धांत का हवाला क्यों दिया है?
केल्विन का मानना था कि जिस चीज को नापा या अंकों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। वह विज्ञान की परिधि में नहीं आती। लेखक इसी सिद्धांत के आधार पर तर्क देते हैं कि सामाजिक-शैक्षणिक पिछड़ापन भी नापने योग्य होना चाहिए। - संविधान में आरक्षण को लेकर किन शब्दों को अपरिभाषित बताया गया है?
लेख के मुताबिक, "सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन" शब्दों को संविधान में स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया, जबकि आर्थिक पिछड़ापन नापे जाने योग्य होने के कारण अलग रखा गया। - लेखक किस तरह के मापदंड की मांग कर रहे हैं?
लेखक चाहते हैं कि सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ेपन की वैज्ञानिक, नापने योग्य परिभाषा बने ताकि कोई भी व्यक्ति स्पष्ट रूप से जान सके कि वह इस श्रेणी में आता है या नहीं।
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