अमित शाह के भोपाल दौरे में सौगातें ही नहीं, MP के सहकारिता मॉडल की भी होगी परीक्षा
Ramanand Tiwari | Oct 01, 2026, 23:24 IST
सौगातों संग MP के सहकारिता मॉडल की परीक्षा
अमित शाह 3 अक्टूबर को भोपाल के गोपालक सम्मेलन में शामिल होंगे। अमित शाह भोपाल दौरा सिर्फ सौगातों तक सीमित नहीं रहेगा। मध्य प्रदेश सहकारिता मॉडल की जमीनी रफ्तार भी कसौटी पर रहेगी। भेल दशहरा मैदान में 35 हजार से ज्यादा गोपालक जुटेंगे। डेयरी परियोजनाएं भी सामने आएंगी। इसके साथ गांवों तक सहकारी डेयरी नेटवर्क पहुंचाने की चुनौती चर्चा में रहेगी।
2028 से पहले ग्रामीण नेटवर्क भी अहम सवाल
डेढ़ साल बाद फिर भोपाल, अब काम दिखाने की बारी
इस पूरे आयोजन को केवल भीड़ और सौगातों के नजरिए से देखना अधूरा होगा। असल मुद्दा उस सहकारिता मॉडल का है, जिसकी दिशा खुद शाह अप्रैल 2025 में भोपाल से तय कर चुके हैं। तब उन्होंने कहा था कि मध्य प्रदेश के केवल 17 प्रतिशत गांवों में दूध संग्रह की व्यवस्था है।
उनका कहना था कि शुरुआती पांच वर्षों में कम से कम 50 प्रतिशत गांवों में प्राथमिक दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियां स्थापित करने का लक्ष्य रखा जाना चाहिए। यानी 3 अक्टूबर के कार्यक्रम के पीछे एक बड़ा सवाल स्वाभाविक रूप से मौजूद है प्रदेश का सहकारी डेयरी नेटवर्क गांवों तक कितनी तेजी से पहुंच रहा है?
बड़ी योजना, लेकिन जमीनी रफ्तार पर नजर
उपलब्ध आधिकारिक आंकड़े यह भी बताते हैं कि जुलाई 2026 तक इस दिशा में काम जारी था और लक्ष्य का एक बड़ा हिस्सा आगे पूरा किया जाना था। इसी कारण अब केवल नई समिति बनाने की संख्या पर्याप्त नहीं होगी। यह भी देखना होगा कि बनी हुई समितियों में कितनी वास्तव में सक्रिय हैं, कितना दूध इकट्ठा कर रही हैं और पशुपालकों को उससे कितना आर्थिक लाभ मिल रहा है। यही इस अभियान का माइनस और जवाबदेही वाला हिस्सा है।
16.80 करोड़ का प्लांट देगा नया रास्ता
भेल मैदान में 35 हजार गोपालक
पशुपालकों को बोनस मिलेगा, गौशालाओं को आर्थिक सहायता दी जाएगी और गोपालक दीदियों का सम्मान होगा। डॉ. भीमराव आंबेडकर कामधेनु योजना के स्वीकृति पत्र भी वितरित किए जाने हैं। यानी सरकार इस मंच के जरिए सहकारिता, पशुपालन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था तीनों को एक साथ सामने रख रही है।
2028 से पहले ग्रामीण नेटवर्क का राजनीतिक महत्व
फिर भी गोपालकों, किसानों, महिलाओं और गांव स्तर की सहकारी संस्थाओं का बड़ा नेटवर्क सामाजिक और राजनीतिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण है। डेयरी सहकारिता की खासियत यह है कि सरकार का संपर्क किसी एक दिन की सभा तक सीमित नहीं रहता।
समिति सक्रिय हो तो किसान का उससे दूध बिक्री, भुगतान और रोजमर्रा की आर्थिक गतिविधि के जरिए लगातार रिश्ता रहता है। यही नेटवर्क आने वाले वर्षों में सरकार के ग्रामीण मॉडल की ताकत और उसकी कमजोरी दोनों को सामने ला सकता है।
शाह के सामने अब अगला सवाल
अप्रैल 2025 में शाह ने जिस बड़े विस्तार की दिशा तय की थी, अब उसी रोडमैप पर हुई प्रगति महत्वपूर्ण हो गई है। इसलिए शाह का भोपाल दौरा केवल सौगातों का कार्यक्रम नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश में सहकारिता के बड़े दावे और उसके जमीनी असर को देखने का भी मौका है।
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