हाईकोर्ट ने खारिज की छठवें वेतनमान पर तत्कालीन शिवराज सरकार की अपील
Sanjay Sharma | Jan 19, 2026, 23:06 IST
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मध्य प्रदेश के पंचायतकर्मियों को 12 साल की लड़ाई के बाद छठवां वेतनमान मिला। हाईकोर्ट ने सरकारी अपील खारिज की। कर्मचारियों को एरियर देने का आदेश दिया।
News in Short
- DRDA के कर्मचारियों की सेवाएं तत्कालीन शिवराज सरकार ने पंचायत विभाग को सौंपी थीं।
- कर्मचारियों को पांचवें वेतनमान के लिए हाईकोर्ट जाना पड़ा।
- विभाग के नियमित कर्मचारियों के समान वेतन नहीं मिल रहा था।
- सरकार ने छठा वेतनमान लागू किया, लेकिन आदेश में एक शर्त थी।
- इसके कारण DRDA कर्मचारियों को 2006 से नहीं, 2013 से लाभ मिलने का प्रस्ताव था।
News in Detail
पंचायतकर्मियों ने तत्कालीन शिवराज सरकार के छठवें वेतनमान से संबंधित आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका पेश की थी। जिस पर सिंगल बेंच ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया तो सरकार भी अपील में चली गई।
इस वजह से जिला ग्रामीण विकास प्राधिकरण से जिला पंचायतों को सौंपे गए कर्मचारियों को छठवां वेतनमान नहीं मिल रहा था। यह वेतनमान दूसरे कर्मचारियों की समान अवधि से मिलता था। कर्मचारियों को 12 साल बाद छठे वेतनमान का हक मिला। हाईकोर्ट की डबल बेंच ने सिंगल बेंच का आदेश बरकरार रखा। सरकार की अपील खारिज कर दी गई।
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आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका
सिंगल बेंच ने सुनवाई के बाद सरकार को नियमित कर्मचारियों की तरह 2006 से ही छठवे वेतनमान का लाभ देने का फैसला सुनाया था। हाईकोर्ट की सिंगल बेंच के आदेश के खिलाफ तत्कालीन सरकार ने अपील की थी। यह मामला 12 साल तक कोर्ट की सुनवाई में चलता रहा और अब हाईकोर्ट की डबल बेंच ने सरकार की अपील को खारिज कर दिया है।
इसके साथ ही डबल बेंच ने पूर्व में सिंगल बेंच द्वारा सुनाए गए फैसले को यथावत रखा है। यानी अब सरकार को इन पंचायतकर्मियों को बकाया अवधि यानी 2647 दिन तक रोका गया छठवें वेतनमान का लाभ देना होगा। हाईकोर्ट बेंच इंदौर के जस्टिस विजय शुक्ला और आलोक अवस्थी की पीठ ने कर्मचारियों को बकाया वेतन के भुगतान का आदेश सरकार को दिया है।
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कर्मचारियों के खिलाफ पेश की थी अपील
इसी वजह से DRDA से पंचायत विभाग में ट्रांसफर कर्मचारियों को 2013 से छठे वेतनमान का फायदा देने का फैसला लिया गया था। उन्होंने दलील दी कि कर्मचारियों ने सरकार के उस आदेश को सीधी चुनौती नहीं दी है, जो 2013 में जारी किया गया था।
पंचायतकर्मियों की सेवा-शर्तें और नियम अलग थे। याचिकाकर्ताओं के एडवोकेट रवींद्र सिंह छाबड़ा, विकास जायसवाल और प्रनीषा नैयर ने कहा कि पंचायत एक निकाय है। जब नियोक्ता ने छठा वेतनमान देने का फैसला लिया, तो भेदभाव कैसे किया जा सकता है?
एमपी सरकार 2006 की बजाय 2013 से वेतनमान देने का कारण नहीं बता सकी। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देकर कहा कि वेतन में भेदभाव अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। कोर्ट ने समान काम समान वेतन के सिद्धांत पर सिंगल बेंच का फैसला यथावत रखते हुए सरकार की अपील खारिज कर दी।
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