27% OBC आरक्षण: सामान्य वर्ग की ओर से संशोधन पर उठाए सवाल, बुधवार से सरकार रखेगी अपना पक्ष

Neel Tiwari | Jul 21, 2026, 17:38 IST
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27% ओबीसी आरक्षण
Photograph: (THESOOTR)

JABALPUR. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में 27% OBC आरक्षण पर सुनवाई जारी है। सामान्य वर्ग की बहस अंतिम दौर में है। बुधवार से सरकार और समर्थक पक्ष दलीलें रखेंगे।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • मध्य प्रदेश में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है।
  • मंगलवार को सामान्य वर्ग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य सांघी ने बहस की।
  • अदालत में फिर 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा का मुद्दा उठाया गया।
  • सामान्य वर्ग ने कहा कि 2019 के संशोधन के समय सरकार के पास पर्याप्त डेटा नहीं था।
  • अब बुधवार को राज्य सरकार और आरक्षण समर्थक पक्ष अपनी दलीलें शुरू करेंगे।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण मामले की सुनवाई मंगलवार को भी जारी रही। जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच के समक्ष मंगलवार को भी सामान्य वर्ग की ओर से आरक्षण के विरोध में बहस हुई।

वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप संचेती की दलीलों के बाद मुख्य याचिका सहित अन्य याचिकाओं में पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य सांघी ने अदालत के सामने अपना पक्ष रखा।

अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि 50 प्रतिशत की सीमा से अधिक आरक्षण देने के लिए असाधारण परिस्थितियों का ठोस और मापने योग्य आधार होना जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला

वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य सांघी ने अपनी दलीलों में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण केवल असाधारण परिस्थितियों में ही दिया जा सकता है।

आदित्य सांघी ने अदालत से कहा कि ऐसी परिस्थितियों को केवल दावा करने से नहीं, बल्कि ठोस और मापने योग्य आंकड़ों से साबित करना जरूरी होता है।

सांघी का कहना था कि राज्य सरकार ऐसा कोई विश्वसनीय डेटा पेश नहीं कर सकी है, जिससे यह साबित हो सके कि मध्य प्रदेश में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण के लिए आवश्यक असाधारण स्थिति मौजूद थी।

2019 के संशोधन पर फिर उठे सवाल

सामान्य वर्ग की ओर से अदालत के सामने एक बार फिर वर्ष 2019 में किए गए संशोधन पर सवाल उठाए गए। आदित्य सांघी ने कहा कि जब सरकार ने संशोधन विधेयक लाकर ओबीसी आरक्षण बढ़ाया, तब उसके पास इस फैसले को समर्थन देने वाला कोई ठोस सामाजिक या शैक्षणिक डेटा उपलब्ध नहीं था।

आदित्य सांघी ने कहा कि बाद में जो सर्वे और डेटा संग्रह किया गया, वह संशोधन लागू होने के लगभग पांच वर्ष बाद हुआ। तब तक मामला हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच के समक्ष विचाराधीन था। ऐसे में बाद में तैयार किए गए आंकड़ों से पहले लिए गए फैसले को सही नहीं ठहराया जा सकता।

असाधारण परिस्थितियों के उदाहरण भी बताए

बहस के दौरान सामान्य वर्ग की ओर से यह भी कहा गया कि यदि राज्य में किसी क्षेत्र को असाधारण परिस्थिति का उदाहरण माना जा सकता है, तो वह पातालकोट जैसे दूरस्थ क्षेत्र या ओडिशा सीमा से लगे अत्यंत पिछड़े इलाके हो सकते हैं। लेकिन सरकार ने पूरे प्रदेश के लिए केवल जनसंख्या और पिछड़ेपन का हवाला देकर आरक्षण बढ़ाने का निर्णय लिया।

सामान्य वर्ग का तर्क था कि यह प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है और केवल आबादी के आधार पर 50 प्रतिशत की सीमा पार नहीं की जा सकती।

सामान्य वर्ग की बहस अंतिम चरण में

मंगलवार की सुनवाई के अंत में अदालत ने संकेत दिया कि सामान्य वर्ग की ओर से बहस लगभग पूरी हो चुकी है। डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि अगली सुनवाई में सामान्य वर्ग को केवल 10 से 15 मिनट का अतिरिक्त समय दिया जाएगा। इसके बाद राज्य सरकार और आरक्षण के समर्थन में पक्ष रखने वाले अधिवक्ता अपनी दलीलें शुरू करेंगे।

इससे स्पष्ट हो गया है कि अब मामला अगले चरण में प्रवेश करने जा रहा है, जहां सरकार अपने फैसले और 27 फीसदी OBC आरक्षण के आधार को अदालत के सामने रखेगी।

बुधवार को होगी अगली सुनवाई

हाई कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई बुधवार, 22 जुलाई को दोपहर 2:30 बजे निर्धारित की है। इस सुनवाई में सामान्य वर्ग की शेष बहस पूरी होने के बाद राज्य सरकार और आरक्षण समर्थक पक्ष अपने तर्क पेश करेंगे। लंबे समय से चल रहे इस मामले में अब सुनवाई का फोकस सरकार के पक्ष पर रहेगा, जिस पर सभी पक्षों की नजर बनी हुई है।

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