सहमति से बने संबंध पर पॉक्सो और बलात्कार में काटनी पड़ी 4 साल की कैद, HC से मिला इंसाफ

Neel Tiwari | Aug 28, 2025, 19:08 IST
Share
pocso-rape-consensual
pocso-rape-consensual

जबलपुर हाईकोर्ट ने मनोज कुमार यादव को सभी आरोपों से बरी किया। वह चार साल तक गलत उम्रकैद की सजा भुगत रहा था। निचली अदालत ने बिना सबूतों और गवाहों की सही जांच किए मनोज को दोषी ठहराया था।

न्यायपालिका की अनदेखी एक व्यक्ति का भविष्य खराब कर सकती है। इसका एक उदाहरण जबलपुर हाईकोर्ट में सामने आया। दरअसल निचली अदालत ने बिना सबूत और गवाहों पर ध्यान दिए एक व्यक्ति को उम्रकैद की सजा सुनाई। हाईकोर्ट ने इस मामले की पुनः जांच की और उसे बाइज्जत बरी कर दिया।

सलाखों के पीछे चार साल की लंबी और कठिन कैद भुगतने के बाद मनोज कुमार यादव को आखिरकार इंसाफ मिल गया। जबलपुर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया।

जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनीन्द्र कुमार सिंह की डिविजनल बेंच ने कहा कि निचली अदालत ने सबूतों और तथ्यों का सही परीक्षण नहीं किया। इसी कारण मनोज को दोषी ठहरा दिया गया था। इस अपील में मनोज की ओर से अधिवक्ता सुशील कुमार शर्मा ने पैरवी की और एक-एक कानूनी कमी को उजागर किया।

e395ba5e-922
e395ba5e-922


ये भी पढ़ें...सांसद और विधायकों के इशारे पर ट्रांसफर, HC ने कहा, इन्हें एडमिनिस्ट्रेशन में बैठा दो

निचली अदालत ने दी थी उम्रकैद की सजा

साल 2023 में विशेष न्यायाधीश (POCSO) एवं 18वें अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, जबलपुर ने मनोज कुमार यादव को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। अदालत ने उसे धारा 376(1) आईपीसी और एससी-एसटी एक्ट की धारा 3(2)(v) के तहत आजीवन कारावास, धारा 506 (भाग-2) में एक साल की सजा और धारा 450 आईपीसी में पांच साल की सजा सुनाई थी। उस समय डीएनए रिपोर्ट में पीड़िता और आरोपी का मिलान होना अदालत के लिए मुख्य आधार बना, लेकिन अदालत ने यह नहीं देखा कि अन्य आवश्यक साक्ष्य और गवाहियों की स्थिति कमजोर थी।

ये भी पढ़ें...नीली बत्ती की कार में सवार फर्जी IPS गिरफ्तार: तलाशी में मिले कई तरह के हथियार बरामद

सबूत और गवाहियों की हुई थी अनदेखी

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि निचली अदालत ने कई अहम बिंदुओं को दरकिनार कर दिया था।

जन्मतिथि का कोई पुख्ता प्रमाण नहीं: न तो जन्म प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया गया और न ही विद्यालय के अभिलेख जब्त किए गए। केवल एक डिस्चार्ज कार्ड पेश किया गया, जिसमें पिता का नाम तक दर्ज नहीं था।

मेडिकल रिपोर्ट की अनदेखी: मेडिकल जांच करने वाली महिला डॉक्टर को गवाही के लिए पेश नहीं किया गया। जबकि रिपोर्ट में साफ था कि पीड़िता के शरीर पर कोई बाहरी या आंतरिक चोट नहीं पाई गई।

वहीं पीड़िता ने अदालत में यह स्वीकार किया कि उसके पास 10वीं, 8वीं और 5वीं की अंकसूचियां थीं, लेकिन वे पेश नहीं की गईं। उसने यह भी माना कि घटना की शिकायत उसने पड़ोसियों या माता-पिता से तत्काल नहीं की थी।इसके साथ ही मेडिकल रिपोर्ट और गवाहियों में कहीं भी यह प्रमाणित नहीं हुआ कि पीड़िता के साथ जबरन संबंध बनाए गए थे।

ये भी पढ़ें...एमपी में स्मार्ट मीटर लगाने वाले उपभोक्ताओं को मिलेगा 20% छूट का फायदा

सहमति से बने संबंधों का था मामला

अधिवक्ता सुशील शर्मा ने तर्क दिया कि यह मामला सहमति से बने संबंधों का था, और अभियोजन यह साबित करने में पूरी तरह असफल रहा कि पीड़िता घटना के समय नाबालिग थी। साथ ही, मेडिकल रिपोर्ट और गवाहों की गैर-पेशी से अभियोजन का पूरा केस कमजोर हो गया।

MP हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Sunil बनाम State of Haryana (2010) मामले का हवाला देते हुए कहा कि जब अभियोजन पीड़िता की उम्र साबित नहीं कर पाया और आवश्यक चिकित्सकीय व दस्तावेजी प्रमाण उपलब्ध नहीं कराए, तो आरोपी को संदेह का लाभ देना ही न्यायसंगत होगा।

ये भी पढ़ें...अयोध्या राम मंदिर निर्माण में एमपी का ऐतिहासिक योगदान, मंदिर की नींव में लगा यहां का...

चार साल बाद रिहाई का आदेश

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस एके सिंह की डिविजनल बेंच ने निचली अदालत का फैसला पूरी तरह रद्द करते हुए कहा कि केवल डीएनए रिपोर्ट के आधार पर उम्र और सहमति की स्थिति की अनदेखी नहीं की जा सकती।

अदालत ने मनोज कुमार यादव की अपील स्वीकार कर उसे तुरंत रिहा करने का आदेश दिया। हाईकोर्ट के इस फैसले ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि न्यायालयों का दायित्व है कि वे प्रत्येक सबूत और गवाही का बारीकी से परीक्षण करें, अन्यथा एक निर्दोष व्यक्ति को सालों तक कैद की सजा भुगतनी पड़ सकती है।

thesootr links

दसूत्र की खबरें आपको कैसी लगती हैं? Google my Business पर हमें कमेंट केसाथ रिव्यू दें। कमेंट करने के लिए इसी लिंक पर क्लिक करें

अगर आपको ये खबर अच्छी लगी हो तो 👉 दूसरे ग्रुप्स, 🤝दोस्तों, परिवारजनों के साथ शेयर करें📢🔃🤝💬👩‍👦👨‍👩‍👧‍👧👩

Tags:
  • सुप्रीम कोर्ट
  • मध्यप्रदेश
  • मध्यप्रदेश हाईकोर्ट
  • जबलपुर हाईकोर्ट
  • MP
  • जस्टिस विवेक अग्रवाल
गूगल पर द सूत्र चुनें ! Add as a preferredsource on Google
छत्तीसगढ़ कांग्रेस का कलेक्ट्रेट घेराव, पुलिस से झूमाझटकी, भूपेश बघेल बोले ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें

By Arun Tiwari

छत्तीसगढ़ कांग्रेस का कलेक्ट्रेट घेराव, पुलिस से झूमाझटकी, भूपेश बघेल बोले ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें
मध्य प्रदेश में 1 अक्टूबर से राशन दुकानें बंद, राशन विक्रेता संघ ने 5 मांगों पर दी चेतावनी

By Sandeep Kumar

मध्य प्रदेश में 1 अक्टूबर से राशन दुकानें बंद, राशन विक्रेता संघ ने 5 मांगों पर दी चेतावनी
IAS आशीष टिकरिहा को जनसंपर्क संचालक का अतिरिक्त प्रभार, वेयर हाउसिंग कॉरपोरेशन के प्रबंध संचालक की जिम्मेदारी भी रहेगी

By VINAY VERMA

IAS आशीष टिकरिहा को जनसंपर्क संचालक का अतिरिक्त प्रभार, वेयर हाउसिंग कॉरपोरेशन के प्रबंध संचालक की जिम्मेदारी भी रहेगी
राजस्थान हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, तलाक के बाद पासपोर्ट पर पिता के नाम की कोई जरूरत नहीं

By Ashish Bhardwaj

राजस्थान हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, तलाक के बाद पासपोर्ट पर पिता के नाम की कोई जरूरत नहीं
पाटन चुनाव याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा निर्देश, भूपेश बघेल की आपत्ति पर पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट करेगा सुनवाई

By Arun Tiwari

पाटन चुनाव याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा निर्देश, भूपेश बघेल की आपत्ति पर पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट करेगा सुनवाई
भोपाल की सेज यूनिवर्सिटी में छात्रों का हंगामा: हॉस्टल मेस के खाने में कीड़े मिलने का आरोप, अब खाद्य विभाग करेगा जांच

By Jitendra Shrivastava

भोपाल की सेज यूनिवर्सिटी में छात्रों का हंगामा: हॉस्टल मेस के खाने में कीड़े मिलने का आरोप, अब खाद्य विभाग करेगा जांच
UPI एमडीआर पर सुप्रीम कोर्ट का रोक से इनकार: 15 अक्टूबर से दुकानदारों को देना होगा 0.4 फीसदी चार्ज

By Sanjay Dhiman

UPI एमडीआर पर सुप्रीम कोर्ट का रोक से इनकार: 15 अक्टूबर से दुकानदारों को देना होगा 0.4 फीसदी चार्ज