नौरादेही के ग्रे वुल्फ को रेडियो कॉलर नहीं पहना पा रहे वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट
Sanjay Sharma | Jul 20, 2025, 22:56 IST
wolf Photograph: (The Sootr)
मध्य प्रदेश राज्य वन अनुसंधान संस्थान (SFRI) की रिसर्च टीम एक माह से वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व में ग्रे वुल्फ को रेडिया कॉलर पहनाने भटक रही है। तमाम कोशिशों के बाद भी नौरादेही के भेड़िए वाइल्ड लाइफ वैज्ञानिकों को चकमा दे रहे हैं।
BHOPAL. मध्य प्रदेश के ग्रे वुल्फ यानी की भेड़ियों की प्रजाति की विशेषताओं पर रिसर्च कर रहे वैज्ञानिक एक माह से हैरान है। राज्य वन अनुसंधान संस्थान (SFRI) की रिसर्च टीम एक माह से वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व में ग्रे वुल्फ को रेडिया कॉलर पहनाने भटक रही है।
भेड़ियों के ललचाने के लिए जंगल में कई जगह उनका पसंदीदा मांस भी रखा जा रहा है। भेड़ियों की चालाकी के आगे वैज्ञानिकों की काेशिशें नाकाम हो रही हैं। टाइगर रिजर्व में प्रोजेक्ट वुल्फ को दो साल पहले स्वीकृति मिली थी, लेकिन अब इस पर रिसर्च आगे बढ़ पाई है।
प्रोजेक्ट वुल्फ को
मध्य प्रदेश को टाइगर स्टेट के बाद चीता और तेंदुआ स्टेट का दर्जा भी मिल चुका है। प्रदेश के वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व में पाए जाने वाले ग्रे वुल्फ भी अपनी विशेष प्रजाति के चलते दुर्लभ और खास हैं। इस वजह से वाइल्ड लाइफ वैज्ञानिकों इन पर अनुसंधान कर रहे हैं।
इसके लिए एनटीसीए यानी नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथोरिटी भी अनुमति दे चुकी है। इसी अनुमति के आधार पर जबलपुर स्थित राज्य वन एवं वन्यजीव अनुसंधान संस्थान ने भेड़ियों पर रिसर्च प्रोग्राम तैयार किया है। इसके लिए वाइल्ड लाइफ साइंटिस्टों की टीम भी बनाई गई है।
ग्रे वुल्फ के जंगल में शिकार करने के तरीके, उनके व्यवहार को समझने के लिए वैज्ञानिक उन्हें रेडियो कॉलर पहनाना चाहते हैं। इसके लिए बीते एक माह से वैज्ञानिक और वनकर्मियों की टीम जंगल में भेड़ियों के विचरण क्षेत्र चिन्हित कर पिंजरे लगा रही है। जिनमें फंसाकर ग्रे वुल्फ को रेडियो कॉलर पहनाई जाना है। लगातार कोशिशों के बाद भी अब तक वैज्ञानिक और वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट एक भी भेड़िए को फांस नहीं सके हैं।
जंगल में भटक रहे वैज्ञानिक दल की मंशा को भांप चुके ग्रे वुल्फ उनके द्वारा रखे जाने वाले मांस और मृत जीवों को फंदे और पिंजरे में फंसे बिना ही उठा ले जाते हैं। कई कोशिशों के बाद भी अब तक रेडियो कॉलर पहनाने के लिए एक भी भेड़िया पकड़ में नहीं आया है।
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देश के ज्यादातर जंगलों से ग्रे वुल्फ गायब हो चुके हैं। मध्यप्रदेश के अलावा राजस्थान और गुजरात सहित कुछ अन्य प्रदेशों में भी अब ये गिनी चुकी संख्या में बचे हैं। वन्यप्राणी गणना के मुताबिक देश में ग्रे वुल्फ की संख्या 3170 है। जिसमें से राजस्थान में 532, गुजरात में 494 और मध्यप्रदेश में 772 ग्रे वुल्फ हैं।
देश में इस प्रजाति की कुल संख्या का 20 फीसदी मध्यप्रदेश में है। इसी वजह से मध्यप्रदेश अब ग्रे वुल्फ स्टेट भी बन गया है। यहां भी नौरादेही अभ्यारण्य अपनी जैव विविधता, छोटी घास के मैदान की वजह से ग्रे वुल्फ के लिए अनुकूल आवास प्रदान करता है। ग्रे वुल्फ की सिमटती संख्या को देखते हुए एनटीसीए की अनुमति पर वन अनुसंधान संस्थान इन पर रिसर्च कर रहा है।
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टाइगर रिजर्व के डिप्टी फील्ड डायरेक्टर डॉ.एए अंसारी का कहना है कि एसएफआरआई के वैज्ञानिक नौरादेही में वुल्फ प्रोजेक्ट के तहत अध्ययन कर रहे हैं। इसमें ग्रे वुल्फ की विशेषताओं का ब्यौरा जुटाया जाएगा। इसके लिए ही भेड़ियों को रेडियो कॉलर लगाई जानी है।
भेड़िए वैसे भी शिकार के मामले में बहुत चालाक होते हैं। इसी वजह से वे लगातार पकड़ने की कोशिशों को नाकाम कर रहे हैं। जंगल में भेड़ियों को पकड़ने के लिए पिंजरे लगाए गए हैं लेकिन अभी सफलता नहीं मिली है। भेड़ियों के विचरण क्षेत्र चिन्हित कर इसका प्रयास किया जा रहा है।
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भेड़ियों के ललचाने के लिए जंगल में कई जगह उनका पसंदीदा मांस भी रखा जा रहा है। भेड़ियों की चालाकी के आगे वैज्ञानिकों की काेशिशें नाकाम हो रही हैं। टाइगर रिजर्व में प्रोजेक्ट वुल्फ को दो साल पहले स्वीकृति मिली थी, लेकिन अब इस पर रिसर्च आगे बढ़ पाई है।
प्रोजेक्ट वुल्फ को एनटीसीए की अनुमति
इसके लिए एनटीसीए यानी नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथोरिटी भी अनुमति दे चुकी है। इसी अनुमति के आधार पर जबलपुर स्थित राज्य वन एवं वन्यजीव अनुसंधान संस्थान ने भेड़ियों पर रिसर्च प्रोग्राम तैयार किया है। इसके लिए वाइल्ड लाइफ साइंटिस्टों की टीम भी बनाई गई है।
रिसर्च के लिए पहनाना है रेडियो कॉलर
जंगल में भटक रहे वैज्ञानिक दल की मंशा को भांप चुके ग्रे वुल्फ उनके द्वारा रखे जाने वाले मांस और मृत जीवों को फंदे और पिंजरे में फंसे बिना ही उठा ले जाते हैं। कई कोशिशों के बाद भी अब तक रेडियो कॉलर पहनाने के लिए एक भी भेड़िया पकड़ में नहीं आया है।
5 पॉइंट्स में समझें पूरी खबर👉ग्रे वुल्फ पर अनुसंधान: मध्य प्रदेश के वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व में वैज्ञानिक एक माह से ग्रे वुल्फ की प्रजाति पर अनुसंधान कर रहे हैं। उनका उद्देश्य इन भेड़ियों के शिकार करने के तरीके और व्यवहार को समझना है। 👉रेडियो कॉलर पहनाने की कोशिशें: वैज्ञानिक भेड़ियों को रेडियो कॉलर पहनाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि उनके विचरण क्षेत्र और शिकार करने की आदतों का अध्ययन किया जा सके। इसके लिए पिंजरे और मांस रखा गया है, लेकिन अब तक सफलता नहीं मिल पाई है क्योंकि भेड़िए बहुत चालाक होते हैं और उनके द्वारा रखे गए मांस को बिना फंसे उठा लिया जाता है। 👉वुल्फ प्रोजेक्ट की स्वीकृति: इस अनुसंधान परियोजना को नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथोरिटी (NTCA) से स्वीकृति मिली है। दो साल पहले शुरू हुआ यह प्रोजेक्ट अब अनुसंधान की दिशा में आगे बढ़ा है। 👉ग्रे वुल्फ की घटती संख्या: ग्रे वुल्फ की संख्या देशभर में घट रही है। वर्तमान में इनकी संख्या 3170 के आसपास है, जिनमें से 772 मध्य प्रदेश में पाए जाते हैं। इस वजह से मध्य प्रदेश को अब 'ग्रे वुल्फ स्टेट' का दर्जा भी प्राप्त हो गया है। 👉जंगल में भटकते वैज्ञानिक: वैज्ञानिकों की टीम जंगल में भेड़ियों के विचरण क्षेत्र की पहचान कर पिंजरे लगा रही है, लेकिन लगातार प्रयासों के बावजूद एक भी भेड़िया पकड़ में नहीं आ सका है, क्योंकि वे शिकार के मामले में बहुत चालाक होते हैं और वैज्ञानिकों की कोशिशों को नाकाम कर देते हैं। |
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अब एमपी को वुल्फ स्टेट का भी दर्जा
देश में इस प्रजाति की कुल संख्या का 20 फीसदी मध्यप्रदेश में है। इसी वजह से मध्यप्रदेश अब ग्रे वुल्फ स्टेट भी बन गया है। यहां भी नौरादेही अभ्यारण्य अपनी जैव विविधता, छोटी घास के मैदान की वजह से ग्रे वुल्फ के लिए अनुकूल आवास प्रदान करता है। ग्रे वुल्फ की सिमटती संख्या को देखते हुए एनटीसीए की अनुमति पर वन अनुसंधान संस्थान इन पर रिसर्च कर रहा है।
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भेड़िए वैसे भी शिकार के मामले में बहुत चालाक होते हैं। इसी वजह से वे लगातार पकड़ने की कोशिशों को नाकाम कर रहे हैं। जंगल में भेड़ियों को पकड़ने के लिए पिंजरे लगाए गए हैं लेकिन अभी सफलता नहीं मिली है। भेड़ियों के विचरण क्षेत्र चिन्हित कर इसका प्रयास किया जा रहा है।
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