अरावली पहाड़ियां सरकारों की लापरवाही से नहीं हो सकीं संरक्षित, कई सालों पहले ही खुल गया खनन का रास्ता
Amit Baijnath Garg | Dec 21, 2025, 13:00 IST
Photograph: (the sootr)
राजस्थान सरकार ने 2010 से पहले 100 मीटर या उससे अधिक ऊंची पहाड़ियों को अरावली हिल्स मानने की परिभाषा तय कर दी थी। इसके आधार पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला सामने आया, जो राजस्थान सहित चार राज्यों पर लागू हुआ।
Jaipur. राजस्थान की अरावली पहाड़ियां किसी भी सरकार के दृष्टिकोण में पिछले दो दशकों से कभी स्पष्ट प्राथमिकता नहीं रहीं। चाहे कांग्रेस की सरकार हो या भाजपा की, सभी ने अरावली के संरक्षण की बजाय खनन को प्राथमिकता दी। यदि समय रहते अरावली की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाए जाते, तो शायद आज यह संकट खड़ा न होता। असल में अरावली पहाड़ियां सरकारों की लापरवाही से नहीं हो सकीं संरक्षित।
अरावली फिर वैसी नहीं बन सकती, खनन से नष्ट पहाड़ पुनर्जीवित नहीं होते, हमें यह स्वीकार नहीं : राजेंद्र सिंह
राजस्थान सरकार ने 2010 से पहले 100 मीटर या उससे अधिक ऊंची पहाड़ियों को अरावली हिल्स मानने की परिभाषा तय कर दी थी। इसके आधार पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला सामने आया, जो राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा और गुजरात के लिए लागू हुआ।
यह निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसे लागू करने में राजस्थान सरकार की सिफारिश को प्रमुख आधार माना गया। अगर राजस्थान सरकार ने पहले ही अरावली संरक्षण को लेकर गंभीर दृष्टिकोण अपनाया होता, तो शायद आज यह संकट न आता।
अरावली बचाने की मुहिम में उतरे पूर्व CM अशोक गहलोत, सोशल मीडिया पर DP बदलने से चर्चा तेज
राज्य सरकार ने 2003 में अरावली क्षेत्र का नक्शा तैयार किया था, जिसमें 100 मीटर या अधिक ऊंचाई वाली भूमि को अरावली पहाड़ियां माना गया था। उस समय अरावली क्षेत्र प्रदेश के 15 जिलों में फैला था, बाद में यह 20 जिलों तक बढ़ गया। जिन जिलों में अरावली पहाड़ियां फैली थीं, उनमें जयपुर, सीकर, अलवर, उदयपुर, पाली और अन्य शामिल थे।
विश्व के पहाड़ों की पीड़ा है अरावली का संकट, देश-दुनिया के पर्वतों के लिए घातक निर्णय : जलपुरुष राजेंद्र सिंह
राज्य सरकार ने अरावली पहाड़ियों की पहचान के लिए रिचर्ड मर्फी के लैंडफॉर्म क्लासिफिकेशन (1968) को बेंचमार्क माना था। इस मानक के अनुसार, 100 मीटर से ऊंची पहाड़ियों को ही अरावली क्षेत्र माना गया। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में इस संबंध में दस्तावेज भी पेश किए गए थे, जिनमें 100 मीटर से ऊंची पहाड़ियों को अरावली मानने का दावा किया गया था।
SC की रोक के बाद भी माफिया अरावली में खनन कर रहे, सरिस्का टाइगर रिजर्व पर मंडराया खतरा
राजस्थान सरकार ने अरावली पहाड़ियों के पहचान और सीमांकन के लिए सर्वे ऑफ इंडिया से प्राप्त टोपोग्राफिकल मैप का उपयोग किया। इस मैप में कंटूर लाइनों का उपयोग किया गया था, जो पहाड़ियों की ऊंचाई और संरचना को दर्शाते थे।
रिचर्ड मर्फी के लैंडफॉर्म क्लासिफिकेशन के अनुसार, किसी क्षेत्र को अरावली पहाड़ी माना जाता था अगर उसकी ऊंचाई 325 फीट (100 मीटर) से अधिक थी। इसके साथ ही, इस क्लासिफिकेशन के तहत अन्य प्रकार की भौतिक विशेषताओं को भी ध्यान में रखा गया था, जैसे कि पठारों की ऊंचाई और तटीय क्षेत्रों का लोकल रिलीफ।
अरावली पर अपने निर्णय पर पुनर्विचार करे सुप्रीम कोर्ट, विरासत को बचाना जरूरी : मैग्सेसे पुरस्कार विजेता राजेंद्र सिंह
अरावली फिर वैसी नहीं बन सकती, खनन से नष्ट पहाड़ पुनर्जीवित नहीं होते, हमें यह स्वीकार नहीं : राजेंद्र सिंह
100 मीटर ऊंचाई की परिभाषा
यह निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसे लागू करने में राजस्थान सरकार की सिफारिश को प्रमुख आधार माना गया। अगर राजस्थान सरकार ने पहले ही अरावली संरक्षण को लेकर गंभीर दृष्टिकोण अपनाया होता, तो शायद आज यह संकट न आता।
अरावली बचाने की मुहिम में उतरे पूर्व CM अशोक गहलोत, सोशल मीडिया पर DP बदलने से चर्चा तेज
2003 तक तैयार हुए थे नक्शे
विश्व के पहाड़ों की पीड़ा है अरावली का संकट, देश-दुनिया के पर्वतों के लिए घातक निर्णय : जलपुरुष राजेंद्र सिंह
100 मीटर से ऊंची पहाड़ियों की परिभाषा
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल शपथ-पत्र फरवरी, 2010 में राजस्थान सरकार ने अरावली पहाड़ियों के संरक्षण और अवैध खनन रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट में शपथ-पत्र दाखिल किया। इस शपथ-पत्र में 100 मीटर से ऊंची अरावली पहाड़ियों में 1008 खनन पट्टों का विवरण दिया गया था। इस शपथ-पत्र के बाद अरावली क्षेत्र में खनन पर और भी विवाद खड़ा हुआ।
सर्वे ऑफ इंडिया के द्वारा किए गए नक्शे
मर्फी क्लासिफिकेशन के आधार पर पहचान
अरावली पर अपने निर्णय पर पुनर्विचार करे सुप्रीम कोर्ट, विरासत को बचाना जरूरी : मैग्सेसे पुरस्कार विजेता राजेंद्र सिंह
खास बातें
- राजस्थान सरकार ने अरावली क्षेत्र के संरक्षण के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए, जिससे आज अरावली पहाड़ियों का संरक्षण संकट में है।
- सरकार ने अरावली पहाड़ियों की पहचान के लिए 100 मीटर ऊंची पहाड़ियों को मानक माना, जिसका सुप्रीम कोर्ट ने पालन किया।
- अरावली क्षेत्र में खनन और पर्यावरणीय प्रभाव पर ध्यान देने की बजाय खनन को प्राथमिकता दी गई।
सुप्रीम कोर्ट में शपथ-पत्र दाखिल कर राजस्थान सरकार ने 1008 खनन पट्टों का विवरण दिया।
मुख्य बिंदु
- अरावली पहाड़ियों के संरक्षण में देरी हुई, क्योंकि राज्य सरकारों ने खनन पर अधिक ध्यान दिया और पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता नहीं दी।
- राजस्थान सरकार ने रिचर्ड मर्फी के लैंडफॉर्म क्लासिफिकेशन को बेंचमार्क मानते हुए 100 मीटर से ऊंची पहाड़ियों को अरावली माना, जो सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी स्वीकृत किया गया।
- अरावली के संरक्षण के लिए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में शपथ-पत्र दाखिल किया और 100 मीटर से ऊंची पहाड़ियों की पहचान की, लेकिन खनन को रोकने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए।
MP कर्मचारी प्रमोशन: 10 साल बाद पदोन्नति, अब 4 साल की छूट पर अटका मामला, राज्य कर्मचारी संघ ने सीएम मोहन यादव से की मांग
By Atul Dwivedi
एमपी भाजपा में 30 सितंबर को तीन दिग्गजों की एकसाथ आमद, 236 दिन बाद मिला प्रदेश संगठन महामंत्री
By Ramanand Tiwari
मध्य प्रदेश भाजपा में अब लक्ष्मण रेखा कौन खींचेगा? चंद्रशेखर की होगी असली परीक्षा
By Ramanand Tiwari
मध्य प्रदेश के किसानों को बड़ी राहत: मिनी ट्रैक्टर पर मिलेगी 50 प्रतिशत तक सब्सिडी, ऑनलाइन पोर्टल पर ऐसे करें आवेदन
By Jitendra Shrivastava
mp-top-news: खबरें काम की... ब्राह्मणों ने कभी शासन नहीं किया, नरोत्तम मिश्रा बोले खामोशी को कमजोरी न समझें
By Sanjay Dhiman
झाबुआ संयुक्त कलेक्टर अक्षय सिंह की नौकरी खतरे में, फर्जी जाति प्रमाणपत्र में ऐसे घिरे
By Sanjay Gupta
बस्तर में बाढ़ का जायजा लेने पहुंचे CM साय, प्रभावित परिवारों से मिले, 10 हजार रुपए अतिरिक्त सहायता की घोषणा
By Arun Tiwari