बजट का गणित: कमाई कम और कर्ज का बोझ ज्यादा, क्या उधारी के भरोसे विकसित राजस्थान का सपना होगा पूरा

Jinesh Jain | Feb 11, 2026, 19:39 IST
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Photograph: (the sootr)

राजस्थान बजट 2026-27 साफ संदेश देता है कि सरकार एक तरफ 'लोक-लुभावन' योजनाओं को जारी रखने का दबाव झेल रही है, तो दूसरी तरफ पुरानी उधारी का बोझ उसकी कमर तोड़ रहा है।

News In Short

  • सरकार के पास आने वाले हर 100 रुपए में से लगभग 47 रुपए उधारी के।
  • राजस्थान सरकार अपने दम पर जुटा पाएगी लगभग 27% आय
  • राज्य की कमाई का दूसरा बड़ा जरिया केंद्र सरकार से मिलने वाला हिस्सा।
  • राजस्थान की कुल आय का करीब एक-तिहाई हिस्सा कर्जों चुकाने में होगा खर्च।
  • बजट राशि का आधे से ज्यादा खर्च सिस्टम के भरण-पोषण पर होगा खर्च।

News In Detail

जयपुर। जब भी बजट आता है, तो आम आदमी अक्सर भारी-भरकम आंकड़ों के जाल में उलझ जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि राजस्थान सरकार के पास आने वाला 'एक रुपया' आता कहां से है और वह खर्च कहां हो जाता है? बजट 2026-27 के दस्तावेजों ने इस 'रुपए के मायाजाल' को डिकोड कर दिया है। भजनलाल सरकार का यह कुल बजट 21.52 लाख करोड़ का है। आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि राजस्थान की वित्तीय सेहत को सुधारने के लिए सरकार को 'एक हाथ से कर्ज और दूसरे हाथ से किश्त' का संतुलन साधने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है।

आमदनी का गणित: उधारी का सहारा और टैक्स का साथ

सरकार की तिजोरी भरने के लिए कई रास्ते हैं, लेकिन इस बार के बजट ने एक कड़वी सच्चाई भी सामने रखी है। अगर हम मान लें कि सरकार की कुल कमाई 100 पैसे (1 रुपया) है, तो उसका सबसे बड़ा हिस्सा टैक्स से नहीं, बल्कि उधारी से आ रहा है।

​1. कर्ज की बैसाखी (46.70%)

​सरकार के पास आने वाले हर 100 रुपए में से लगभग 47 रुपए (46.70%) आंतरिक उधारी, केंद्रीय ऋण और लोक लेखा प्राप्तियों से आते हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि राज्य के विकास और खर्चों को चलाने के लिए सरकार को अभी भी भारी कर्ज पर निर्भर रहना पड़ रहा है।

​2. केंद्र का हाथ (22.03%)

​राज्य की कमाई का दूसरा बड़ा जरिया केंद्र सरकार है। इसमें दो हिस्से हैं:
​केंद्रीय करों में हिस्सा (14.80%): यह वह पैसा है जो राज्य को संवैधानिक रूप से केंद्र से मिलता है।
​केंद्रीय अनुदान (7.23%): यह विभिन्न योजनाओं के लिए केंद्र से मिलने वाली सहायता राशि है।

3. राज्य का अपना दम (लगभग 27%)

​राज्य सरकार अपने स्तर पर जो वसूली करती है, उसमें SGST (राज्य वस्तु एवं सेवा कर) सबसे बड़ा खिलाड़ी बनकर उभरा है।
​SGST: 11.86%
​बिक्री कर (Sales Tax): 5.53%
​आबकारी (Excise): 3.44% (शराब आदि से होने वाली आय)
​वाहन कर: 1.80%
​गैर-कर राजस्व: 4.65% (खनिज, फीस आदि से आय)



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​खर्च का गणित: कहां जाता है आपका पैसा?

​पैसा कमाना जितना कठिन है, उसे सही जगह खर्च करना उससे भी बड़ी चुनौती है। राजस्थान सरकार के खर्चों की सूची यह बताती है कि बजट का एक बड़ा हिस्सा 'पुराने बोझ' को ढोने में चला जाता है।

1. सिस्टम को चलाने का खर्च (50.15%)

​बजट का सबसे बड़ा हिस्सा यानी आधे से भी ज्यादा पैसा राजस्व व्यय में खर्च होता है। इसमें सरकारी कर्मचारियों का वेतन, रिटायर्ड कर्मचारियों की पेंशन, बिजली-पानी पर दी जाने वाली सब्सिडी और तमाम जनकल्याणकारी योजनाओं का संचालन शामिल है। यह वह खर्च है जिसे टाला नहीं जा सकता।

​2. कर्ज की भारी किश्तें (33.61%)

​यह आंकड़ा चौंकाने वाला है। राज्य की कुल आय का करीब एक-तिहाई हिस्सा उन कर्जों को वापस चुकाने (मूलधन अदायगी) में जा रहा है, जो पिछले वर्षों में लिए गए थे। यानी 100 में से लगभग 34 रुपए केवल कर्ज उतारने में खर्च हो रहे हैं।

​3. विकास के लिए कितनी गुंजाइश? (8.84%)

किसी भी राज्य की तरक्की इस बात पर निर्भर करती है कि वह 'पूंजीगत व्यय' (Capital Outlay) कितना कर रहा है। यह वह पैसा है जिससे नई सड़कें, अस्पताल, स्कूल और बांध बनते हैं। राजस्थान इस मद में मात्र 8.84 पैसे खर्च कर पा रहा है। विशेषज्ञों की चिंता यही है कि जब तक यह हिस्सा नहीं बढ़ेगा, तब तक राज्य में बुनियादी ढांचे की गति धीमी रहेगी।

​4. ब्याज का बोझ (7.15%)

​कर्ज की किश्तें तो अलग हैं, उन कर्जों पर लगने वाला ब्याज चुकाने में ही सरकार के 7.15 पैसे खर्च हो जाते हैं।

​विशेषज्ञों की राय: चुनौतियां और समाधान
​बजट के इस 'इनकम और एक्सपेंडिचर' चार्ट को देखकर आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि राजस्थान एक 'ऋण जाल' (Debt Trap) जैसी स्थिति से बचने की कोशिश कर रहा है। आय का 47% कर्ज से आना और खर्च का 34% कर्ज चुकाने में जाना एक ऐसा चक्र है, जो विकास के लिए फंड कम कर देता है।

सरकार को आबकारी, खनन और अन्य गैर-कर क्षेत्रों से अपनी आय बढ़ाने की जरूरत है। साथ ही रेवेन्यू खर्च (वेतन-पेंशन-सब्सिडी) में और अधिक कुशलता लाने की आवश्यकता है, जिससे विकास कार्यों (कैपिटल आउटले) के लिए ज्यादा पैसा बच सके।



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