दतिया-बांकीपुर उपचुनाव परिणाम: बीजेपी की हार, नरोत्तम मिश्रा और प्रशांत किशोर की भूमिका
Sameer Chougaonkar | Aug 04, 2026, 15:17 IST
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दतिया और बांकीपुर उपचुनाव में भाजपा की करारी हार से संगठन में हड़कंप है। नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटना और प्रशांत किशोर की ऐतिहासिक जीत- दोनों नतीजों ने भाजपा नेतृत्व के लिए नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
दतिया-बांकीपुर उपचुनाव परिणाम: राजनीति में कहा जाता है कि अच्छा समय ज्यादा दिन नहीं टिकता और बुरा समय लंबे समय डेरा डालकर रहता है। यह तब होता है, जब राजनेता अच्छे समय में बुरे फैसले कर अपने लिए बुरे समय को आमंत्रित करते हैं। फिलहाल भाजपा पर यह बात सटीक बैठती है।
धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे को लेकर भाजपा की जो किरकिरी हुई थी, उस किरकिरी से मुक्ति के लिए भाजपा का शीर्ष नेतृत्व दतिया और बांकीपुर उपचुनाव की ओर उम्मीद से देख रहा था। लेकिन मध्यप्रदेश की दतिया और बिहार की बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के परिणाम ने भाजपा को ऐसा घाव दिया है, जो रह-रहकर हरा होता रहेगा।
![नरोत्तम मिश्रा को दतिया उपचुनाव में क्यों नहीं मिला टिकट और आरएसएस की क्या है चर्चा? - BBC News हिंदी]()
विधानसभा उपचुनाव तीन सीटों पर हुए थे - बिहार की बांकीपुर, मध्यप्रदेश की दतिया और गुजरात की मंजलपुर। गुजरात की मंजलपुर सीट पर चर्चा बेकार है, जो तय था वही हुआ। लेकिन दतिया और बांकीपुर में जो तय था, उसे पार्टी ने बदला और अपनी हार को खुद आमंत्रित किया।
दतिया में
दतिया विधानसभा उपचुनाव की बात करें तो दतिया नरोत्तम मिश्रा के प्रभाव और दबदबे वाला क्षेत्र माना जाता है। पार्टी ने उनके दबदबे को नकारा। विधानसभा चुनाव हारे नरोत्तम को हारा हुआ बताकर आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया गया।
दतिया सीट पर भाजपा संगठन की गलतियों की एक पूरी श्रृंखला रही है।
(लेखक की राय) भारी मन से नरोत्तम मिश्रा ने प्रचार किया, लेकिन उनकी आंखें उनके मन की बात दतिया के मतदाताओं को संदेश दे रही थीं। इधर रहकर भी उधर की जीत का संदेश नरोत्तम दे रहे थे।
![दतिया में बीजेपी क्यों हारी, कांग्रेस की जीत में क्या सिर्फ़ नरोत्तम मिश्रा फ़ैक्टर थे? - BBC News हिंदी]()
भाजपा को नरोत्तम की नाराजगी से होने वाले नुकसान का अंदेशा था। सरकार और संगठन ने पूरी ताकत झोंकी। मध्यप्रदेश सरकार के 12 मंत्री, दो केन्द्रीय मंत्री, 6 सांसद, 112 से ज्यादा विधायक, पूर्व विधायक और संगठन के पदाधिकारियों ने दतिया में डेरा डाला।
प्रदेश के मुखिया मोहन यादव खुद तीन दिन तक दतिया में डेरा डालकर भाजपा की जीत सुनिश्चित करने की तमाम रणनीति बनाते रहे। सब व्यर्थ गया। सरकार और संगठन पर एक नेता की नाराजगी भारी पड़ी।
नरोत्तम मिश्रा के बूथ पर भी बीजेपी 27 वोट से हारी। दतिया शहर में भाजपा 11 हजार 231 वोट से हारी। कुल मिलाकर बीजेपी दतिया सीट 6 हजार 16 वोट से हार गई।
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अब हार के बाद समीक्षा बैठक होगी, आज भोपाल में हो भी रही है।
दतिया में बड़े पैमाने पर संगठन से इस्तीफे लिए जाएंगे। कारण बताओ नोटिस जारी होगा। ठीकरा किसके सिर फोड़ना है, उसकी पटकथा लिखी जाएगी। शक नरोत्तम पर होगा।
इसके बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि भाजपा ने नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटा ही क्यों? ऐसी कौन सी मजबूरी थी कि भाजपा को हार मंजूर थी, लेकिन नरोत्तम नहीं।
प्रश्न यह भी है कि अब नरोत्तम मिश्रा क्या करेंगे? पार्टी में बने रहेंगे या अपनी अलग राह पकड़ेंगे? पार्टी भी नरोत्तम के साथ क्या करेगी? नरोत्तम को फिर दतिया में सक्रिय करेगी या किसी नए नेता के लिए जगह बनाई जाएगी? प्रश्न बहुत हैं, जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है। सारे जवाब भविष्य के गर्त में हैं।
![प्रशांत किशोर की बांकीपुर में जीत बीजेपी के लिए झटका और आरजेडी के लिए क्यों है ख़तरे की घंटी - BBC News हिंदी]()
दतिया उपचुनाव के विश्लेषण से यह साफ है कि मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार और संगठन में तालमेल का अभाव रहा। सरकार संगठन को निष्क्रिय बताएगी। संगठन सरकार के कामकाज को हार का प्रमुख कारण बताएगा। या दोनों मिलकर नरोत्तम मिश्रा पर ठीकरा फोड़ देंगे - यह आने वाला समय बताएगा।
लेकिन दतिया की हार ने कांग्रेस के अंदर उत्साह का संचार कर दिया है। प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के सिर जीत का सेहरा बंधा है। दतिया में कांग्रेस ने उम्मीदवार भी बेहतर दिया था। घनश्याम सिंह का मिलनसार स्वभाव उनकी जीत में काम आया।
भीतरघात दोनों ओर से हुई - कांग्रेस ने पूर्व विधायक राजेन्द्र भारती को पार्टी से निकाल दिया, भाजपा किस-किस को निकालती है यह देखना बाकी है।
मध्यप्रदेश में संगठन महामंत्री का न होना भी संगठन को अखरा। प्रदेश अध्यक्ष खंडेलवाल और न ही मुख्यमंत्री मोहन यादव अभी तक प्रदेश की राजनीति में कोई प्रभाव छोड़ पाए हैं।
बांकीपुर में भाजपा को क्यों मिली सबसे बड़ी हार?
बिहार की बांकीपुर सीट से भाजपा की हार, दतिया से भी बड़ी हार है। यह सीट भाजपा नेता नितिन नवीन के घर की सीट थी। यहां सबकुछ भाजपा के अनुकूल था, फिर भी भाजपा हार गई।
बांकीपुर में बीजेपी ने पहले अभिषेक कुमार को टिकट दिया, फिर अचानक बदल दिया। नीरज कुमार को लाया गया। पार्टी यह समझने में चूक गई कि सामने प्रशांत किशोर हैं। पूरी भाजपा इस बात से आश्वस्त थी कि 30 साल से भाजपा का कब्जा है और आगे भी बना रहेगा।
बांकीपुर के विधायक को राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया था। पहली बार बीजेपी का प्रदेश में मुख्यमंत्री बना, पहली बार बिहार से बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना। जातिगत समीकरण भी भाजपा का मजबूत था।
![प्रशांत किशोर की बांकीपुर में जीत बीजेपी के लिए झटका और आरजेडी के लिए क्यों है ख़तरे की घंटी - BBC News हिंदी]()
प्रशांत किशोर के लिए कुछ भी अनुकूल नहीं था। उन्होंने बिहार विधानसभा चुनाव के समय कहा था कि नेता को चुनाव अपनी कर्मभूमि या जन्मभूमि से लड़ना चाहिए। बांकीपुर प्रशांत किशोर की न कर्मभूमि रही है, न जन्मभूमि। भाजपा के नेता की ही कर्मभूमि पर प्रशांत किशोर ने चुनाव लड़ना तय किया और इतिहास रच दिया।
वे 19 हजार 324 वोट से जीते। पिछले साल जितने वोट से नितिन नवीन जीते थे, उतने वोट भी बीजेपी प्रत्याशी को इस बार नहीं मिले। बांकीपुर में राष्ट्रीय नेता को बिहार के स्थानीय नेताओं ने निपटाया, और दतिया में केन्द्रीय नेताओं को स्थानीय नेता ने निपटा दिया।
"मेरा बूथ सबसे मजबूत" का नारा लगाने वाली और बूथ अध्यक्ष से बढ़कर पन्ना प्रभारी तक कदम बढ़ाने वाली बीजेपी, अपने ही दिग्गजों के बूथ पर नहीं जीत सकी।
दतिया में नरोत्तम के बूथ पर बीजेपी हारी, तो बांकीपुर में राष्ट्रीय नेता के बूथ पर भी हारी। सांसद रविशंकर प्रसाद के बूथ पर बीजेपी हारी, मंत्री रामकृपाल यादव के बूथ पर भी हारी। बांकीपुर में बूथ प्रभारी रहा बीजेपी प्रत्याशी अपने ही बूथ पर अपनी इज्जत गंवा बैठा।
नीतीश कुमार को सीएम की कुर्सी से हटाने से नाराज कुर्मी समाज और जेडीयू कार्यकर्ताओं ने बीजेपी से हिसाब चुकता किया। संघ, संगठन और सरकार मिलकर भी अपने मतदाताओं को घर से निकाल नहीं सके। बांकीपुर में सिर्फ 34.30 फीसद मतदान हुआ।
जातिगत समीकरण धरे के धरे रह गए। जातिगत समीकरण, संघ, संगठन और डबल इंजन की सरकार को अकेले प्रशांत किशोर ने लपेटकर रख दिया। दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी एक अकेले "बांके बिहारी" के सामने असहाय नजर आई।
जन सुराज पार्टी के प्रशांत किशोर तब जीते हैं, जब आंकड़े बताते हैं कि उपचुनावों में अधिकतर वोटरों की पहली पसंद राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी ही होती है।
बीते पांच वर्षों में विभिन्न राज्यों में 153 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए। इनमें से 119 सीटों पर सत्तारूढ़ दल या गठबंधन ने जीत हासिल की, जो 78% सफलता दर दर्शाता है। विपक्षी दल केवल 34 सीटें ही जीत पाए - सफलता दर 22% रही।
मौजूदा उपचुनावों से पहले 2026 में 7 अन्य उपचुनाव हुए और सभी सीटों पर राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी जीती। 2025 में 15 सीटों में से 9 सत्तारूढ़ दल और 6 विपक्ष के खाते में गईं।
2024 में 86 सीटों में से 69 सत्तारूढ़ दल ने जीतीं, 17 विपक्ष ने। 2023 में 17 उपचुनावों में 12 सत्ताधारी दल ने और 5 विपक्ष ने जीतीं। 2022 में 28 सीटों में से 22 सत्तारूढ़ दल ने और 6 विपक्ष ने जीतीं। प्रशांत किशोर ने उपचुनाव के इस ट्रेंड को तोड़कर जीत हासिल की है।
बांकीपुर और दतिया का घाव लंबे समय तक हरा रहने वाला है। एक-दूसरे पर ठीकरा फोड़ने का खेल शुरू होगा। सरकार संगठन पर ठीकरा फोड़ेगी, संगठन सरकार को कटघरे में खड़ा करेगा। संघ अपनी रिपोर्ट में सरकार और संगठन दोनों को दोष देगा।
छोटे नेताओं के इस्तीफे होंगे और बड़े नेता राहत पाएंगे। समय सुधरने का है। सुधरेंगे तो बने रहेंगे, नहीं तो भविष्य में बांकीपुर और दतिया जैसे परिणाम देखने के लिए भाजपा का शीर्ष नेतृत्व तैयार रहे।
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दतिया-बांकीपुर हार ने भाजपा को क्यों दिया गहरा घाव?
नरोत्तम मिश्रा को दतिया उपचुनाव में क्यों नहीं मिला टिकट और आरएसएस की क्या है चर्चा? - BBC News हिंदी
तीन सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजे
दतिया में नरोत्तम मिश्रा की उपेक्षा क्यों पड़ी भारी?
टिकट कटने से लेकर हार तक की तीन गलतियां
- पहली गलती - नरोत्तम का टिकट काटा तो उन्हें भरोसे में नहीं लिया।
- दूसरी गलती - टिकट तय करते समय नरोत्तम को तवज्जो नहीं दी।
- तीसरी गलती - नरोत्तम को भविष्य की राजनीति के लिए कोई आश्वासन और भरोसा नहीं दिया गया।
(लेखक की राय) भारी मन से नरोत्तम मिश्रा ने प्रचार किया, लेकिन उनकी आंखें उनके मन की बात दतिया के मतदाताओं को संदेश दे रही थीं। इधर रहकर भी उधर की जीत का संदेश नरोत्तम दे रहे थे।
दतिया में बीजेपी क्यों हारी, कांग्रेस की जीत में क्या सिर्फ़ नरोत्तम मिश्रा फ़ैक्टर थे? - BBC News हिंदी
प्रचार में जुटे दर्जनों नेता, फिर भी हार
प्रदेश के मुखिया मोहन यादव खुद तीन दिन तक दतिया में डेरा डालकर भाजपा की जीत सुनिश्चित करने की तमाम रणनीति बनाते रहे। सब व्यर्थ गया। सरकार और संगठन पर एक नेता की नाराजगी भारी पड़ी।
नरोत्तम मिश्रा के बूथ पर भी बीजेपी 27 वोट से हारी। दतिया शहर में भाजपा 11 हजार 231 वोट से हारी। कुल मिलाकर बीजेपी दतिया सीट 6 हजार 16 वोट से हार गई।
भाजपा की उपचुनाव हार: बांकीपुर में जन सूरज की जीत, दतिया में कांग्रेस की हार - क्या भाजपा के लिए वास्तविकता का सबक है? - इंडिया टुडे
हार के बाद भाजपा संगठन में क्या होगा
इस्तीफों और नोटिस की तैयारी
अनुत्तरित सवाल: नरोत्तम का भविष्य क्या?
प्रश्न यह भी है कि अब नरोत्तम मिश्रा क्या करेंगे? पार्टी में बने रहेंगे या अपनी अलग राह पकड़ेंगे? पार्टी भी नरोत्तम के साथ क्या करेगी? नरोत्तम को फिर दतिया में सक्रिय करेगी या किसी नए नेता के लिए जगह बनाई जाएगी? प्रश्न बहुत हैं, जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है। सारे जवाब भविष्य के गर्त में हैं।
प्रशांत किशोर की बांकीपुर में जीत बीजेपी के लिए झटका और आरजेडी के लिए क्यों है ख़तरे की घंटी - BBC News हिंदी
कांग्रेस के लिए दतिया की जीत के क्या मायने?
लेकिन दतिया की हार ने कांग्रेस के अंदर उत्साह का संचार कर दिया है। प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के सिर जीत का सेहरा बंधा है। दतिया में कांग्रेस ने उम्मीदवार भी बेहतर दिया था। घनश्याम सिंह का मिलनसार स्वभाव उनकी जीत में काम आया।
भीतरघात दोनों ओर से हुई - कांग्रेस ने पूर्व विधायक राजेन्द्र भारती को पार्टी से निकाल दिया, भाजपा किस-किस को निकालती है यह देखना बाकी है।
मध्यप्रदेश में संगठन महामंत्री का न होना भी संगठन को अखरा। प्रदेश अध्यक्ष खंडेलवाल और न ही मुख्यमंत्री मोहन यादव अभी तक प्रदेश की राजनीति में कोई प्रभाव छोड़ पाए हैं।
बांकीपुर में भाजपा को क्यों मिली सबसे बड़ी हार?
बिहार की बांकीपुर सीट से भाजपा की हार, दतिया से भी बड़ी हार है। यह सीट भाजपा नेता नितिन नवीन के घर की सीट थी। यहां सबकुछ भाजपा के अनुकूल था, फिर भी भाजपा हार गई।
राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट पर उलटफेर
बांकीपुर के विधायक को राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया था। पहली बार बीजेपी का प्रदेश में मुख्यमंत्री बना, पहली बार बिहार से बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना। जातिगत समीकरण भी भाजपा का मजबूत था।
प्रशांत किशोर की बांकीपुर में जीत बीजेपी के लिए झटका और आरजेडी के लिए क्यों है ख़तरे की घंटी - BBC News हिंदी
प्रशांत किशोर ने कैसे रचा इतिहास
वे 19 हजार 324 वोट से जीते। पिछले साल जितने वोट से नितिन नवीन जीते थे, उतने वोट भी बीजेपी प्रत्याशी को इस बार नहीं मिले। बांकीपुर में राष्ट्रीय नेता को बिहार के स्थानीय नेताओं ने निपटाया, और दतिया में केन्द्रीय नेताओं को स्थानीय नेता ने निपटा दिया।
हर बूथ पर भाजपा दिग्गजों की हार
दतिया में नरोत्तम के बूथ पर बीजेपी हारी, तो बांकीपुर में राष्ट्रीय नेता के बूथ पर भी हारी। सांसद रविशंकर प्रसाद के बूथ पर बीजेपी हारी, मंत्री रामकृपाल यादव के बूथ पर भी हारी। बांकीपुर में बूथ प्रभारी रहा बीजेपी प्रत्याशी अपने ही बूथ पर अपनी इज्जत गंवा बैठा।
नीतीश कुमार को सीएम की कुर्सी से हटाने से नाराज कुर्मी समाज और जेडीयू कार्यकर्ताओं ने बीजेपी से हिसाब चुकता किया। संघ, संगठन और सरकार मिलकर भी अपने मतदाताओं को घर से निकाल नहीं सके। बांकीपुर में सिर्फ 34.30 फीसद मतदान हुआ।
जातिगत समीकरण धरे के धरे रह गए। जातिगत समीकरण, संघ, संगठन और डबल इंजन की सरकार को अकेले प्रशांत किशोर ने लपेटकर रख दिया। दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी एक अकेले "बांके बिहारी" के सामने असहाय नजर आई।
उपचुनावों का ट्रेंड: सत्तारूढ़ दल की बढ़त
बीते पांच वर्षों के आंकड़े क्या कहते हैं?
मौजूदा उपचुनावों से पहले 2026 में 7 अन्य उपचुनाव हुए और सभी सीटों पर राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी जीती। 2025 में 15 सीटों में से 9 सत्तारूढ़ दल और 6 विपक्ष के खाते में गईं।
2024 में 86 सीटों में से 69 सत्तारूढ़ दल ने जीतीं, 17 विपक्ष ने। 2023 में 17 उपचुनावों में 12 सत्ताधारी दल ने और 5 विपक्ष ने जीतीं। 2022 में 28 सीटों में से 22 सत्तारूढ़ दल ने और 6 विपक्ष ने जीतीं। प्रशांत किशोर ने उपचुनाव के इस ट्रेंड को तोड़कर जीत हासिल की है।
आगे क्या? भाजपा के लिए सुधार की चुनौती
छोटे नेताओं के इस्तीफे होंगे और बड़े नेता राहत पाएंगे। समय सुधरने का है। सुधरेंगे तो बने रहेंगे, नहीं तो भविष्य में बांकीपुर और दतिया जैसे परिणाम देखने के लिए भाजपा का शीर्ष नेतृत्व तैयार रहे।
FAQ
- दतिया उपचुनाव में भाजपा कितने वोट से हारी?
भाजपा दतिया विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी घनश्याम सिंह से 6016 वोट के अंतर से हार गई। नरोत्तम मिश्रा के अपने बूथ पर भी पार्टी 27 वोट से पीछे रही। - बांकीपुर सीट पर भाजपा को किसने हराया?
जन सुराज पार्टी के प्रशांत किशोर ने बांकीपुर सीट पर भाजपा प्रत्याशी को 19324 वोट से हराया। यह सीट भाजपा नेता नितिन नवीन के गृह क्षेत्र की मानी जाती थी। - भाजपा ने दतिया में नरोत्तम मिश्रा का टिकट क्यों काटा?
भाजपा ने पिछला विधानसभा चुनाव हारे नरोत्तम मिश्रा को हारा हुआ मानकर आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया था। इस फैसले से नरोत्तम की नाराजगी को हार का बड़ा कारण माना जा रहा है। - उपचुनावों में सत्तारूढ़ दल की जीत का ट्रेंड क्या रहा है?
बीते पांच वर्षों में 153 में से 119 उपचुनाव सीटों पर सत्तारूढ़ दल या गठबंधन जीता, यानी 78% सफलता दर। प्रशांत किशोर की जीत ने इस ट्रेंड को तोड़ा है।
संसद के मानसून सत्र में मोदी सरकार का सरप्राइज बिल कौन सा? अकेली पड़ी कांग्रेस
मोदी कैबिनेट विस्तार से लेकर नवीन की टीम तक... जल्द मचेगी सियासी हलचल!
इंडिया गठबंधन: हारे हुए नेता, बिखरा गठबंधन- विपक्ष की दर्दनाक कहानी
अभ्यन्तरम्: तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक से शुरू हुई राहुल गांधी की नई सियासत
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