यूनेस्को रिपोर्ट: दुनिया का हर छठा बच्चा स्कूल से बाहर, भारत का हाल जानें इस रिपोर्ट में

CHAKRESH | Mar 29, 2026, 13:43 IST
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unesco report 2026-27
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यूनेस्को की जीईएम रिपोर्ट 2026 के अनुसार दुनिया में 27.3 करोड़ बच्चे स्कूल से बाहर हैं। यह लगातार सातवां साल है, जब यह संख्या बढ़ी है। साल 2030 तक सबके लिए शिक्षा का लक्ष्य खतरे में है।

News In Short

  • यूनेस्को की ताजा रिपोर्ट में दुनियाभर में 27.3 करोड़ बच्चों के स्कूल से बाहर होने का खुलासा हुआ है।
  • यह लगातार सातवां साल है जब यह संख्या बढ़ी है और वैश्विक स्तर पर हर छठा बच्चा स्कूल नहीं जाता।
  • सबसे बुरा हाल उप-सहारा अफ्रीका और पश्चिम एशिया के संघर्ष प्रभावित इलाकों में है।
  • नामांकन बढ़ रहा है, लेकिन कई बच्चे देर से दाखिला लेते हैं या ग्रेड दोहराते हैं।
  • यह रिपोर्ट 2030 तक सबके लिए शिक्षा के SDG4 (Sustainable Development Goal 4) लक्ष्य पर बड़ा खतरा बताती है।

News In Detail

पेरिस स्थित यूनेस्को मुख्यालय में 25 मार्च को एक रिपोर्ट जारी हुई। इस रिपोर्ट का नाम GEM(Global Education Monitoring) रिपोर्ट 2026 है। इसमें जो आंकड़े हैं, वे दुनिया को सोचने पर मजबूर करते हैं।

दुनियाभर में 27 करोड़ तीन लाख यानी 273 मिलियन बच्चे, किशोर और युवा आज भी स्कूल से बाहर हैं। यह कोई एक साल की बात नहीं है। यह लगातार सातवां साल है, जब यह संख्या बढ़ी है।

हर छठा बच्चा स्कूल से बाहर

वैश्विक स्तर पर देखें तो दुनिया का हर छठा बच्चा स्कूल नहीं जाता। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है। यह करोड़ों बच्चों का वह सपना है जो शुरू होने से पहले ही टूट जाता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि 2015 के बाद से लगभग हर क्षेत्र में स्कूल में बच्चों को बनाए रखने की प्रगति धीमी पड़ गई है। नामांकन बढ़ रहा है, यह अच्छी बात है। लेकिन कई बच्चे स्कूल में देर से दाखिला लेते हैं या एक ही ग्रेड दोहराते रहते हैं। इससे पढ़ाई पूरी करने में देर होती है।

भारत की क्या स्थिति है? वैसे तो इस रिपोर्ट में अलग से भारत के बारे में कोई डेटा नहीं है, लेकिन शिक्षा मंत्रालय के 2024-25 के आंकड़ों के अनुसार भारत में अभी भी लगभग 11.7 लाख बच्चे स्कूल से बाहर हैं। यह वैश्विक संकट की तुलना में कम है, लेकिन चुनौती अभी खत्म नहीं हुई। प्राथमिक शिक्षा में प्रगति, लेकिन माध्यमिक में कमजोरी भारत में प्राथमिक स्कूल पूरा करने की दर 92 फीसदी है, जो काफी अच्छी है। लेकिन माध्यमिक स्तर पर यह दर 63 से 64 फीसदी के बीच है। यानी हर तीन में से एक बच्चा माध्यमिक से आगे नहीं जा पाता। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में आर्थिक दबाव सबसे बड़ा कारण है। बच्चों को खेती या घरेलू काम के लिए स्कूल छोड़ना पड़ता है। प्रथम संस्था के TaRL मॉडल को यूनेस्को ने सराहा भारतीय NGO (Non-Governmental Organization) प्रथम द्वारा विकसित TaRL (Teaching at the Right Level) यानी सही स्तर पर पढ़ाना को यूनेस्को ने खासतौर पर सराहा है। यह तरीका बच्चों को उम्र की बजाय सीखने के स्तर के हिसाब से पढ़ाता है। इसे कई राज्य सरकारों के साथ मिलकर लागू किया जा रहा है। मिड डे मील और स्वास्थ्य कार्यक्रमों का भी असर साल 2001 के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद शुरू हुए मिड डे मील (Mid Day Meal) कार्यक्रम से पहली कक्षा में नामांकन में 13 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। देशव्यापी कृमिनाशक कार्यक्रम के तहत 24 करोड़ बच्चों को लाभ दिया जा रहा है। RTE एक्ट की सीमाएं RTE (Right to Education) एक्ट 2009 ने निजी स्कूलों में पिछड़े वर्गों के बच्चों के लिए 25 फीसदी सीटें आरक्षित कीं। लेकिन विश्लेषण बताते हैं कि इससे स्कूलों में भेदभाव खत्म नहीं हुआ।

संघर्ष वाले इलाकों का दर्द

सबसे ज्यादा असर उप-सहारा अफ्रीका और पश्चिम एशिया के उन इलाकों में दिख रहा है जहां जंग और अशांति है। इन संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले हर छह में से एक से ज्यादा बच्चे शिक्षा से वंचित हैं। रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के हर छह में से एक बच्चा संघर्ष प्रभावित इलाकों जैसे पश्चिम एशिया में रहता है। इससे स्कूल से बाहर रहने वाले बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

नामांकन बढ़ा, पर काफी नहीं

इसी बीच एक अच्छी खबर भी है। प्राथमिक शिक्षा पूरी करने की दर साल 2000 में 77 फीसदी थी, जो बढ़कर अब 88 फीसदी हो गई है। ऊपरी माध्यमिक में यह दर 37 फीसदी से बढ़कर 61 फीसदी हुई है।

साल 2024 तक दुनियाभर में 1.4 अरब छात्र स्कूलों में नॉमिनेटेड हैं, लेकिन यह काफी नहीं है। जिस रफ्तार से शिक्षा का विस्तार होना चाहिए था, वह नहीं हुआ। इसीलिए 2030 के लक्ष्य पर खतरा मंडरा (Education Crisis) रहा है।

कुछ देशों ने दिखाई उम्मीद की किरण

रिपोर्ट में कुछ देशों की तारीफ भी की गई है। मेडागास्कर और टोगो ने बच्चों के लिए, मोरक्को और वियतनाम ने किशोरों के लिए, तथा तुर्की और जॉर्जिया ने युवाओं के लिए स्कूल से बाहर रहने की दर में 80 फीसदी तक की कमी की है। यह इस बात का सबूत है कि सही नीति और इच्छाशक्ति हो तो बदलाव संभव है।

2030 का लक्ष्य और असली चुनौती

यूनेस्को (unesco) की यह रिपोर्ट काउंटडाउन टू 2030 शृंखला की पहली कड़ी है। इसमें 35 देशों के केस स्टडी के जरिए शिक्षा तक पहुंच में असमानताओं का विश्लेषण किया गया है।

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट (United Nations) के सतत विकास लक्ष्य यानी एसडीजी 4 को 2030 तक हासिल करने के लिए शिक्षा नीतियों की पुनर्समीक्षा की जरूरत बताई गई है। गरीबी, भौगोलिक स्थिति और संघर्ष से पैदा होने वाली असमानताओं को दूर करने पर जोर दिया गया है।

सरकारें अब पिछड़े क्षेत्रों को विशेष सहायता दे रही हैं और तकनीक, परिवहन, ऊर्जा और स्वास्थ्य में निवेश के जरिए शिक्षा तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश हो रही है।

FAQ

  1. यूनेस्को की जीईएम रिपोर्ट 2026 क्या है और इसमें क्या बताया गया है?
    जीईएम यानी ग्लोबल एजुकेशन मॉनिटरिंग रिपोर्ट यूनेस्को हर साल जारी करती है। 2026 की रिपोर्ट 25 मार्च को पेरिस में जारी की गई। इसमें बताया गया है कि दुनिया में 27.3 करोड़ बच्चे, किशोर और युवा स्कूल से बाहर हैं। यह लगातार सातवां साल है जब यह संख्या बढ़ी है। यह रिपोर्ट 2030 के शिक्षा लक्ष्य पर गंभीर खतरे की चेतावनी देती है।
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