350 संविदा कर्मचारियों की 13 याचिकाएं खारिज
10-20 साल नौकरी के बाद भी नियमितीकरण नहीं, हाईकोर्ट ने 350 संविदा कर्मचारियों की 13 याचिकाएं की खारिज
Neel Tiwari | Nov 02, 2026, 20:52 IST
संविदा कर्मचारियों को हाईकोर्ट से झटका, नियमित नौकरी की उम्मीद टूटी
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से करीब 350 संविदा कर्मचारियों को बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने नियमितीकरण की मांग से जुड़ी 13 याचिकाएं खारिज कर दी हैं। इनमें मनरेगा और मध्य प्रदेश पुलिस आवास एवं बुनियादी ढांचा विकास निगम के कर्मचारी शामिल थे। ये कर्मचारी उप इंजीनियर के पदों पर कार्यरत हैं।
कर्मचारियों ने सीधी भर्ती से पहले नियमितीकरण पर विचार करने की मांग की थी। उनका तर्क था कि वे 10 से 20 साल तक सेवाएं दे चुके हैं। इसके बावजूद उन्हें नियमित नौकरी का अवसर नहीं मिल रहा है। चीफ जस्टिस अल्पेश वाई. कोगजे और जस्टिस विवेक जैन की डिवीजन बेंच ने सुनवाई की। अदालत ने कर्मचारियों की दलीलें स्वीकार नहीं कीं।
विवाद की शुरुआत 27 जुलाई 2022 के भर्ती विज्ञापन से हुई थी। यह विज्ञापन मध्य प्रदेश कर्मचारी चयन बोर्ड ने जारी किया था। इसके तहत विभिन्न इंजीनियरिंग विभागों और सार्वजनिक उपक्रमों में नियमित भर्ती शुरू हुई थी। भर्ती ग्रुप-3 के उप इंजीनियर, ड्राफ्ट्समैन, टाइम कीपर और समकक्ष पदों के लिए थी।
संविदा कर्मचारियों ने इस प्रक्रिया पर आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि सीधी भर्ती से नियमितीकरण की संभावनाएं समाप्त हो जाएंगी। इसी आधार पर देवेंद्र कुमार उपाध्याय सहित अन्य कर्मचारियों ने हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर कीं। बाद में 12 अन्य याचिकाएं भी इस मामले से जोड़ दी गईं।
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मनरेगा और
इन 13 याचिकाओं में दो अलग-अलग संस्थाओं के कर्मचारी शामिल थे। रिट याचिका क्रमांक 18038/2022, 18153/2022 और 18156/2022 पुलिस हाउसिंग कॉर्पोरेशन के कर्मचारियों ने दायर की थीं। ये कर्मचारी मध्य प्रदेश पुलिस आवास एवं बुनियादी ढांचा विकास निगम में कार्यरत थे। अन्य याचिकाकर्ता मनरेगा से जुड़े थे।
कर्मचारियों के मुताबिक, उनकी नियुक्तियां विज्ञापन और चयन प्रक्रिया के माध्यम से हुई थीं। इसलिए उन्हें पिछले दरवाजे से नियुक्त कर्मचारी नहीं माना जा सकता। उन्होंने लंबे अनुभव और सेवा अवधि के आधार पर नियमित नियुक्ति का अवसर मांगा।
याचिकाकर्ताओं के वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के उमा देवी फैसले का हवाला दिया। उन्होंने इस फैसले के पैरा 53 का उल्लेख किया। इसमें 10 साल या अधिक सेवा वाले कर्मचारियों के नियमितीकरण पर विचार करने का निर्देश था। उनके मुताबिक, कर्मचारियों को पूरे करियर में कम से कम एक बार अवसर मिलना चाहिए।
कर्मचारियों ने बताया कि उनकी उम्र अब 35 से 55 साल के बीच है। ऐसे में नए कॉलेज पास युवाओं से लिखित परीक्षा में प्रतिस्पर्धा करना उचित नहीं है। उनके पास वर्षों का मैदानी अनुभव है। सरकार को इस अनुभव का महत्व समझना चाहिए।
कर्मचारियों ने 5 जून 2018 की संविदा कर्मचारी नीति का भी हवाला दिया। उनके मुताबिक, नीति में संविदा पदों को चरणबद्ध तरीके से नियमित बनाने का निर्णय था। शुरुआती प्रावधानों में बेहतर सेवा शर्तें और नियमित पदों पर अवसर देने की बात थी। याचिकाकर्ताओं ने सरकार की सीधी भर्ती प्रक्रिया को अपनी ही नीति के विपरीत बताया। उन्होंने पहले संविदा कर्मचारियों के नियमितीकरण पर विचार करने की मांग की। इसके बाद बचने वाले पदों पर सीधी भर्ती करने का अनुरोध किया।
राज्य सरकार ने कर्मचारियों की दलीलों का विरोध किया। सरकार के मुताबिक, याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति स्वीकृत संविदा पदों पर हुई थी। उनके नियुक्ति आदेशों में संविदा कर्मचारी होने की शर्त स्पष्ट थी। इनमें नियमितीकरण का दावा नहीं करने की शर्त भी शामिल थी।
पुलिस हाउसिंग कॉर्पोरेशन में संविदा और नियमित कर्मचारियों के पद अलग-अलग हैं। वहीं, मनरेगा केंद्र सरकार से वित्तपोषित परियोजना है। इसमें नियमित उप इंजीनियर के पद स्वीकृत नहीं हैं। इसलिए कर्मचारी दूसरे विभागों के नियमित पदों पर सीधे नियमितीकरण का दावा नहीं कर सकते।
विवाद का दूसरा आधार 1 फरवरी 2020 की संशोधन अधिसूचना थी। इसके जरिए 1999 के भर्ती नियमों में नियम 11(8) जोड़ा गया था। इसमें नियमित भर्ती की 20 प्रतिशत रिक्तियां संविदा कर्मचारियों के लिए आरक्षित की गई थीं। इसका लाभ कम से कम पांच साल की संविदा सेवा पूरी करने वालों को मिलना था।
नियमों में संविदा सेवा अवधि के बराबर ऊपरी आयु सीमा में छूट भी थी। हालांकि, छूट के बाद अधिकतम आयु 55 वर्ष निर्धारित थी। कर्मचारियों ने 20 प्रतिशत आरक्षण को अपर्याप्त बताया। उनका कहना था कि पहले सभी संविदा कर्मचारियों के नियमितीकरण पर विचार होना चाहिए।
हाईकोर्ट ने कर्मचारियों की दलीलों पर विचार करते हुए 2018 की नीति का उल्लेख किया। अदालत के मुताबिक, याचिकाकर्ता केवल कुछ प्रावधानों का हवाला दे रहे थे। वे इसी नीति के खंड 1.4 और 1.11 को नजरअंदाज कर रहे थे।
इनमें नियमित भर्ती के दौरान संविदा कर्मचारियों को 20 प्रतिशत आरक्षण देने की व्यवस्था थी। संविदा सेवा के आधार पर आयु सीमा में छूट का प्रावधान भी था। कोर्ट ने 2020 के संशोधन को इसी नीति के अनुरूप माना। इसलिए संशोधन को नीति के खिलाफ या असंवैधानिक नहीं माना जा सकता।
कर्मचारियों ने सुप्रीम कोर्ट के जग्गो बनाम भारत संघ (2024) फैसले का भी हवाला दिया। उनका तर्क था कि लंबे समय तक सेवाएं देने वालों को नियमितीकरण से वंचित नहीं रखना चाहिए। हालांकि, हाईकोर्ट ने जग्गो मामले की परिस्थितियां अलग बताईं। उस मामले में कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त कर दी गई थीं। वर्तमान याचिकाकर्ताओं की संविदा सेवाओं पर भर्ती प्रक्रिया का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ रहा था।अदालत ने उमा देवी फैसले का भी उल्लेख किया। कोर्ट के मुताबिक, लंबी सेवा से नियमित नियुक्ति का निहित अधिकार नहीं मिलता। संविदा कर्मचारी इस आधार पर नियमित भर्ती प्रक्रिया रोकने की मांग नहीं कर सकते।
याचिकाकर्ताओं ने 9 अगस्त 2016 के एक अन्य फैसले का हवाला दिया। यह फैसला नगर निगम बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले में आया था। इसमें नियमित भर्ती से पहले दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों पर विचार करने का निर्देश था। हालांकि, हाईकोर्ट ने वर्तमान मामले की परिस्थितियां अलग मानीं।
पुराने मामले में कर्मचारी उसी संस्था में कार्यरत थे, जहां नियमित भर्ती हो रही थी। यहां संविदा कर्मचारियों के पद और विज्ञापित नियमित पद अलग-अलग हैं। इसलिए पुराने फैसले का लाभ मौजूदा याचिकाकर्ताओं को नहीं मिल सकता।
हाईकोर्ट ने सरकार की बाद की नीति का भी उल्लेख किया। सरकार ने 22 जुलाई 2023 को नया आदेश जारी किया था। इसके जरिए नियमित भर्ती में संविदा कर्मचारियों का आरक्षण 50 प्रतिशत कर दिया गया। पहले यह सीमा 20 प्रतिशत थी।
कोर्ट को 2026 की भर्ती प्रक्रिया की जानकारी भी दी गई। उप इंजीनियर, ड्राफ्ट्समैन और समकक्ष पदों के विज्ञापन में 50 प्रतिशत कोटा रखा गया था। इसके तहत संविदा कर्मचारी अपने वर्ग के अन्य उम्मीदवारों से प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं। उन्हें सेवा अवधि के आधार पर आयु सीमा में छूट भी मिलती है। अदालत ने इसे अनुभवी कर्मचारियों और नए उम्मीदवारों के बीच संतुलन बनाने वाली नीति माना।
डिवीजन बेंच ने नियमित पदों पर भर्ती का तरीका तय करना सरकार का अधिकार माना। अदालत के मुताबिक, सरकार ने संविदा कर्मचारियों के लिए अलग कोटा निर्धारित किया है। साथ ही, नए उम्मीदवारों के लिए भी अवसर बनाए रखे हैं। कोर्ट को इस व्यवस्था में कोई मनमानी या असंतुलन नहीं मिला। अदालत ने संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन भी नहीं पाया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविदा कर्मचारी निर्धारित कोटे के तहत भर्ती में शामिल हो सकते हैं। वे आयु सीमा की शर्तों के अधीन खुले वर्ग में भी आवेदन कर सकते हैं।
2022 की भर्ती प्रक्रिया को दी थी चुनौती
संविदा कर्मचारियों ने इस प्रक्रिया पर आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि सीधी भर्ती से नियमितीकरण की संभावनाएं समाप्त हो जाएंगी। इसी आधार पर देवेंद्र कुमार उपाध्याय सहित अन्य कर्मचारियों ने हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर कीं। बाद में 12 अन्य याचिकाएं भी इस मामले से जोड़ दी गईं।
मनरेगा और पुलिस हाउसिंग कॉर्पोरेशन के कर्मचारी थे याचिकाकर्ता
कर्मचारियों के मुताबिक, उनकी नियुक्तियां विज्ञापन और चयन प्रक्रिया के माध्यम से हुई थीं। इसलिए उन्हें पिछले दरवाजे से नियुक्त कर्मचारी नहीं माना जा सकता। उन्होंने लंबे अनुभव और सेवा अवधि के आधार पर नियमित नियुक्ति का अवसर मांगा।
10 साल की नौकरी के बाद नियमितीकरण का अधिकार
कर्मचारियों ने बताया कि उनकी उम्र अब 35 से 55 साल के बीच है। ऐसे में नए कॉलेज पास युवाओं से लिखित परीक्षा में प्रतिस्पर्धा करना उचित नहीं है। उनके पास वर्षों का मैदानी अनुभव है। सरकार को इस अनुभव का महत्व समझना चाहिए।
2018 की सरकारी नीति को बनाया था आधार
सरकार ने कहा- संविदा और नियमित पद अलग-अलग
पुलिस हाउसिंग कॉर्पोरेशन में संविदा और नियमित कर्मचारियों के पद अलग-अलग हैं। वहीं, मनरेगा केंद्र सरकार से वित्तपोषित परियोजना है। इसमें नियमित उप इंजीनियर के पद स्वीकृत नहीं हैं। इसलिए कर्मचारी दूसरे विभागों के नियमित पदों पर सीधे नियमितीकरण का दावा नहीं कर सकते।
20% आरक्षण के प्रावधान से भी संतुष्ट नहीं थे कर्मचारी
नियमों में संविदा सेवा अवधि के बराबर ऊपरी आयु सीमा में छूट भी थी। हालांकि, छूट के बाद अधिकतम आयु 55 वर्ष निर्धारित थी। कर्मचारियों ने 20 प्रतिशत आरक्षण को अपर्याप्त बताया। उनका कहना था कि पहले सभी संविदा कर्मचारियों के नियमितीकरण पर विचार होना चाहिए।
हाईकोर्ट ने कहा- 2018 की पूरी नीति पढ़ना जरूरी
इनमें नियमित भर्ती के दौरान संविदा कर्मचारियों को 20 प्रतिशत आरक्षण देने की व्यवस्था थी। संविदा सेवा के आधार पर आयु सीमा में छूट का प्रावधान भी था। कोर्ट ने 2020 के संशोधन को इसी नीति के अनुरूप माना। इसलिए संशोधन को नीति के खिलाफ या असंवैधानिक नहीं माना जा सकता।
उमा देवी और जग्गो के फैसलों से भी नहीं मिली राहत
नगर निगम के पुराने फैसले को भी नहीं माना आधार
पुराने मामले में कर्मचारी उसी संस्था में कार्यरत थे, जहां नियमित भर्ती हो रही थी। यहां संविदा कर्मचारियों के पद और विज्ञापित नियमित पद अलग-अलग हैं। इसलिए पुराने फैसले का लाभ मौजूदा याचिकाकर्ताओं को नहीं मिल सकता।
संविदा कर्मचारियों का कोटा 20 से बढ़कर 50% हुआ
कोर्ट को 2026 की भर्ती प्रक्रिया की जानकारी भी दी गई। उप इंजीनियर, ड्राफ्ट्समैन और समकक्ष पदों के विज्ञापन में 50 प्रतिशत कोटा रखा गया था। इसके तहत संविदा कर्मचारी अपने वर्ग के अन्य उम्मीदवारों से प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं। उन्हें सेवा अवधि के आधार पर आयु सीमा में छूट भी मिलती है। अदालत ने इसे अनुभवी कर्मचारियों और नए उम्मीदवारों के बीच संतुलन बनाने वाली नीति माना।
हाईकोर्ट बोला- नियमितीकरण का कोई निहित अधिकार नहीं
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