आठ साल से प्रमोशन पर ब्रेक, भर्तियों की रफ्तार सुस्त, सरकारी दफ्तरों में आउटसोर्स ही सहारा
Ramanand Tiwari | Jan 05, 2026, 21:46 IST
promotion break recruitment
एमपी में सरकारी कामकाज आउटसोर्स कर्मचारियों के भरोसे चल रहा है। लिपिकीय स्टाफ की कमी और धीमी भर्ती प्रक्रिया के कारण निजी एजेंसियों से कर्मी नियुक्त हो रहे हैं।
BHOPAL. मध्य प्रदेश में सरकारी कामकाज अब तेजी से आउटसोर्स कर्मचारियों के भरोसे चलता नजर आ रहा है। बिजली कंपनियों से लेकर अस्पताल, मेडिकल कॉलेज, स्कूल-छात्रावास और नगरीय निकाय लगभग हर विभाग में यही स्थिति है। स्थायी भर्तियों की धीमी गति और वर्षों से प्रमोशन पर लगे प्रतिबंध ने विभागों की परेशानी बढ़ा दी है।
सरकारी दफ्तरों में लिपिकीय स्टाफ की भारी कमी सबसे गंभीर समस्या बन चुकी है। राज्य स्तर से लेकर ब्लॉक कार्यालयों तक जरूरी पद खाली पड़े हैं। इन रिक्तियों को भरने के बजाय विभाग निजी एजेंसियों से आउटसोर्स कर्मी नियुक्त कर रहे हैं।
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कर्मचारी चयन मंडल (ESB) ने कई विभागों को पत्र लिखकर पूछा कि कौन-कौन से कैडर में कितने पद खाली हैं। मकसद था रिक्त पदों पर भर्ती परीक्षा कराना। लेकिन अधिकांश विभागों से अब तक भर्ती प्रस्ताव ही नहीं पहुंचे।
कर्मचारी संगठनों के अनुसार, प्रदेश में क्लास तृतीय और चतुर्थ की नियमित भर्तियां पिछले 15-20 वर्षों से लगभग ठप हैं। वर्तमान में करीब 10 लाख आउटसोर्स कर्मचारी सरकारी विभागों में संविदा पर काम कर रहे हैं।
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स्कूल शिक्षा विभाग से लेकर जिला और विकासखंड कार्यालयों तक आउटसोर्स कर्मी तैनात हैं। यही स्थिति लोक निर्माण, जल संसाधन, स्वास्थ्य, उच्च शिक्षा, ऊर्जा और महिला-बाल विकास विभागों में भी है।
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मध्यप्रदेश लिपिक वर्गीय शासकीय कर्मचारी संघ के प्रांताध्यक्ष एम पी द्विवेदी ने कहा कि हर विभाग में क्लेरिकल स्टाफ के पद खाली हैं। कर्मचारी चयन मंडल ने रिक्त पदों की जानकारी मांगी थी, जो अब तक नहीं भेजी गई। उन्होंने सरकार से कार्रवाई करने की मांग की। उनका आरोप है कि सीधी भर्तियों की बजाय आउटसोर्स से कर्मी नियुक्त करना व्यवस्था को कमजोर कर रहा है। दिलचस्प है कि महत्वपूर्ण फाइलें और रिकॉर्ड आउटसोर्स कर्मियों के पास हैं। स्वीकृत पद संरचना के अनुसार, नियमित भर्तियां होनी चाहिए थीं।
एक तरफ लगातार रिटायरमेंट हो रहे हैं, दूसरी ओर प्रमोशन प्रक्रिया ठप है। इस दोहरी मार से नीचे से लेकर ऊपर तक पद खाली हो रहे हैं। इसका सीधा असर प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर पड़ रहा है। मप्र राज्य कर्मचारी संघ के अध्यक्ष हेमंत श्रीवास्तव के मुताबिक, विभाग भर्तियों को लेकर गंभीर नहीं हैं।
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सहायक ग्रेड-3: 30,000 पद खाली, सहायक ग्रेड-2: 26,000, सहायक ग्रेड-1: 16,000, वरिष्ठ लेखा परीक्षक: 6,000, कनिष्ठ लेखा परीक्षक: 4,500, सहायक अधीक्षक: 7,000, अधीक्षक: 5,000,कनिष्ठ लेखा अधिकारी: 14,000 इनमें से अधिकांश पद प्रमोशन से भरे जाने थे, लेकिन प्रक्रिया पर रोक लगी है।
अब तक आउटसोर्स कर्मी विभागीय पदों के विरुद्ध काम कर रहे थे। नई व्यवस्था में उनकी सेवाएं निजी कंपनियों के जरिए ली जाएंगी। यानी वेतन,पीएफ,छुट्टी अन्य सुविधाएंसब कुछ कंपनी तय करेगी, विभाग नहीं।
आउटसोर्स कर्मचारी लंबे समय से नियमित किए जाने की मांग कर रहे थे। लेकिन अब उन्हें पूरी तरह निजी कंपनियों के अधीन किया जा रहा है। इससे सबसे ज्यादा नाराजगी इसी वर्ग में है। मध्य प्रदेश में सरकारी व्यवस्था आउटसोर्स मॉडल पर टिकी दिख रही है। जब तक प्रमोशन, सीधी भर्तियां और कैडर मैनेजमेंट पर ठोस फैसला नहीं होता, तब तक प्रशासनिक दबाव और बेरोजगारी बढ़ते रहेंगे।
लिपिकीय संवर्ग की सबसे बड़ी मार
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चयन मंडल ने मांगी जानकारी
कर्मचारी संगठनों के अनुसार, प्रदेश में क्लास तृतीय और चतुर्थ की नियमित भर्तियां पिछले 15-20 वर्षों से लगभग ठप हैं। वर्तमान में करीब 10 लाख आउटसोर्स कर्मचारी सरकारी विभागों में संविदा पर काम कर रहे हैं।
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शिक्षा से लेकर सचिवालय तक वही तस्वीर
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स्थायी पदों पर आउटसोर्स गलत व्यवस्था
रिटायरमेंट बढ़ा, सिस्टम और दबाव में
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आंकड़े चौंकाने वाले हैं
अब पूरी तरह कंपनियों के अधीन होंगे आउटसोर्स
नियमितीकरण की उम्मीद पर पानी
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