सीएम राइस से सांदीपनी तक! मंत्री के जिले में बना स्कूल, बाकी प्रदेश इंतजार में
Ramanand Tiwari | Mar 13, 2026, 23:51 IST
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मध्य प्रदेश के सीएम राइस स्कूल परियोजना में 6 साल बाद भी अधिकांश स्कूल अधूरे हैं। टेंडर, जमीन और मॉनिटरिंग में गड़बड़ियों के कारण सरकार को करोड़ों का नुकसान हो सकता है।
BHOPAL. मध्यप्रदेश में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के बड़े दावे करने वाला CM Rise स्कूल प्रोजेक्ट छह साल बाद भी अधूरा है। 2021 में शुरू हुई योजना के तहत पहले चरण में 275 स्कूल दो साल में बनने थे। लेकिन अब तक 60–70 स्कूल ही पूरे हो सके हैं।
दिलचस्प यह है कि सबसे पहले स्कूल तत्कालीन स्कूली शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार के के विधानसभा क्षेत्र गुलाना (शाजापुर) में बनकर तैयार हुआ। बाकी जिलों में आज भी जमीन, टेंडर और निर्माण की उलझनों में परियोजना फंसी है।
देरी के कारण सरकार को करोड़ों रुपए का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ेगा, जबकि शिवराज सिंह चौहान का ड्रीम प्रोजेक्ट अब मोहन सरकार के दौर में भी अफसरशाही की सुस्ती का शिकार बनता दिख रहा है।
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यहां पहले बना
सीएम राइस स्कूलों का उद्देश्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों को आधुनिक सुविधाओं से लैस करना था। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि प्रदेश में पहला पूरा हुआ स्कूल 2024 में मंत्री इंदर सिंह परमार के क्षेत्र गुलाना (शाजापुर) में तैयार हुआ। जबकि बाकी जिलों में उस समय तक जमीन तलाशने और टेंडर की प्रक्रिया ही पूरी नहीं हो पाई थी। इससे परियोजना की प्राथमिकताओं और मॉनिटरिंग पर सवाल उठने लगे हैं।
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CM Rise स्कूल योजना पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का ड्रीम प्रोजेक्ट मानी जाती थी। बाद में मोहन यादव सरकार ने इसका नाम बदलकर सांदीपनी स्कूल कर दिया। लेकिन नाम बदलने के बाद भी प्रोजेक्ट की रफ्तार नहीं बदली। कई जगह निर्माण अटका है और कई जिलों में अब तक जमीन ही तय नहीं हो सकी।
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योजना के पहले चरण में 275 स्कूल बनाए जाने थे।
परियोजना की सुस्ती का एक उदाहरण मुरैना जिले के सुरजनपुर में भी देखने को मिला। यह भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा का गृह क्षेत्र है। यहां CM Rise स्कूल के लिए जमीन तय करने में ही करीब चार साल लग गए।
पहले जिस जमीन को चुना गया वह अस्पताल के लिए आरक्षित थी, मामला कोर्ट पहुंच गया। बाद में प्रशासन ने दूसरी जमीन लेकर नई प्रशासकीय स्वीकृति दी। इसके बाद ही निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ पाई।
स्कूल शिक्षा विभाग अब 7 से 8 स्कूलों की तकनीकी स्वीकृति निरस्त करने की तैयारी में है, जहां जमीन तय नहीं हो सकी। इस फैसले से सरकार को करोड़ों रुपए का नुकसान हो सकता है। पहले जिन ठेकेदारों ने कम दरों पर टेंडर लिए थे, अब उन्हें नई दरों पर काम करना पड़ेगा।
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इन कारणों से कई स्कूलों का निर्माण अब तक शुरू ही नहीं हो पाया।
CM Rise स्कूलों के कई टेंडर 2020–21 की SOR दरों पर जारी किए गए थे। छह साल बीतने के बाद अब मटेरियल और निर्माण लागत बढ़ चुकी है। कई ठेकेदार विभाग को लिखकर दे चुके हैं कि नई प्रशासकीय स्वीकृति और संशोधित दरों के बिना काम संभव नहीं है। इससे सरकार को अतिरिक्त वित्तीय बोझ उठाना पड़ेगा।
जिन स्कूलों का निर्माण पूरा हुआ है, वहां भी कई बार निर्माण गुणवत्ता को लेकर सवाल उठ चुके हैं। जबलपुर, ग्वालियर-चंबल और अन्य संभागों में बने कुछ स्कूलों की गुणवत्ता सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर चर्चा में रही है।
अब बड़ा सवाल है कि जब कई जगह जमीन तय नहीं थी, तो टेंडर क्यों जारी किए गए? निर्माण एजेंसियों ने जगह स्पष्ट किए बिना काम की प्रक्रिया क्यों शुरू की? छह साल की देरी से करोड़ों रुपए के नुकसान का जिम्मेदार कौन है? सरकार की योजना का उद्देश्य ग्रामीण और शहरी बच्चों को बेहतर शिक्षा देना था। लेकिन स्कूल निर्माण में देरी के कारण कई क्षेत्रों के बच्चे अभी भी इस सुविधा से वंचित हैं।
स्कूल शिक्षा विभाग के असिस्टेंट डायरेक्टर रविंद्र कुमार का कहना है कि स्कूलों के निर्माण की सतत मॉनिटरिंग की जा रही है। उनके मुताबिक कुछ स्कूलों को छोड़कर बाकी का निर्माण तेजी से कराया जा रहा है। जिन स्कूलों के लिए जमीन नहीं मिली है, उन पर सरकार जल्द निर्णय लेगी।
दिलचस्प यह है कि सबसे पहले स्कूल तत्कालीन स्कूली शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार के के विधानसभा क्षेत्र गुलाना (शाजापुर) में बनकर तैयार हुआ। बाकी जिलों में आज भी जमीन, टेंडर और निर्माण की उलझनों में परियोजना फंसी है।
देरी के कारण सरकार को करोड़ों रुपए का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ेगा, जबकि शिवराज सिंह चौहान का ड्रीम प्रोजेक्ट अब मोहन सरकार के दौर में भी अफसरशाही की सुस्ती का शिकार बनता दिख रहा है।
मिशन कर्मयोगी को रफ्तार देने बनी कमेटी, सीएस अध्यक्ष, जीएडी सचिव की मार्गदर्शक भूमिका
यहां पहले बना सीएम राइस स्कूल
मदन महल थाना पर फर्जी NDPS केस के आरोप, सुप्रीम कोर्ट ने खुशी कौर को दी जमानत
मोहन सरकार में भी सुस्ती
सीएम राइस स्कूल की बस सुविधा पर कांग्रेस ने उठाए सवाल, दिग्गी ने सीएम से की ये अपील
275 में से सिर्फ 60-70 स्कूल ही पूरे
- योजना का कॉन्सेप्ट: 2021
- निर्माण शुरू: 2022
- तय समयसीमा: 2 साल
इलाके में भी 4 साल तक जमीन नहीं
पहले जिस जमीन को चुना गया वह अस्पताल के लिए आरक्षित थी, मामला कोर्ट पहुंच गया। बाद में प्रशासन ने दूसरी जमीन लेकर नई प्रशासकीय स्वीकृति दी। इसके बाद ही निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ पाई।
स्कूल शिक्षा विभाग अब 7 से 8 स्कूलों की तकनीकी स्वीकृति निरस्त करने की तैयारी में है, जहां जमीन तय नहीं हो सकी। इस फैसले से सरकार को करोड़ों रुपए का नुकसान हो सकता है। पहले जिन ठेकेदारों ने कम दरों पर टेंडर लिए थे, अब उन्हें नई दरों पर काम करना पड़ेगा।
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कहीं फसल खड़ी, कहीं राेड नहीं
इंदरगढ़: पुरानी बिल्डिंग नहीं टूट पाई, ठेकेदार काम छोड़कर चला गया
कैलारस (मुरैना): दी गई जमीन दो हिस्सों में, एप्रोच रोड भी नहीं
सिरोंज और बरईपुरा (विदिशा): जमीन को लेकर विवाद
देवास और इंदौर क्षेत्र: गांव वालों ने निर्माण पर स्टे ले लिया
कसरावद (खरगोन): आर्किटेक्ट ने पथरीली जमीन को रिजेक्ट कर दिया
इन कारणों से कई स्कूलों का निर्माण अब तक शुरू ही नहीं हो पाया।
पुराने टेंडर, नई दरें… सरकार पर बढ़ेगा खर्च
निर्माण गुणवत्ता पर भी उठ चुके हैं सवाल
जिम्मेदार कौन?
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