क्या है 81 हजार करोड़ का ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट, जहां राहुल गांधी के जाने से खड़ा हो गया विवाद
CHAKRESH | May 01, 2026, 18:05 IST
Photograph: (the sootr)
ग्रेट निकोबार द्वीप पर ₹81,000 करोड़ का मेगा प्रोजेक्ट विवादों में है। सरकार इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास बताती है, जबकि वैज्ञानिक, आदिवासी समुदाय और पर्यावरणविद् जंगल, जैव विविधता और आदिवासी अधिकारों पर खतरे की चेतावनी दे रहे हैं।
चक्रेश महोबिया. अप्रैल की धूप में जब ज्यादातर नेता पांच राज्यों के चुनावों में उलझे थे, राहुल गांधी हिंद महासागर के उस छोर पर जा पहुंचे जहां भारत का नक्शा लगभग खत्म हो जाता है। सफेद रेत, घने वर्षावन और नीला समंदर… 29 अप्रेल को पहली बार हिंदी पट्टी में नाम सुना गया- Great Nicobar Island Project. यही कोई 81,000 करोड़ रुपए के मेगा प्रोजेक्ट पर चर्चा तेज हो गई।
पहले राहुल गांधी का ट्वीट देखिए
राहुल ने लिखा- ये पेड़ हमारी यादों से भी पुराने हैं।
सवाल ये है कि क्या ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट सच में भारत का भविष्य है या एक अनमोल जंगल की कीमत पर खड़ा होता सपना?
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दरअसल अंडमान- निकोबार द्वीप समूह के सबसे दक्षिणी छोर पर स्थित ग्रेट निकोबार द्वीप इन दिनों भारत के सबसे विवादास्पद विकास प्रोजेक्ट्स में से एक बन चुका है। केंद्र सरकार यहां लगभग ₹81,000 करोड़ की लागत से अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह, ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा, नई टाउनशिप और बिजलीघर विकसित करने जा रही है।
इधर प्रोजेक्ट का विरोध करने वालों का तर्क है कि यह मामला सिर्फ पर्यावरण की क्षति तक सीमित नहीं है। यह लोकतांत्रिक जवाबदेही, वैज्ञानिक स्वायत्तता और आदिवासी अधिकारों के भविष्य से भी जुड़ा है। हालांकि केंद्र सरकार इन हमलों को भ्रामक बताते हुए प्रोजेक्ट को राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास का इंजन कह रही है। आइए thesootr Prime में इसे विस्तार से समझते हैं…
ग्रेट निकोबार द्वीप पर लगभग ₹81,000 करोड़ की मेगा परियोजना में अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा, नई टाउनशिप और ऊर्जा संयंत्र (गैस/सौर) शामिल हैं। वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और पूर्व नौकरशाहों ने 27 अक्टूबर 2025 को पर्यावरण मंत्री को खुला पत्र लिखकर परियोजना पर रोक और स्वतंत्र समीक्षा की मांग की थी।
सरकार का दावा है कि अंडमान-निकोबार की कुल वन भूमि का केवल 1.82% हिस्सा प्रभावित होगा, जबकि विशेषज्ञों के अनुसार असल नुकसान ग्रेट निकोबार द्वीप के अपने कुल वन क्षेत्र के करीब 15% के बराबर है। शोम्पेन और ग्रेट निकोबारी आदिवासी समुदायों की भूमि को बिना सार्थक और सहमति के परियोजना क्षेत्र में शामिल किए जाने के आरोप हैं। कई सार्वजनिक सुनवाइयों में उनकी आपत्तियों को रिकॉर्ड से हटाने की शिकायतें सामने आईं हैं।
भारतीय प्राणी सर्वेक्षण, भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण और वन्यजीव संस्थान जैसी सरकारी वैज्ञानिक संस्थाओं की रिपोर्टों को सार्वजनिक पोर्टल पर अपलोड न किए जाने और वैज्ञानिकों पर दबाव के आरोप इस विवाद को और गंभीर बनाते हैं। निकोबार ट्राइबल काउंसिल के नेताओं ने आरोप लगाया है कि उनसे सामुदायिक भूमि समर्पित कराने के लिए दबाव डाला जा रहा है, जबकि परिषद ने 2022 में दी गई प्रारंभिक सहमति औपचारिक रूप से वापस ले ली थी।
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ग्रेट निकोबार, भारत के सबसे दूरस्थ और पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत समृद्ध इलाकों में गिना जाता है। यह द्वीप यूनेस्को के ‘मैन एंड बायोस्फीयर प्रोग्राम’ का हिस्सा है। यह सुंडा जैव विविधता हॉटस्पॉट के अंतर्गत आता है। यहां के पुराने वर्षावन और समुद्री जैव विविधता दोनों ही अत्यंत संवेदनशील मानी जाती हैं।
इस द्वीप की रणनीतिक स्थिति- मलक्का जलडमरूमध्य के बेहद करीब होने को देखते हुए भारत सरकार ने इसे हिंद महासागर में अपनी समुद्री और आर्थिक उपस्थिति मजबूत करने के बड़े हथियार के रूप में देखा है। यही सोच होलिस्टिक डेवलपमेंट या समग्र विकास योजना के रूप में सामने आई है।
परियोजना के लिए 130.75 वर्ग किलोमीटर वन भूमि का डायवर्जन प्रस्तावित है। इसका मतलब है कि ग्रेट निकोबार के पुराने वर्षावन के लाखों पेड़ काटे जाएंगे। साथ ही बड़े पैमाने पर भूमि स्वरूप बदल जाएगा। शुरू से ही पर्यावरणविदों और आदिवासी संगठनों ने इसे जैव विविधता, आपदाओं के जोखिम (सुनामी, भूकंप) और स्थानीय समुदायों पर खतरा बताया है।
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सरकार ने इस मेगा प्रोजेक्ट का औपचारिक नाम Great Nicobar Island Development Project रखा है। दस्तावेजों में इसे कई जगह Great Nicobar Island (GNI) Project या Great Nicobar Island Project भी लिखा जा रहा है।
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पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने सितंबर 2025 में एक लेख के माध्यम से दावा किया था कि परियोजना ने कई स्तरों पर पर्यावरणीय और कानूनी जांचें पास की हैं। इससे अंडमान-निकोबार की कुल वन भूमि का मात्र 1.82% हिस्सा प्रभावित होगा।
दूसरी ओर विशेषज्ञों ने इस दावे को “गणितीय रूप से सही, लेकिन वैज्ञानिक रूप से भ्रामक” बताया है। उनका तर्क यह है कि अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह दो अलग-अलग जैव विविधता हॉटस्पॉट में आते हैं। अंडमान, इंडो-बर्मा हॉटस्पॉट में और निकोबार, सुंडा हॉटस्पॉट में। इसलिए दोनों के वन क्षेत्र को जोड़कर प्रतिशत निकालना वैज्ञानिक दृष्टि से गलत है। वास्तव में 130.75 वर्ग किलोमीटर वन भूमि का डायवर्जन ग्रेट निकोबार द्वीप के अपने वन क्षेत्र का लगभग 15% है, जो एक छोटे लेकिन अत्यंत समृद्ध द्वीप के लिए विनाशकारी स्तर का नुकसान है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि यह क्षेत्र भारत के आखिरी बचे पुराने वर्षा वनों में से एक है, जहां लगभग दस लाख के आसपास पुराने पेड़ और उनसे जुड़े जटिल पारिस्थितिक तंत्र मौजूद हैं। इन्हें काटने के बाद समान गुणवत्ता और संरचना वाला वन वापस पाना व्यावहारिक रूप से असंभव है, चाहे कितने भी वृक्षारोपण कार्यक्रम चलाए जाएं।
कांग्रेस की पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी भी इस पूरे मामले पर असहमति जता चुकी हैं। उनका कहना है कि जब शोम्पेन और निकोबारी जनजातियों का अस्तित्व दांव पर हो, तो चुप नहीं रहा जा सकता। उन्होंने कहा कि इस अनोखे पारिस्थितिकी तंत्र की इतने बड़े पैमाने पर बर्बादी को हमारी आने वाली पीढ़ियों के प्रति जिम्मेदारी की भावना स्वीकार नहीं कर सकती। उन्होंने इसे न्याय और राष्ट्रीय मूल्यों के साथ धोखा बताया और इसके खिलाफ आवाज उठाने की अपील की।
ग्रेट निकोबार पर कुल मिलाकर लगभग 8,000 लोग रहते हैं। जिनमें शोम्पेन जनजाति (एक अत्यंत संवेदनशील आदिवासी समुदाय) और ग्रेट निकोबारी जनजाति के अलावा अन्य बसे हुए निवासी शामिल हैं। विशेषज्ञों और आदिवासी संगठनों का आरोप है कि परियोजना के लिए भूमि डायवर्जन और पुनर्वास की प्रक्रिया में वन अधिकार अधिनियम और ‘अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह (आदिम जनजाति संरक्षण) विनियम, 1956’ के प्रावधानों की अनदेखी की गई है।
आरोप है कि 2022 में परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष से जल्दबाजी में एक ‘नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ (NOC) पर हस्ताक्षर करवाए गए, लेकिन बाद में परिषद ने लिखित पत्र के माध्यम से अपनी सहमति वापस ले ली। 2026 में कई आदिवासी नेताओं ने सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया कि उनसे “सरेन्डर सर्टिफिकेट” पर हस्ताक्षर कराकर सामुदायिक भूमि छोड़ने का दबाव बनाया जा रहा है, जबकि किसी सामूहिक बैठक या लोकतांत्रिक प्रक्रिया में ऐसी सहमति पारित नहीं हुई।
सरकार का पक्ष- पर्यावरण मंत्री और केंद्र सरकार का कहना है कि यह परियोजना रणनीतिक और राष्ट्रीय महत्व की है। यह भारत की समुद्री शक्ति और आर्थिक उपस्थिति को हिंद महासागर क्षेत्र में निर्णायक रूप से बढ़ाएगी। पोर्ट्स, शिपिंग और जलमार्ग मंत्रालय ने 2025 में संसद में बताया कि गलथेया बे का कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट आधिकारिक रूप से मेजर पोर्ट के रूप में नोटिफाई किया जा चुका है। इसे चरणबद्ध तरीके से 2030 के आसपास तक विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है।
विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों का पक्ष- रामचंद्र गुहा, रोमुलस व्हिटेकर और असद रहमानी जैसे वरिष्ठ विशेषज्ञों ने खुले पत्र में कहा कि एक मुख्यतः व्यावसायिक को राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर ढाल बनाकर आलोचना से बचाना बेईमानी है। वे मांग कर रहे हैं कि परियोजना के लिए लगभग ₹2,220 करोड़ की लागत से तैयार वन्यजीव प्रबंधन और शमन योजनाओं को पूर्ण रूप से सार्वजनिक किया जाए और उन पर स्वतंत्र वैज्ञानिक समीक्षा (peer review) कराई जाए, ताकि जोखिम और विकल्पों पर खुली बहस हो सके।
शोम्पेन और निकोबारी समुदायों के लिए ‘विकास’ का अर्थ अक्सर अपनी जमीन, जंगल, समुद्र और पारंपरिक आजीविका की सुरक्षा से जुड़ा होता है, न कि मेगा बंदरगाह और टाउनशिप की ऊंची इमारतों से। आदिवासी नेताओं का कहना है कि उनकी सांस्कृतिक पहचान, भोजन, मछली पकड़ने के क्षेत्र और धार्मिक स्थलों पर इस परियोजना का सीधा प्रभाव पड़ेगा, पर नीति-निर्माताओं ने इन पहलुओं को गंभीरता से नहीं सुना
130.75 वर्ग किमी वन भूमि के डायवर्जन से स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर तत्काल और कई मायनों में अपरिवर्तनीय असर पड़ेगा। जिसमें मिट्टी का कटाव, जल स्रोतों का बदलना और वन्यजीवों के बसेरे का टूटना शामिल है।
परियोजना क्षेत्र से जुड़े आदिवासी और स्थानीय समुदायों को विस्थापन, मुआवजे की अनिश्चितता और पारंपरिक आजीविका (मछली पकड़ना, जंगल से संसाधन जुटाना) के नुकसान का खतरा झेलना पड़ेगा।
वैज्ञानिक संस्थाओं और पर्यावरणीय अनुमोदन तंत्र पर भरोसा कम होने से सरकारी संस्थाओं की साख पर सवाल उठ रहे हैं, खासकर तब जब रिपोर्टें सार्वजनिक न हों या उन पर दबाव के आरोप लगें।
भारत के आखिरी पुराने वर्षावनों में से एक का स्थायी विनाश, जिससे जुड़ी प्रजातियों और पारिस्थितिक प्रक्रियाओं को बाद में वापस लाना व्यावहारिक रूप से नामुमकिन होगा। तटीय और समुद्री जैव विविधता, जैसे कोरल रीफ, समुद्री कछुए और मछलियों की प्रजातियों पर शिपिंग, ड्रेजिंग और औद्योगिक गतिविधियों का बड़ा असर पड़ सकता है। जिससे मछुआरों की आजीविका और स्थानीय खाद्य सुरक्षा कमजोर हो सकती है।
यदि यह मॉडल सफल माना गया, तो यह मिसाल बन सकता है कि अन्य संवेदनशील द्वीपों, तटीय क्षेत्रों और संरक्षित वनों में भी इसी तरह के ‘मेगा प्रोजेक्ट’ को आगे बढ़ाया जाए, जिससे पूरे देश की पर्यावरणीय नीति की दिशा बदल सकती है।
यदि आप भारतीय करदाता हैं, तो लगभग ₹81,000 करोड़ की यह परियोजना अंततः सार्वजनिक संसाधनों और आपके टैक्स के पैसे से ही बन रही है। अल्पकालिक GDP और रोजगार के आंकड़ों से परे, पर्यावरणीय क्षति, आपदा जोखिम (सुनामी, भूकंप, समुद्री स्तर वृद्धि) और स्वास्थ्य संबंधी दीर्घकालिक लागतें पूरे देश के लिए भारी पड़ सकती हैं- चाहे वह बीमा, पुनर्वास, या जलवायु अनुकूलन योजनाओं के रूप में हो।
अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट को मेजर पोर्ट घोषित किया जा चुका है। केंद्र सरकार इसके लिए संयुक्त उद्यम मॉडल पर आगे बढ़ रही है। शुरुआती चरणों के लिए लगभग ₹48,000–₹49,000 करोड़ निवेश का अनुमान सामने आया है।
ट्राइबल काउंसिल और स्थानीय आदिवासी नेताओं ने 2026 की शुरुआत में भी अपने विरोध को दोहराया है। यह कहते हुए कि बिना उनकी वास्तविक सहमति के जमीन सरेन्डर कराना कानून की भावना के खिलाफ है।
पर्यावरणीय मंजूरियां रद्द या निलंबित नहीं हुई हैं। परियोजना औपचारिक रूप से आगे बढ़ती दिख रही है। हालांकि भूमि समर्पण, पुनर्वास और पारदर्शिता के सवालों पर विवाद लगातार गहराता जा रहा है।
प्रश्न 1: ग्रेट निकोबार आइलैंड प्रोजेक्ट क्या है और इसमें क्या-क्या बनेगा?
उत्तर: ग्रेट निकोबार आइलैंड प्रोजेक्ट केंद्र सरकार की एक विशाल बुनियादी ढांचा योजना है जिसकी अनुमानित लागत लगभग ₹81,000 करोड़ है। इसके तहत अंडमान निकोबार द्वीपसमूह के सबसे दक्षिणी द्वीप, ग्रेट निकोबार पर चार बड़ी परियोजनाएं बननी हैं। पहली, गलथेया बे पर एक अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट जिसे पहले ही मेजर पोर्ट घोषित किया जा चुका है। दूसरी, एक ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा जो नागरिक और सैन्य दोनों उद्देश्यों के लिए होगा। तीसरी, एक नियोजित टाउनशिप। चौथी, गैस या सौर ऊर्जा पर चलने वाला बिजलीघर। सरकार इसे मलक्का जलडमरूमध्य के करीब होने के कारण एक रणनीतिक और आर्थिक जरूरत बताती है।
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पहले राहुल गांधी का ट्वीट देखिए
I travelled through Great Nicobar today.
These are the most extraordinary forests I have ever seen in my life. Trees older than memory. Forests that took generations to grow.
The people on this island are equally beautiful - both the adivasi communities and the settlers - but… pic.twitter.com/vYdBWdYfIJ
— Rahul Gandhi (@RahulGandhi) April 29, 2026
राहुल ने लिखा- ये पेड़ हमारी यादों से भी पुराने हैं।
सवाल ये है कि क्या ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट सच में भारत का भविष्य है या एक अनमोल जंगल की कीमत पर खड़ा होता सपना?
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दरअसल अंडमान- निकोबार द्वीप समूह के सबसे दक्षिणी छोर पर स्थित ग्रेट निकोबार द्वीप इन दिनों भारत के सबसे विवादास्पद विकास प्रोजेक्ट्स में से एक बन चुका है। केंद्र सरकार यहां लगभग ₹81,000 करोड़ की लागत से अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह, ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा, नई टाउनशिप और बिजलीघर विकसित करने जा रही है।
इधर प्रोजेक्ट का विरोध करने वालों का तर्क है कि यह मामला सिर्फ पर्यावरण की क्षति तक सीमित नहीं है। यह लोकतांत्रिक जवाबदेही, वैज्ञानिक स्वायत्तता और आदिवासी अधिकारों के भविष्य से भी जुड़ा है। हालांकि केंद्र सरकार इन हमलों को भ्रामक बताते हुए प्रोजेक्ट को राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास का इंजन कह रही है। आइए thesootr Prime में इसे विस्तार से समझते हैं…
Great Nicobar Island Project पर एक नजर
सरकार का दावा है कि अंडमान-निकोबार की कुल वन भूमि का केवल 1.82% हिस्सा प्रभावित होगा, जबकि विशेषज्ञों के अनुसार असल नुकसान ग्रेट निकोबार द्वीप के अपने कुल वन क्षेत्र के करीब 15% के बराबर है। शोम्पेन और ग्रेट निकोबारी आदिवासी समुदायों की भूमि को बिना सार्थक और सहमति के परियोजना क्षेत्र में शामिल किए जाने के आरोप हैं। कई सार्वजनिक सुनवाइयों में उनकी आपत्तियों को रिकॉर्ड से हटाने की शिकायतें सामने आईं हैं।
भारतीय प्राणी सर्वेक्षण, भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण और वन्यजीव संस्थान जैसी सरकारी वैज्ञानिक संस्थाओं की रिपोर्टों को सार्वजनिक पोर्टल पर अपलोड न किए जाने और वैज्ञानिकों पर दबाव के आरोप इस विवाद को और गंभीर बनाते हैं। निकोबार ट्राइबल काउंसिल के नेताओं ने आरोप लगाया है कि उनसे सामुदायिक भूमि समर्पित कराने के लिए दबाव डाला जा रहा है, जबकि परिषद ने 2022 में दी गई प्रारंभिक सहमति औपचारिक रूप से वापस ले ली थी।
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एक संवेदनशील द्वीप पर समग्र विकास
इस द्वीप की रणनीतिक स्थिति- मलक्का जलडमरूमध्य के बेहद करीब होने को देखते हुए भारत सरकार ने इसे हिंद महासागर में अपनी समुद्री और आर्थिक उपस्थिति मजबूत करने के बड़े हथियार के रूप में देखा है। यही सोच होलिस्टिक डेवलपमेंट या समग्र विकास योजना के रूप में सामने आई है।
परियोजना के लिए 130.75 वर्ग किलोमीटर वन भूमि का डायवर्जन प्रस्तावित है। इसका मतलब है कि ग्रेट निकोबार के पुराने वर्षावन के लाखों पेड़ काटे जाएंगे। साथ ही बड़े पैमाने पर भूमि स्वरूप बदल जाएगा। शुरू से ही पर्यावरणविदों और आदिवासी संगठनों ने इसे जैव विविधता, आपदाओं के जोखिम (सुनामी, भूकंप) और स्थानीय समुदायों पर खतरा बताया है।
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सरकार की क्या तैयारी है
फिलहाल सरकार चार बड़े काम कर रही है-
- अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट (Galathea Bay पर), जिसे बड़े वैश्विक हब के रूप में विकसित करने की योजना है।
- एक ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा जो नागरिक और सामरिक दोनों तरह की उड़ानों के लिए इस्तेमाल किया जा सके।
- एक नियोजित टाउनशिप, जिसमें आवासीय, वाणिज्यिक और प्रशासनिक बुनियादी ढांचे का निर्माण होना है।
- गैस या सौर ऊर्जा आधारित बिजलीघर जो इस पूरे कॉम्प्लेक्स को बिजली उपलब्ध कराएगा।
तो फिर वैज्ञानिक क्यों हैं विरोध में?
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पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने सितंबर 2025 में एक लेख के माध्यम से दावा किया था कि परियोजना ने कई स्तरों पर पर्यावरणीय और कानूनी जांचें पास की हैं। इससे अंडमान-निकोबार की कुल वन भूमि का मात्र 1.82% हिस्सा प्रभावित होगा।
दूसरी ओर विशेषज्ञों ने इस दावे को “गणितीय रूप से सही, लेकिन वैज्ञानिक रूप से भ्रामक” बताया है। उनका तर्क यह है कि अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह दो अलग-अलग जैव विविधता हॉटस्पॉट में आते हैं। अंडमान, इंडो-बर्मा हॉटस्पॉट में और निकोबार, सुंडा हॉटस्पॉट में। इसलिए दोनों के वन क्षेत्र को जोड़कर प्रतिशत निकालना वैज्ञानिक दृष्टि से गलत है। वास्तव में 130.75 वर्ग किलोमीटर वन भूमि का डायवर्जन ग्रेट निकोबार द्वीप के अपने वन क्षेत्र का लगभग 15% है, जो एक छोटे लेकिन अत्यंत समृद्ध द्वीप के लिए विनाशकारी स्तर का नुकसान है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि यह क्षेत्र भारत के आखिरी बचे पुराने वर्षा वनों में से एक है, जहां लगभग दस लाख के आसपास पुराने पेड़ और उनसे जुड़े जटिल पारिस्थितिक तंत्र मौजूद हैं। इन्हें काटने के बाद समान गुणवत्ता और संरचना वाला वन वापस पाना व्यावहारिक रूप से असंभव है, चाहे कितने भी वृक्षारोपण कार्यक्रम चलाए जाएं।
सोनिया गांधी भी जता चुकी विरोध
कौन प्रभावित होगा: शोम्पेन, ग्रेट निकोबारी और स्थानीय निवासी
आरोप है कि 2022 में परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष से जल्दबाजी में एक ‘नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ (NOC) पर हस्ताक्षर करवाए गए, लेकिन बाद में परिषद ने लिखित पत्र के माध्यम से अपनी सहमति वापस ले ली। 2026 में कई आदिवासी नेताओं ने सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया कि उनसे “सरेन्डर सर्टिफिकेट” पर हस्ताक्षर कराकर सामुदायिक भूमि छोड़ने का दबाव बनाया जा रहा है, जबकि किसी सामूहिक बैठक या लोकतांत्रिक प्रक्रिया में ऐसी सहमति पारित नहीं हुई।
सरकार बनाम विशेषज्ञ
विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों का पक्ष- रामचंद्र गुहा, रोमुलस व्हिटेकर और असद रहमानी जैसे वरिष्ठ विशेषज्ञों ने खुले पत्र में कहा कि एक मुख्यतः व्यावसायिक को राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर ढाल बनाकर आलोचना से बचाना बेईमानी है। वे मांग कर रहे हैं कि परियोजना के लिए लगभग ₹2,220 करोड़ की लागत से तैयार वन्यजीव प्रबंधन और शमन योजनाओं को पूर्ण रूप से सार्वजनिक किया जाए और उन पर स्वतंत्र वैज्ञानिक समीक्षा (peer review) कराई जाए, ताकि जोखिम और विकल्पों पर खुली बहस हो सके।
आदिवासी समुदाय क्या सोचते हैं?
प्रोजेक्ट का आज और आने वाले कल पर असर
परियोजना क्षेत्र से जुड़े आदिवासी और स्थानीय समुदायों को विस्थापन, मुआवजे की अनिश्चितता और पारंपरिक आजीविका (मछली पकड़ना, जंगल से संसाधन जुटाना) के नुकसान का खतरा झेलना पड़ेगा।
वैज्ञानिक संस्थाओं और पर्यावरणीय अनुमोदन तंत्र पर भरोसा कम होने से सरकारी संस्थाओं की साख पर सवाल उठ रहे हैं, खासकर तब जब रिपोर्टें सार्वजनिक न हों या उन पर दबाव के आरोप लगें।
दीर्घकालिक प्रभाव
यदि यह मॉडल सफल माना गया, तो यह मिसाल बन सकता है कि अन्य संवेदनशील द्वीपों, तटीय क्षेत्रों और संरक्षित वनों में भी इसी तरह के ‘मेगा प्रोजेक्ट’ को आगे बढ़ाया जाए, जिससे पूरे देश की पर्यावरणीय नीति की दिशा बदल सकती है।
आपके जीवन पर असर
1 मई 2026 तक क्या अपडेट है?
ट्राइबल काउंसिल और स्थानीय आदिवासी नेताओं ने 2026 की शुरुआत में भी अपने विरोध को दोहराया है। यह कहते हुए कि बिना उनकी वास्तविक सहमति के जमीन सरेन्डर कराना कानून की भावना के खिलाफ है।
पर्यावरणीय मंजूरियां रद्द या निलंबित नहीं हुई हैं। परियोजना औपचारिक रूप से आगे बढ़ती दिख रही है। हालांकि भूमि समर्पण, पुनर्वास और पारदर्शिता के सवालों पर विवाद लगातार गहराता जा रहा है।
FAQ
उत्तर: ग्रेट निकोबार आइलैंड प्रोजेक्ट केंद्र सरकार की एक विशाल बुनियादी ढांचा योजना है जिसकी अनुमानित लागत लगभग ₹81,000 करोड़ है। इसके तहत अंडमान निकोबार द्वीपसमूह के सबसे दक्षिणी द्वीप, ग्रेट निकोबार पर चार बड़ी परियोजनाएं बननी हैं। पहली, गलथेया बे पर एक अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट जिसे पहले ही मेजर पोर्ट घोषित किया जा चुका है। दूसरी, एक ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा जो नागरिक और सैन्य दोनों उद्देश्यों के लिए होगा। तीसरी, एक नियोजित टाउनशिप। चौथी, गैस या सौर ऊर्जा पर चलने वाला बिजलीघर। सरकार इसे मलक्का जलडमरूमध्य के करीब होने के कारण एक रणनीतिक और आर्थिक जरूरत बताती है।
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