क्या उज्जैन से तय हो सकता है दुनिया का समय? जानें धर्मेंद्र प्रधान के दावे का सच और GMT का इतिहास
CHAKRESH | Apr 07, 2026, 14:37 IST
greenwich
केंद्रीय शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने हाल ही में कहा कि दुनिया का वैश्विक मानक समय उज्जैन को केंद्र मानकर तय होना चाहिए। सवाल बड़ा और दिलचस्प है, लेकिन क्या सच में उज्जैन दुनिया के समय का केंद्र रहा है? अगर हां, तो ग्रीनविच यह ताज कैसे पहन बैठा? पढ़िए thesootr prime में ये रोचक लेख…
समय का असली स्वामी कौन- ग्रीनविच या उज्जैन का महाकाल?
यह सब जानते हैं कि धरती पर एक ही वक्त में कहीं सुबह हो रही होती है तो कहीं रात, कहीं दोपहर तो कहीं शाम… फिर पूरी दुनिया का टाइम तय कैसे होता है? दरअसल, यह सब एक अदृश्य रेखा तय करती है। यह रेखा लंदन के पास एक छोटे से शहर ग्रीनविच (Greenwich) से गुजरती है।
इसे प्राइम मेरिडियन (Prime Meridian) यानी शून्य देशांतर रेखा कहते हैं। पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव तक खिंची यह काल्पनिक रेखा वो आधार है, जिससे दुनिया के सारे टाइम जोन (Time Zone) यानी समय क्षेत्र नापे जाते हैं।
भारत का समय इससे साढ़े पांच घंटे आगे है। इसीलिए इसे IST (Indian Standard Time) यानी भारतीय मानक समय कहते हैं। लेकिन यह रेखा ग्रीनविच से ही क्यों गुजरती है? इसकी कहानी विज्ञान से ज्यादा ताकत और राजनीति की है।
ग्रीनविच की कहानी शुरू करने से पहले एक हजार साल पीछे चलते हैं। सूर्य सिद्धांत नामक चौथी सदी के खगोलशास्त्र ग्रंथ में उज्जैन को शून्य देशांतर यानी प्राइम मेरिडियन बताया गया है। इस ग्रंथ के अनुसार उज्जैन कर्क रेखा (Tropic Of Cancer) और शून्य देशांतर के ठीक मिलन बिंदु पर स्थित है।
उज्जैन को प्राचीन भारतीय ग्रंथों में नाभिदेश यानी पृथ्वी की नाभि या केंद्र कहा गया है। वराह पुराण में लिखा है: "नाभिदेशे महाकालस्तन्नाम्ना तत्र वै हरः" अर्थात् नाभिस्थान पर महाकाल रूपी शिव विराजते हैं। यहां के प्रधान देवता महाकाल हैं।
महाकाल यानी समय के महान स्वामी। यह महज धार्मिक मान्यता नहीं थी। आर्यभट्ट ने अपनी किताब आर्यभट्टीय में 1500 साल पहले ही टाइम जोन के कॉसेप्ट को स्पष्ट किया था। बाद में वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त और भास्कराचार्य जैसे दिग्गज उज्जैन में रहकर खगोलशास्त्र को आगे बढ़ाते रहे।
नौवीं सदी के बगदाद के महान गणितज्ञ अल-ख्वारिज्मी ने अपनी खगोल तालिकाओं में उज्जैन को ही प्राइम मेरिडियन माना। वे बगदाद को भी आधार बना सकते थे, लेकिन उन्होंने भारतीय खगोलशास्त्र की परंपरा का सम्मान करते हुए उज्जैन को चुना। ग्रीक भूगोलवेत्ता टॉलमी ने भी अपने मानचित्रों में उज्जैन को "ओजेन" के नाम से दर्ज किया और इसके शून्य देशांतर को मान्यता दी।
18वीं और 19वीं सदी में एक अजीब समस्या पैदा हो गई। हर शहर का अपना अलग समय था। लंदन का अलग, पेरिस का अलग, बर्लिन का अलग। सिर्फ अमेरिका में 300 से ज्यादा अलग-अलग स्थानीय समय चलते थे।
जब रेलगाड़ी आई तो यह अराजकता जानलेवा हो गई। एक ट्रेन के आने-जाने का समय तय करना असंभव-सा था, क्योंकि अगले स्टेशन का समय ही अलग था। समुद्री जहाज तो और भी मुश्किल में थे।
नाविक अपनी स्थिति देशांतर से नापते थे। ब्रिटिश नाविक ग्रीनविच के समय पर चलने वाली घड़ी साथ रखते थे, ताकि समुद्र में अपनी सटीक स्थिति जान सकें। धीरे-धीरे यह दुनिया भर में फैलता गया।
अक्टूबर 1884 की बात है। अमेरिकी राष्ट्रपति चेस्टर आर्थर के बुलावे पर 25 देशों के 41 प्रतिनिधि वाशिंगटन डीसी में जमा हुए। मकसद था दुनिया के लिए एक सा समय और एक सा शून्य देशांतर तय करना। बहस जोरदार थी। फ्रांस चाहता था कि प्राइम मेरिडियन किसी तटस्थ जगह से गुजरे, जो किसी बड़े महाद्वीप को न काटे। लेकिन यह प्रस्ताव 21 के मुकाबले सिर्फ 3 मतों से पास हुआ।
उस वक्त दुनिया के 65 फीसदी जहाज पहले से ग्रीनविच के मानचित्र और समय का इस्तेमाल करते थे। इसलिए आर्थिक और व्यावहारिक दलील ग्रीनविच के पक्ष में भारी पड़ी। 22 देशों ने ग्रीनविच को शून्य देशांतर मानने के पक्ष में मत दिया। सिर्फ एक देश ने विरोध किया और दो ने मतदान से परहेज किया।
फिर GMT-
फ्रांस इस फैसले से इतना नाराज हुआ कि उसने 1913 तक ग्रीनविच मेरिडियन को नहीं माना। पेरिस मेरिडियन को लेकर फ्रांसीसियों का जो गुरूर था, उसे यह चोट बहुत गहरी लगी।
लेकिन दुनिया ने ग्रीनविच मीन टाइम यानी GMT को मान लिया। धीरे-धीरे सब देश इससे जुड़ते गए। आज इसी GMT का केंद्र मानकर दुनिया की हर घड़ी, GPS और इंटरनेट सर्वर एक ही समय पर चलता है।
पहले समझें, पृथ्वी गोल है और 360 डिग्री में घूमती है। 24 घंटे में पूरा चक्कर होता है। यानी हर घंटे 15 डिग्री घूमती है। इसीलिए हर 15 डिग्री पर एक नया टाइम जोन शुरू होता है। तो इस गणित के आधार पर ग्रीनविच से पूर्व की तरफ बढ़ते जाइए, समय आगे बढ़ता जाएगा।
पश्चिम की तरफ जाइए, समय पीछे होता जाएगा। GMT को 1928 में यूनिवर्सल टाइम (Universal Time) का नाम दिया गया। आज इसे UTC यानी Coordinated Universal Time कहते हैं। यही वह घड़ी है, जिस पर GPS, सैटेलाइट, इंटरनेट सर्वर और एयर ट्रैफिक कंट्रोल टिके हैं।
जवाब साफ है, दोनों।
ग्रीनविच ऑब्जर्वेटरी में स्थित एरी ट्रांजिट सर्किल (Airy Transit Circle) नाम के यंत्र ने तारों की सटीक स्थिति नापने में दशकों तक मदद की। इसी वैज्ञानिक आधार पर ग्रीनविच को प्राइम मेरिडियन के लिए सबसे उपयुक्त माना गया। लेकिन जैसा दिए गए संदर्भ में भी कहा गया है, यह फैसला वैज्ञानिक कम और राजनीतिक-आर्थिक ज्यादा था।
दरअसल उस दौर में ब्रिटेन दुनिया की सबसे बड़ी समुद्री शक्ति था। उसके मानचित्र, उसकी घड़ियां और उसके नाविक पहले से ग्रीनविच पर चल रहे थे। बाकी दुनिया को बस साथ आना था।
आज भी जब कोई हिंदू पंचांग या जन्मकुंडली बनाई जाती है, तो वह उज्जैन के समय पर आधारित होती है जो IST से करीब 29 मिनट पीछे है। उज्जैन की वेधशाला यानी Vedshala (Government Jiwaji Observatory) आज भी खड़ी है।
यह वेधशाला महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने 1725 से 1730 के बीच बनवाई थी। इसमें 13 खगोलीय यंत्र हैं और यह आज भी ग्रहों की स्थिति का वार्षिक पंचांग प्रकाशित करती है।
"उज्जैन धर्म की नगरी होने के साथ विज्ञान की भी नगरी है। जब पश्चिम में खगोलशास्त्र का ज्ञान भी नहीं था, तब उज्जैन के ज्योतिषी नक्षत्रों की स्थिति बता रहे थे।" मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, मध्यप्रदेश
उज्जैन को दुनिया का टाइम सेंटर बनाना फिलहाल संभव नहीं। क्योंकि पूरी दुनिया की GPS, सैटेलाइट, इंटरनेट और एयर ट्रैफिक प्रणाली UTC पर टिकी है। इसे बदलना एक नई भाषा सिखाने जैसा होगा।
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यह सब जानते हैं कि धरती पर एक ही वक्त में कहीं सुबह हो रही होती है तो कहीं रात, कहीं दोपहर तो कहीं शाम… फिर पूरी दुनिया का टाइम तय कैसे होता है? दरअसल, यह सब एक अदृश्य रेखा तय करती है। यह रेखा लंदन के पास एक छोटे से शहर ग्रीनविच (Greenwich) से गुजरती है।
इसे प्राइम मेरिडियन (Prime Meridian) यानी शून्य देशांतर रेखा कहते हैं। पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव तक खिंची यह काल्पनिक रेखा वो आधार है, जिससे दुनिया के सारे टाइम जोन (Time Zone) यानी समय क्षेत्र नापे जाते हैं।
भारत का समय इससे साढ़े पांच घंटे आगे है। इसीलिए इसे IST (Indian Standard Time) यानी भारतीय मानक समय कहते हैं। लेकिन यह रेखा ग्रीनविच से ही क्यों गुजरती है? इसकी कहानी विज्ञान से ज्यादा ताकत और राजनीति की है।
उज्जैन: जब भारत था दुनिया का घड़ीसाज
उज्जैन और काल एक प्राचीन रिश्ता
महाकाल यानी समय के महान स्वामी। यह महज धार्मिक मान्यता नहीं थी। आर्यभट्ट ने अपनी किताब आर्यभट्टीय में 1500 साल पहले ही टाइम जोन के कॉसेप्ट को स्पष्ट किया था। बाद में वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त और भास्कराचार्य जैसे दिग्गज उज्जैन में रहकर खगोलशास्त्र को आगे बढ़ाते रहे।
नौवीं सदी के बगदाद के महान गणितज्ञ अल-ख्वारिज्मी ने अपनी खगोल तालिकाओं में उज्जैन को ही प्राइम मेरिडियन माना। वे बगदाद को भी आधार बना सकते थे, लेकिन उन्होंने भारतीय खगोलशास्त्र की परंपरा का सम्मान करते हुए उज्जैन को चुना। ग्रीक भूगोलवेत्ता टॉलमी ने भी अपने मानचित्रों में उज्जैन को "ओजेन" के नाम से दर्ज किया और इसके शून्य देशांतर को मान्यता दी।
फिर आया दुनिया में अलग-अलग समय का अराजक दौर
जब रेलगाड़ी आई तो यह अराजकता जानलेवा हो गई। एक ट्रेन के आने-जाने का समय तय करना असंभव-सा था, क्योंकि अगले स्टेशन का समय ही अलग था। समुद्री जहाज तो और भी मुश्किल में थे।
नाविक अपनी स्थिति देशांतर से नापते थे। ब्रिटिश नाविक ग्रीनविच के समय पर चलने वाली घड़ी साथ रखते थे, ताकि समुद्र में अपनी सटीक स्थिति जान सकें। धीरे-धीरे यह दुनिया भर में फैलता गया।
एक कमरा जिसने दुनिया का वक्त तय किया
उस वक्त दुनिया के 65 फीसदी जहाज पहले से ग्रीनविच के मानचित्र और समय का इस्तेमाल करते थे। इसलिए आर्थिक और व्यावहारिक दलील ग्रीनविच के पक्ष में भारी पड़ी। 22 देशों ने ग्रीनविच को शून्य देशांतर मानने के पक्ष में मत दिया। सिर्फ एक देश ने विरोध किया और दो ने मतदान से परहेज किया।
फिर GMT- Greenwich Mean Time बना तो फ्रांस रूठा
लेकिन दुनिया ने ग्रीनविच मीन टाइम यानी GMT को मान लिया। धीरे-धीरे सब देश इससे जुड़ते गए। आज इसी GMT का केंद्र मानकर दुनिया की हर घड़ी, GPS और इंटरनेट सर्वर एक ही समय पर चलता है।
GMT असल में काम कैसे करता है?
पश्चिम की तरफ जाइए, समय पीछे होता जाएगा। GMT को 1928 में यूनिवर्सल टाइम (Universal Time) का नाम दिया गया। आज इसे UTC यानी Coordinated Universal Time कहते हैं। यही वह घड़ी है, जिस पर GPS, सैटेलाइट, इंटरनेट सर्वर और एयर ट्रैफिक कंट्रोल टिके हैं।
ग्रीनविच क्यों? विज्ञान या राजनीति?
ग्रीनविच ऑब्जर्वेटरी में स्थित एरी ट्रांजिट सर्किल (Airy Transit Circle) नाम के यंत्र ने तारों की सटीक स्थिति नापने में दशकों तक मदद की। इसी वैज्ञानिक आधार पर ग्रीनविच को प्राइम मेरिडियन के लिए सबसे उपयुक्त माना गया। लेकिन जैसा दिए गए संदर्भ में भी कहा गया है, यह फैसला वैज्ञानिक कम और राजनीतिक-आर्थिक ज्यादा था।
दरअसल उस दौर में ब्रिटेन दुनिया की सबसे बड़ी समुद्री शक्ति था। उसके मानचित्र, उसकी घड़ियां और उसके नाविक पहले से ग्रीनविच पर चल रहे थे। बाकी दुनिया को बस साथ आना था।
तो फिर आज उज्जैन का क्या?
यह वेधशाला महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने 1725 से 1730 के बीच बनवाई थी। इसमें 13 खगोलीय यंत्र हैं और यह आज भी ग्रहों की स्थिति का वार्षिक पंचांग प्रकाशित करती है।
"उज्जैन धर्म की नगरी होने के साथ विज्ञान की भी नगरी है। जब पश्चिम में खगोलशास्त्र का ज्ञान भी नहीं था, तब उज्जैन के ज्योतिषी नक्षत्रों की स्थिति बता रहे थे।" मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, मध्यप्रदेश
समय के इतिहास की टाइम लाइन
- 6वीं शताब्दी ई. : आचार्य वराहमिहिर ने उज्जैन को खगोलीय अनुसंधान का केंद्र बनाया और बृहत्संहिता और पंचसिद्धांतिका जैसे महान ग्रंथ लिखे।
- 1725–1730 ई. : महाराजा जयसिंह द्वितीय ने उज्जैन में जंतर मंतर (वेधशाला) का निर्माण करवाया।
- अक्टूबर 1884 : वाशिंगटन DC में अंतरराष्ट्रीय मेरिडियन सम्मेलन हुआ, जिसमें 22 देशों ने ग्रीनविच को शून्य देशांतर माना।
- 2024 : उज्जैन के जंतर मंतर में विक्रमादित्य वैदिक घड़ी स्थापित की गई, जिसका वर्चुअल लोकार्पण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया।
- 2025 : मुख्यमंत्री मोहन यादव ने विधानसभा में घोषणा की कि उज्जैन को वैश्विक Prime Meridian के रूप में स्थापित करने के लिए वेधशाला में शोध होगा।
- अप्रैल 2026 : शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान (उज्जैन में धर्मेंद्र प्रधान) ने कहा कि उज्जैन को वैश्विक समय का केंद्र बनाना चाहिए।
तो क्या उज्जैन को फिर से GMT बनाया जा सकता है?
FAQ
- Greenwich Mean Time (GMT) क्या है और यह कैसे काम करता है?
GMT यानी ग्रीनविच मीन टाइम (Greenwich Mean Time) वह मानक समय है जो इंग्लैंड के ग्रीनविच शहर से गुजरने वाली शून्य देशांतर रेखा पर आधारित है। पृथ्वी 24 घंटे में 360 डिग्री घूमती है यानी हर घंटे 15 डिग्री। इसी आधार पर दुनिया को 24 टाइम जोन में बांटा गया है। ग्रीनविच से जितना पूर्व जाते हैं, समय उतना आगे होता है और पश्चिम जाने पर पीछे। भारत ग्रीनविच से 82.5 डिग्री पूर्व है इसलिए IST, GMT से 5 घंटे 30 मिनट आगे है। आज GMT को UTC यानी Coordinated Universal Time भी कहते हैं जो GPS, इंटरनेट और हवाई यातायात का आधार है। - उज्जैन प्राचीन काल में प्राइम मेरिडियन क्यों था?
प्राचीन भारतीय खगोलशास्त्र में उज्जैन को शून्य देशांतर यानी प्राइम मेरिडियन माना जाता था। सूर्य सिद्धांत ग्रंथ में उज्जैन को कर्क रेखा और शून्य देशांतर के मिलन बिंदु पर बताया गया है। आर्यभट्ट, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त और भास्कराचार्य जैसे महान वैज्ञानिकों ने उज्जैन से ही अपनी गणनाएं की थीं। 9वीं सदी के अरब गणितज्ञ अल-ख्वारिज्मी ने भी अपनी खगोल तालिकाओं में उज्जैन को ही प्राइम मेरिडियन रखा। यह परंपरा 1884 में ग्रीनविच को अंतरराष्ट्रीय मानक बनाने तक बनी रही। - 1884 में ग्रीनविच को प्राइम मेरिडियन क्यों चुना गया?
1884 में अमेरिका के वाशिंगटन डीसी में 25 देशों का एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हुआ। उस समय दुनिया के 65 फीसदी जहाज पहले से ग्रीनविच के नक्शे और समय का इस्तेमाल करते थे। ब्रिटेन उस दौर की सबसे बड़ी समुद्री शक्ति था। 22 देशों ने ग्रीनविच के पक्ष में मत दिया। फ्रांस अपने पेरिस मेरिडियन के लिए लड़ा लेकिन हारा। यह फैसला वैज्ञानिक आधार पर कम और ब्रिटिश आर्थिक व राजनीतिक ताकत के आधार पर ज्यादा था। तब से ग्रीनविच ही दुनिया का समय केंद्र है।
Thesootr Prime: सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कहा- मानहानि कानून के मामले अब गैर-आपराधिक बनें
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