भोपाल के चीफ सिटी प्लानर नीरज आनंद लिखार के जाति प्रमाण पत्र की जांच, आदेश को लिखार ने दी चुनौती

Neel Tiwari | Mar 20, 2026, 11:06 IST
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neeraj anand likhar caste certificate dispute high court challenge bhopal
neeraj anand likhar caste certificate dispute high court challenge bhopal

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के एक अहम आदेश ने नगर एवं ग्राम निवेश विभाग (TNCP) के ज्वाइंट डायरेक्टर नीरज आनंद लिखार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। कोर्ट ने उनके जाति प्रमाण पत्र की दोबारा जांच के निर्देश दिए हैं। इसे अब उन्होंने खुद हाईकोर्ट में चुनौती दे दी है।

News In Short

  • नीरज लिखार के ST प्रमाण पत्र की दोबारा जांच के आदेश दिए गए हैं।
  • 90 दिनों में रिपोर्ट पेश करने के निर्देश मिले हैं।
  • भाई का प्रमाण पत्र पहले ही रद्द हो चुका है।
  • लिखार ने सिंगल बेंच के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
  • पहले इंदौर से हटाए गए, फिर भोपाल में चीफ सिटी प्लानर का प्रभार मिला था।

News In Detail

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब TNCP के ज्वाइंट डायरेक्टर और भोपाल के चीफ सिटी प्लानर नीरज आनंद लिखार के जाति प्रमाण पत्र की जांच के आदेश हाईकोर्ट ने दिए हैं। वहीं, हाई लेवल कमेटी की जांच से बचने के लिए लिखार ने सिंगल बेंच के फैसले को चुनौती दे दी है।

जस्टिस विशाल मिश्रा की बेंच ने उनके जाति प्रमाण पत्र के पुनः सत्यापन के आदेश दिए थे। इसके खिलाफ अब वे डिवीजन बेंच का दरवाजा खटखटा रहे हैं। इस चुनौती के बाद मामला और ज्यादा कानूनी रूप से पेचीदा हो गया है।

क्या है पूरा विवाद

यह पूरा मामला फर्जी जाति प्रमाण पत्र के जरिए सरकारी नौकरी और पदोन्नति हासिल करने के आरोपों से जुड़ा है। याचिकाकर्ता आदित्य ठाकुर ने कोर्ट में दावा किया कि लिखार ने 1983 में जारी प्रमाण पत्र के आधार पर अनुसूचित जनजाति (ST) कोटे का लाभ लिया था। इसी आधार पर उन्हें नौकरी और प्रमोशन मिला, जो अब जांच के दायरे में है।

भाई का प्रमाण पत्र पहले ही हो चुका है रद्द

मामले का सबसे अहम पहलू यह है कि नीरज लिखार के सगे भाई अजय लिखार का जाति प्रमाण पत्र पहले ही उच्च स्तरीय जाति छानबीन समिति द्वारा रद्द किया जा चुका है। इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। वहीं, कोर्ट ने 2021 में उस निरस्तीकरण को बरकरार रखा था। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब एक ही परिवार और वंशावली है, तो दूसरे भाई का प्रमाण पत्र कैसे वैध हो सकता है।

एक ही परिवार, एक ही आधार, फिर अलग फैसला क्यों?

याचिका में यह तर्क दिया गया कि दोनों भाइयों के प्रमाण पत्र एक ही समय और एक ही प्राधिकारी द्वारा जारी किए गए थे। दोनों की वंशावली, मूल स्थान और सामाजिक पृष्ठभूमि भी समान है। ऐसे में एक का प्रमाण पत्र फर्जी और दूसरे का सही मानना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन हो सकता है।

हलबा जाति को लेकर उठे सवाल

छानबीन में पहले यह सामने आया था कि अजय लिखार हलबा समुदाय से नहीं हैं। यह जाति महाराष्ट्र में ST श्रेणी में आती है, लेकिन मध्यप्रदेश में इसकी स्थिति अलग संदर्भों में देखी जाती है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि इसी आधार का फायदा उठाकर नीरज लिखार ने नौकरी हासिल की।

सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन भी आई सामने

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के 1994 के कुमारी माधुरी पाटिल केस का भी हवाला दिया है। इस फैसले में साफ कहा गया है कि फर्जी जाति प्रमाण पत्र मिलने पर न सिर्फ नौकरी रद्द होगी, बल्कि आपराधिक कार्रवाई भी हो सकती है। साथ ही विजिलेंस जांच के जरिए व्यक्ति की सामाजिक पृष्ठभूमि की गहराई से जांच जरूरी है।

90 दिन में पूरी करनी होगी जांच

हाईकोर्ट ने 12 मार्च को आदेश दिए थे कि उच्च स्तरीय जाति छानबीन समिति 90 दिनों के भीतर जांच पूरी कर रिपोर्ट कोर्ट में पेश करे। इस दौरान दस्तावेजों के साथ-साथ सामाजिक और पारिवारिक जांच भी की जाएगी।

पहले हटाए गए, फिर मिला बड़ा प्रभार

गौरतलब है कि इससे पहले भी विवादों के चलते हाईकोर्ट ने नीरज लिखार को इंदौर के सिटी प्लानर पद से अलग किया था। इसके बावजूद उन्हें भोपाल में चीफ सिटी प्लानर का प्रभार दे दिया गया, जिसने इस पूरे मामले को और ज्यादा चर्चाओं में ला दिया।

जांच से बचना चाह रहे लिखार

जाति प्रमाण पत्र की फिर से जांच से लिखार बचना चाह रहे हैं। इसलिए ही वह अब पिछले आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट पहुंचे हैं। अब इस मामले में सबसे बड़ी नजर छानबीन समिति की रिपोर्ट पर रहेगी। यदि जांच में प्रमाण पत्र अवैध पाया जाता है, तो नीरज लिखार की नौकरी, पद और अब तक मिले सभी सेवा लाभ खतरे में पड़ सकते हैं। वहीं, उनकी ओर से दी गई चुनौती पर हाईकोर्ट का अगला फैसला भी इस केस की दिशा तय करेगा।

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